ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
५६६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण मैं हूँ, वैसी ही तुम हो। हममें तुममें भेद नहीं है। मैं तुम्हारे प्राण हूँ और तुम भी मेरे लिये प्राणस्वरूपा हो। प्यारी गोपियो ! तुमलोगोंका यह व्रत लोकरक्षाके लिये है, स्वार्थसिद्धिके लिये नहीं; क्योंकि तुमलोग गोलोकसे मेरे साथ आयी हो और फिर मेरे साथ ही तुम्हें वहाँ चलना है। (तुम मेरी नित्यसिद्धा प्रेयसी हो। तुमने साधन करके मुझे पाया है, ऐसी बात नहीं है।) अब शीघ्र अपने घर जाओ। मैं जन्म-जन्ममें तुम्हारा ही हूँ। तुम मेरे लिये प्राणोंसे भी बढ़कर हो; इसमें संशय नहीं है। ऐसा कहकर श्रीहरि वहीं यमुनाजीके किनारे बैठ गये। फिर सारी गोपियाँ भी बारंबार उन्हें निहारती हुई बैठ गयीं। उन सबके मुखपर प्रसन्नता छा रही थी; मन्द मुस्कानकी प्रभा फैल रही थी। वे प्रेमपूर्वक बाँकी चितवनसे देखती हुई अपने नेत्र-चकोरोंद्वारा श्रीहरिके मुखचन्द्रकी सुधाका पान कर रही थीं। तत्पश्चात् वे बारंबार जय बोलकर शीघ्र ही अपने-अपने घर गयीं और श्रीकृष्ण भी ग्वाल-बालोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक अपने घरको लौटे। इस प्रकार मैंने श्रीहरिका यह सारा मङ्गलमय चरित्र कह सुनाया, गोपीचीर- हरणकी यह लीला सब लोगोंके लिये सुखदायिनी है। (अध्याय २७) श्रीकृष्णके रास-विलासका वर्णन नारदजीने पूछा- भगवन् ! तीन मास व्यतीत होनेपर उन गोपाङ्गनाओंका श्रीहरिके साथ किस प्रकार मिलन हुआ ? वृन्दावन कैसा है? रासमण्डलका क्या स्वरूप है? श्रीकृष्ण तो एक थे और गोपियाँ बहुत । ऐसी दशामें किस तरह वह क्रीड़ा सम्भव हुई? मेरे मनमें इस नयी-नयी लीलाको सुननेके लिये बड़ी उत्सुकता हो रही है। महाभाग ! आपके नाम और यशका श्रवण एवं कीर्तन बड़ा पवित्र है। कृपया आप उस रासक्रीड़ाका वर्णन कीजिये। अहो ! श्रीहरिकी रासयात्रा, पुराणोंके सारकी भी सारभूता कथा है। इस भूतलपर उनके द्वारा की गयी सारी लीलाएँ ही सुननेमें अत्यन्त मनोहर जान पड़ती हैं। सूतजी कहते हैं - शौनक ! नारदजीकी यह बात सुनकर साक्षात् नारायण ऋषि हँसे और प्रसन्न मुखसे उन्होंने कथा सुनाना आरम्भ किया। श्रीनारायण बोले- मुने ! एक दिन श्रीकृष्ण चैत्रमासके शुक्लपक्षकी त्रयोदशी तिथिको चन्द्रोदय होनेके पश्चात् वृन्दावनमें गये। उस समय जूही, मालती, कुन्द और माधवीके पुष्पोंका स्पर्श करके बहनेवाली शीतल, मन्द एवं सुगन्धित मलयवायुसे सारा वनप्रान्त सुवासित हो रहा था। भ्रमरोंके मधुर गुञ्जारवसे उसकी मनोहरता बढ़ गयी थी। वृक्षोंमें नये-नये पल्लव निकल आये थे और कोकिलकी कुहू-कुहू-ध्वनिसे वह वन मुखरित हो रहा था। नौ लाख रासगृहोंसे संयुक्त वह वृन्दावन बड़ा ही मनोहर जान पड़ता था। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमकी सुगन्ध सब ओर फैल रही थी। कर्पूरयुक्त ताम्बूल तथा भोग-द्रव्य सजाकर रखे गये थे। कस्तूरी और चन्दनयुक्त चम्पाके फूलोंसे रचित नाना प्रकारकी शय्याएँ उस स्थानकी शोभा बढ़ा रही थीं। रत्नमय प्रदीपोंका प्रकाश सब ओर फैला था। धूपकी सुगन्धसे वह वनप्रान्त महमह महक रहा था। वहीं सब ओरसे गोलाकार रासमण्डल बनाया गया था, जो नाना प्रकारके फूलों और मालाओंसे सुसज्जित था। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और केसरसे वहाँकी भूमिका संस्कार किया गया था। रासमण्डलके चारों ओर फूलोंसे भरे उद्यान तथा क्रीड़ासरोवर थे। उन सरोवरोंमें हंस, कारण्डव तथा जलकुकुट
२९- ब्रह्माजीका मोहिनीके शापसे अपूज्य होना, इस शापके निवारणके लिये उनका वैकुण्ठ-धाममें जाना और वहाँ अन्यान्य ब्रह्माओंके दर्शनसे उनके अभिमानका दूर होना
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५६७ आदि पक्षी कलरव कर रहे थे। वे जलक्रीड़ाके योग्य सुन्दर तथा सुरत-श्रमका निवारण करनेवाले थे। उनमें शुद्ध स्फटिकमणिके समान स्वच्छ तथा निर्मल जल भरा था। उस रासमण्डलमें दही, अक्षत और जल छिड़के गये थे। केलेके सुन्दर खम्भोंद्वारा वह चारों ओरसे सुशोभित था। सूतमें बँधे हुए आमके पल्लवोंके मनोहर बन्दनवारों तथा सिन्दूर, चन्दनयुक्त मङ्गल-कलशोंसे उसको सजाया गया था। मङ्गल-कलशोंके साथ मालतीकी मालाएँ और नारियलके फल भी थे। उस शोभासम्पन्न रासमण्डलको देखकर मधुसूदन हँसे। उन्होंने कौतूहलवश वहाँ विनोदकी साधनभूता मुरलीको यह एक अद्भुत बात थी। चारों ओर देखकर वंशीध्वनिका अनुसरण करती हुई आगे बढ़ीं। मन-ही-मन महात्मा श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंका चिन्तन करती जाती थीं। वे अपने सहज तेज तथा श्रेष्ठ रत्नसारमय भूषणोंकी कान्तिसे वनप्रान्तको प्रकाशित कर रही थीं। राधिकाकी सुशीला आदि जो अत्यन्त प्यारी तैंतीस सखियाँ थीं और समस्त गोपियोंमें श्रेष्ठ समझी जाती थीं; वे भी श्रीकृष्णके दिये हुए वरसे आकृष्ट-चित्त हो डरी हुई-सी घरसे बाहर निकलीं। कुलधर्मका त्याग करके निःशङ्क हो वनकी ओर चलीं। वे सब- की-सब प्रेमातिरेकसे मोहित थीं। फिर उन प्रधान गोपियोंके पीछे-पीछे दूसरी गोपियाँ भी जो जैसे थीं, वैसे ही—लाखोंकी संख्यामें निकल पड़ीं। वे सब वनमें एक स्थानपर इकट्ठी हुईं और कुछ देरतक प्रसन्नतापूर्वक वहीं खड़ी रहीं। वहाँ कुछ गोपियाँ अपने हाथोंमें माला लिये आयी थीं। कुछ गोपाङ्गनाएँ ब्रजसे मनोहर चन्दन हाथमें लेकर वहाँ पहुँची थीं। कई गोपियोंके हाथोंमें श्वेत चँवर शोभा पा रहे थे। वे सब बड़े हर्षके बजाया। वह वंशीकी ध्वनि उनकी प्रेयसी गोपाङ्गनाओंके प्रेमको बढ़ानेवाली थी। राधिकाने जब वंशीकी मधुर ध्वनि सुनी तो तत्काल ही वे प्रेमाकुल हो अपनी सुध- बुध खो बैठीं। उनका शरीर ठूँठे काठकी तरह स्थिर और चित्त ध्यानमें एकतान हो गया। क्षणभरमें चेत होनेपर पुनः मुरलीकी ध्वनि उनके कानोंमें पड़ी। वे बैठी थीं, फिर उठकर खड़ी हो गयीं। अब उन्हें बार-बार उद्वेग होने लगा, वे आवश्यक कर्म छोड़कर घरसे निकल पड़ीं। साथ वहाँ आयी थीं। कुछ गोपकन्याएँ कुंकुम, ताम्बूल-पात्र तथा काञ्चन, वस्त्र लिये आयी थीं।
३०- गङ्गाकी उत्पत्ति तथा महिमा
५६८ || संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
कुछ शीघ्रतापूर्वक उस स्थानपर आयीं, जहाँ चन्द्रावली (राधा) सानन्द खड़ी थीं। वे सब एकत्र हो प्रसन्नतापूर्वक मुस्कराती हुई वहाँ राधिकाकी वेश-भूषा सँवारकर बड़े हर्षके साथ आगे बढ़ीं। मार्गमें बारंबार वे हरि-नामका जप करती थीं। वृन्दावनमें पहुँचकर उन्होंने रमणीय रासमण्डल देखा, जहाँका दृश्य स्वर्गसे भी अधिक सुन्दर था। चन्द्रमाकी किरणें उस वनप्रान्तको अनुरञ्जित कर रही थीं। अत्यन्त निर्जन, विकसित कुसुमोंसे अलंकृत तथा फूलोंको छूकर प्रवाहित होनेवाली मलयवायुसे सुवासित वह रम्य रासमण्डल नारियोंके प्रेमभावको जगानेवाला और मुनियोंके भी मनको मोह लेनेवाला था। उन सबको वहाँ कोकिलोंकी मधुर काकली सुनायी दी। भ्रमरोंका अत्यन्त सूक्ष्म मधुर गुञ्जारव भी बड़ा मनोहर जान पड़ता था। वे भ्रमर भ्रमरियोंके साथ रह फूलोंका मकरन्द पान करके मतवाले हो गये थे।
तदनन्तर शुभ वेलामें सम्पूर्ण सखियोंके साथ श्रीकृष्णके चरणकमलोंका चिन्तन करके श्रीराधिकाने रासमण्डलमें प्रवेश किया। राधाको अपने समीप देखकर श्रीकृष्ण वहाँ बड़े प्रसन्न हुए। वे बड़े प्रेमसे मुस्कराते हुए उनके निकट गये। उस समय प्रेमसे आकुल हो रहे थे। राधा अपनी सखियोंके बीचमें रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित होकर खड़ी थीं। उनके श्रीअङ्गोंपर दिव्य वस्त्रोंके परिधान शोभा पा रहे थे। वे मुस्कराती हुई बाँकी चितवनसे श्यामसुन्दरकी ओर देखती हुई गजराजकी भाँति मन्द गतिसे चल रही थीं। रमणीय राधा नवीन वेश-भूषा, नयी अवस्था तथा रूपसे अत्यन्त मनोहर जान पड़ती थीं। वे मुनियोंके मनको भी मोह लेनेमें समर्थ थीं। उनकी अङ्गकान्ति सुन्दर चम्पाके समान गौर थी। मुख शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाको लज्जित कर रहा था। वे सिरपर मालतीकी मालासे युक्त वेणीका भार वहन करती थीं।
श्रीराधाने भी किशोर अवस्थासे युक्त श्यामसुन्दरकी ओर दृष्टिपात किया। वे नूतन यौवनसे सम्पन्न तथा रत्नमय आभरणोंसे विभूषित थे। करोड़ों कामदेवोंकी लावण्यलीलाके मनोहर धाम प्रतीत होते थे और बाँके नयनोंसे उनकी ओर निहारती हुई उन प्राणाधिका राधिकाको देख रहे थे। उनके परम अद्भुत रूपकी कहीं उपमा नहीं थी। वे विचित्र वेश-भूषा तथा मुकुट धारण किये सानन्द मुस्करा रहे थे। बाँके नेत्रोंके कोणसे बार-बार प्रीतमकी ओर देख-देखकर सती राधाने लज्जावश मुखको आँचलसे ढक लिया और वे मुस्कराती हुई अपनी सुध-बुध खो बैठीं। प्रेमभावका उद्दीपन होनेसे उनके सारे अङ्ग पुलकित हो उठे। तदनन्तर श्रीकृष्ण एवं राधिकाका परस्पर प्रेम-शृङ्गार हुआ।
मुने! नौ लाख गोपियाँ और उतने ही गोप-विग्रहधारी श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण—ये अठारह लाख गोपी-कृष्ण रासमण्डलमें परस्पर मिले। नारद! वहाँ कङ्कणों, किङ्किणियों, वलयों और श्रेष्ठ रत्न-निर्मित नूपुरोंकी सम्मिलित झनकार कुछ कालतक निरन्तर होती रही। इस प्रकार स्थलमें रासक्रीड़ा करके वे सब प्रसन्नतापूर्वक जलमें उतरे और वहाँ जल-क्रीड़ा करते-करते थक गये। फिर वहाँसे निकलकर नवीन वस्त्र धारण करके कौतूहलपूर्वक कर्पूरयुक्त ताम्बूल ग्रहण करके सबने रत्नमय दर्पणमें अपना-अपना मुँह देखा। तदनन्तर श्रीकृष्ण राधिका तथा गोपियोंके साथ नाना प्रकारकी मधुर-मनोहर क्रीड़ाएँ करने लगे।
फिर पवित्र उद्यानके निर्जन प्रदेशमें सरोवरके रमणीय तटपर जहाँ बाहर चन्द्रमाका प्रकाश फैल रहा था, जहाँकी भूमि पुष्प और चन्दनसे चर्चित थी, जहाँ सब ओर अगुरु तथा चन्दनसे सम्पृक्त मलय-समीरद्वारा सुगन्ध फैलायी जा रही थी और भ्रमरोंके गुञ्जारवके साथ नर-कोकिलोंकी मधुर काकली कानोंमें पड़ रही थी; योगियोंके परम गुरु
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५६१
श्यामसुन्दर श्रीकृष्णने अनेक रूप धारण करके स्थल-प्रदेशमें मधुर लीला-विलास किये। इसके बाद राधाके साथ सनातन पूर्णब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्णने यमुनाजीके जलमें प्रवेश किया। श्रीकृष्णके जो अन्य मायामय स्वरूप थे, वे भी गोपियोंके साथ जलमें उतरे। यमुनाजीमें परम रसमयी क्रीड़ा करनेके पश्चात् सबने बाहर निकलकर सूखे वस्त्र पहने और माला आदि धारण कीं।
तदनन्तर सब गोप-किशोरियाँ पुनः रासमण्डलमें गयीं। वहाँके उद्यानमें सब ओर तरह-तरहके फूल खिले हुए थे। उन्हें देखकर परमेश्वरी राधाने कौतुकपूर्वक गोपियोंको पुष्पचयनके लिये आज्ञा दी। कुछ गोपियोंको उन्होंने माला गूँथनेके काममें लगाया। किन्हींको पानके बीड़े सुसज्जित करनेमें तथा किन्हींको चन्दन घिसनेमें लगा दिया। गोपियोंके दिये हुए पुष्पहार, चन्दन तथा पानको लेकर बाँके नेत्रोंसे देखती हुई सुन्दरी राधाने मन्द हास्यके साथ श्यामसुन्दरको प्रेमपूर्वक वे सब वस्तुएँ अर्पित कीं। फिर कुछ गोपियोंको श्रीकृष्णकी लीलाओंके गानमें और कुछको मृदङ्ग, मुरज आदि बाजे बजानेमें उन्होंने लगाया। इस प्रकार रासमें लीला-विलास करके राधा निर्जन वनमें श्रीहरिके साथ सर्वत्र मनोहर विहार करने लगीं। रमणीय पुष्पोद्यान, सरोवरोंके तट, सुरम्य गुफा, नदों और नदियोंके समीप, अत्यन्त निर्जन प्रदेश, पर्वतीय कन्दरा, नारियोंके मनोवाञ्छित स्थान, तैंतीस वन—भाण्डीरवन, रमणीय श्रीवन, कदम्बवन, तुलसीवन, कुन्दवन, चम्पकवन, निम्बवन, मधुवन, जम्बीरवन, नारिकेलवन, पूगवन, कदलीवन, बदरीवन, बिल्ववन, नारंगवन, अश्वत्थवन, वंशवन, दाडिमवन, मन्दारवन, तालवन, आम्रचूतवन, केतकीवन, अशोकवन, खर्जूरवन, आम्रातकवन, जम्बूवन, शालवन, कटकीवन, पद्मवन, जातिवन, न्यग्रोधवन, श्रीखण्डवन और विलक्षण केसरवन—इन सभी स्थानोंमें तीस दिन-राततक कौतूहलपूर्वक शृङ्गार किया, तथापि उनका मन तनिक भी तृप्त नहीं हुआ। अधिकाधिक इच्छा बढ़ती गयी, ठीक उसी तरह, जैसे घीकी धारा पड़नेसे अग्नि प्रज्वलित होती है। देवता, देवियाँ और मुनि, जो रास-दर्शनके लिये पधारे थे, अपने-अपने घरको लौट गये। उन सबने रास-रसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की और आश्चर्यचकित हो हर्षका अनुभव करते हुए वे वहाँसे विदा हुए। बहुत-सी देवाङ्गनाओंने श्रीहरिके साथ प्रेम-मिलनकी लालसा लेकर भारतवर्षके श्रेष्ठ नरेशोंके घर-घरमें जन्म लिया।
(अध्याय २८)
श्रीराधाके साथ श्रीकृष्णका वन-विहार, वहाँ अष्टावक्रमुनिके द्वारा उनकी स्तुति तथा मुनिका शरीर त्यागकर भगवच्चरणोंमें लीन होना
भगवान् नारायण कहते हैं—नारद ! तदनन्तर प्रेम-विह्वला गोपियोंके साथ भगवान् श्रीकृष्णने विविध भाँतिसे रास-क्रीड़ा की। गोपियाँ उन्मत्ता-सी हो गयीं। तब श्रीकृष्ण राधिकाको लेकर वहाँसे अन्तर्धान हो गये तथा अनेक सुरम्य वनों, पर्वतों, सरोवरों एवं नदी-तटोंपर ले जाकर राधिकाको आनन्द प्रदान करते रहे। श्रीराधाके साथ भ्रमण करते हुए श्यामसुन्दरने अपने सामने एक वट-वृक्ष देखा, जिसकी शाखाओंका अग्रभाग बहुत ही ऊँचा था। उस वृक्षका विस्तार भी बहुत अधिक था। उसके नीचे एक योजनतकका भूभाग छायासे घिरा हुआ था। केतकीवन भी वहाँसे निकट ही था। श्रीकृष्ण राधाके साथ वहीं बैठे थे। शीतल-मन्द-सुगन्ध वायु उस स्थानको सुवासित कर रही थी। हर्षसे भरे हुए श्रीकृष्णने वहाँ राधासे चिरकालतक पुरातन एवं विचित्र रहस्यको
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बतानेवाली कथाएँ कहीं। इसी समय उन्होंने वहाँ आते हुए एक श्रेष्ठ मुनिको देखा, जिनके मुख और नेत्र प्रसन्नतासे खिले हुए थे। परमात्मा श्रीहरिके जिस रूपका वे ध्यान करते थे, उसे हृदयमें न देखकर उनका ध्यान टूट गया था। अब वे अपने सामने बाहर ही उस रूपका प्रत्यक्ष दर्शन करने लगे थे। उनका शरीर काला था। सारे अवयव टेढ़े-मेढ़े थे और वे नाटे तथा दिगम्बर थे। उनका नाम था—अष्टावक्र। वे ब्रह्मतेजसे प्रकाशित हो रहे थे। उनका मस्तक जटाओंसे भरा था और वे अपने मुँहसे आग उगल रहे थे, मानो मुखद्वारसे उनकी तपस्याजनित तेजोराशि ही प्रकट हो रही हो अथवा वे ऐसे लगते थे, मानो उनके रूपमें स्वयं ब्रह्मतेज ही मूर्तिमान्-सा हो गया हो। उनके नख और मूँछ-दाढ़ीके बाल बढ़े हुए थे। वे तेजस्वी और परम शान्त थे तथा भयभीत हो भक्तिभावसे दोनों हाथ जोड़ मस्तक झुकाये हुए थे। उन्हें देख राधा हँसने लगीं; परंतु माधवने उन्हें ऐसा करनेसे रोका और उन महात्मा मुनीन्द्रके प्रभावका वर्णन किया। मुनिवर अष्टावक्रने गोविन्दको प्रणाम करके उनकी स्तुति की। पूर्वकालमें महात्मा भगवान् शंकरने उन्हें जिस स्तोत्रका उपदेश दिया था, उसीको उन्होंने सुनाया।
अष्टावक्र बोले—प्रभो! आप तीनों गुणोंसे परे होकर भी समस्त गुणोंके आधार हैं। गुणोंके कारण और गुणस्वरूप हैं। गुणियोंके स्वामी तथा उनके आदिकारण हैं। गुणनिधे! आपको नमस्कार है। आप सिद्धिस্বরূপ हैं। समस्त सिद्धियाँ आपकी अंशस्वरूपा हैं। आप सिद्धिके बीज और परात्पर हैं। सिद्धि और सिद्धगणोंके अधीश्वर हैं तथा समस्त सिद्धोंके गुरु हैं; आपको नमस्कार है। वेदोंके बीजस्वरूप परमात्मन्! आप वेदोंके ज्ञाता, वेदवान् और वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हैं। वेद भी आपको पूर्णतः नहीं जान सके हैं। रूपेश्वर! आप वेदज्ञोंके भी स्वामी हैं; आपको नमस्कार है। आप ब्रह्मा, अनन्त, शिव, शेष, इन्द्र और धर्म आदिके अधिपति हैं। सर्वस्वरूप सर्वेश्वर! आप शर्व (महादेवजी)-के भी स्वामी हैं; सबके बीजरूप गोविन्द! आपको नमस्कार है। आप ही प्रकृति और प्राकृत पदार्थ हैं। प्राज्ञ, प्रकृतिके स्वामी तथा परात्पर हैं। संसार-वृक्ष तथा उसके बीज और फलरूप हैं। आपको नमस्कार है। सृष्टि, पालन और संहारके बीजस्वरूप ब्रह्मा आदिके भी ईश्वर! आप ही सृष्टि, पालन और संहारके कारण हैं। महाविराट् (नारायण)-रूपी वृक्षके बीज राधावल्लभ! आपको नमस्कार है। अहो! आप जिसके बीज हैं, उस महाविराट्रूपी वृक्षके तीन स्कन्ध (तने) हैं—ब्रह्मा, विष्णु और शिव। वेदादि शास्त्र उसकी शाखा-प्रशाखाएँ हैं और तपस्या पुष्प हैं। जिसका फल संसार है, वह वृक्ष प्रकृतिका कार्य है। आप ही उसके भी आधार हैं, पर आपका आधार कोई नहीं है। सर्वाधार! आपको नमस्कार है। तेजःस्वरूप! निराकार! आपतक प्रत्यक्ष प्रमाणकी पहुँच नहीं है। सर्वरूप! प्रत्यक्षके अविषय! स्वेच्छामय परमेश्वर! आपको नमस्कार है।
यों कहकर मुनिश्रेष्ठ अष्टावक्र श्रीकृष्णके
३१- गङ्गा-स्नानसे ब्रह्माजीको मिले हुए शापकी निवृत्ति, गोलोकमें ब्रह्माजीको भारतीकी प्राप्ति, भारतीसहित ब्रह्माका अपने लोकमें प्रवेश, भगवान् शिवके दर्पभङ्गकी कथा, वृकासुरसे उनकी रक्षा, श्रीराधिकाके पूछनेपर श्रीकृष्णके द्वारा शिवके तत्त्व-रहस्यका निरूपण
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५७१
चरणकमलोंमें पड़ गये और श्रीराधा तथा गोविन्द दोनोंके सामने ही उन्होंने अपने प्राण त्याग दिये। उनका शरीर भगवान्के पाद-पद्मोंके समीप गिर पड़ा और उससे प्रज्वलित अग्नि-शिखाके समान उनका तेज ऊपरको उठा। वह सात ताड़के बराबर ऊँचा उठकर भगवान्के चारों तरफ घूमकर पुनः उनके चरणोंमें गिरा और वहीं विलीन हो गया।
जो प्रातःकाल उठकर अष्टावक्रद्वारा किये गये स्तोत्रका पाठ करता है, वह परम निर्वाणरूप मोक्षको प्राप्त कर लेता है; इसमें संशय नहीं है। नारद! यह स्तोत्रराज मुमुक्षुजनोंके लिये प्राणोंसे भी बढ़कर है। श्रीहरिने पहले इसे वैकुण्ठधाममें भगवान् शंकरको दिया था। (अध्याय २९)
भगवान् श्रीकृष्णद्वारा अष्टावक्र (देवल)-के शवका संस्कार तथा उनके गूढ़ चरित्रका परिचय
नारदजीने पूछा—ब्रह्मन् ! (नारायणदेव !) उन महामुनिका कौन-सा अद्भुत रहस्य सुना गया ? मुनि अष्टावक्रके देह-त्यागके पश्चात् भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्णने क्या किया ?
भगवान् श्रीनारायण बोले—मुनिको मरा देख भगवान् श्रीकृष्ण उनके शरीरका दाह-संस्कार करनेको उद्यत हुए। महात्मा अष्टावक्रका वह रक्त, मांस एवं हड्डियोंसे हीन शरीर साठ हजार वर्षोंतक निराहार रहा; अतः प्रज्वलित हुई जठराग्निने उस शरीरके रक्त, मांस तथा हड्डियोंको दग्ध कर दिया था। मुनिका चित्त श्रीहरिके चरणारविन्दोंके चिन्तनमें ही लगा था; अतः उन्हें बाह्य ज्ञान बिलकुल नहीं रह गया था। मधुसूदन श्रीकृष्णने चन्दन-काष्ठकी चिता बनाकर उसमें अग्निसम्बन्धी कार्य (संस्कार) किया और फिर शोक-लीला करते हुए अश्रुपूर्ण नेत्रोंसे मुनिके शवको उस चितापर स्थापित कर दिया। तदनन्तर शवके ऊपर भी काठ रखकर चितामें आग लगा दी। मुनिका शरीर जलकर भस्म हो गया। आकाशमें देवता दुन्दुभियाँ बजाने लगे और तत्काल ही वहाँसे फूलोंकी वर्षा होने लगी। इसी बीच वहाँ रत्नोंके सारतत्त्वसे निर्मित, मनके समान तीव्र गतिसे चलनेवाला तथा वस्त्रों और पुष्पहारोंसे अलंकृत एक सुन्दर विमान गोलोकसे उतरा और श्रीहरिके सामने प्रकट हो गया। उसमें श्रीकृष्णके समान ही रूप और वेश-भूषावाले श्रेष्ठ पार्षद विराजमान थे। वे उत्तम पार्षद तत्काल ही विमानसे उतर गये। उन सबके आकार श्रीकृष्णसे मिलते-जुलते थे। उन्होंने राधिका और श्यामसुन्दरको प्रणाम करके सूक्ष्म-देहधारी मुनीश्वर अष्टावक्रको भी मस्तक झुकाया और उन्हें उस विमानपर बिठाकर वे उत्तम गोलोकधामको चले गये। मुनीन्द्र अष्टावक्रके गोलोकधामको चले जानेपर वृन्दावनविनोदिनी साध्वी राधाने चकित हो जगदीश्वर श्रीकृष्णसे पूछा।
श्रीराधिका बोलीं—नाथ ! ये मुनिश्रेष्ठ कौन थे, जिनके समस्त अङ्ग ही टेढ़े-मेढ़े थे ? ये बहुत ही नाटे थे। इनके शरीरका रंग काला था और ये देखनेमें अत्यन्त कुत्सित होनेपर भी बड़े तेजस्वी जान पड़ते थे। उनका जो प्रज्वलित अग्निके समान तेज था, वह साक्षात् आपके चरणारविन्दमें विलीन हो गया। वे कितने पुण्यात्मा थे कि तत्काल विमानमें बैठकर गोलोकधामको चले गये और उन स्वात्माराम मुनिके लिये आपको भी रोना आ गया। प्रभो ! आपने अश्रुपूर्ण नेत्रोंसे इनका सत्कार किया है; अतः मैंने जो कुछ पूछा है, वह सारा विवरण शीघ्र ही विस्तारपूर्वक बताइये।
| ५७२ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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राधिकाका यह वचन सुन भगवान् मधुसूदनने हँसकर युगान्तरकी कथाको कहना आरम्भ किया।
श्रीकृष्ण बोले— प्रिये! सुनो। मैं इस विषयमें एक प्राचीन इतिहास बता रहा हूँ, जिसके सुनने और कहनेसे समस्त पापोंका नाश हो जाता है। प्रलयकालमें जब तीनों लोक एकार्णवके जलमें मग्न थे, तब मेरे ही अंशभूत महाविष्णुके नाभिकमलसे मेरी ही कलाद्वारा जगत्-विधाता ब्रह्माका प्रादुर्भाव हुआ। ब्रह्माजीके हृदयसे पहले चार पुत्र उत्पन्न हुए, जो सब-के-सब नारायणपरायण तथा ब्रह्मतेजसे प्रकाशमान थे। वे ज्ञानहीन बालकोंकी भाँति सदा नग्न रहते हैं और पाँच वर्षकी ही अवस्थासे युक्त दिखायी देते हैं। उन्हें बाह्यज्ञान नहीं होता; परंतु ब्रह्मतत्त्वकी व्याख्यामें वे बड़े निपुण हैं। सनक, सनन्दन, सनातन और भगवान् सनत्कुमार—ये ही क्रमशः उन चारोंके नाम हैं। एक दिन ब्रह्माजीने उनसे कहा—'पुत्रो! तुम जगत्की सृष्टि करो।' परंतु उन्होंने पिताकी बात नहीं मानी और मेरी प्रसन्नताके लिये वे तपस्या करनेको वनमें चले गये। उन पुत्रोंके चले जानेपर विधाताका मन उदास हो गया। यदि पुत्र आज्ञाका पालन न करे तो पिताको बड़ा दुःख होता है। उन्होंने ज्ञानद्वारा अपने विभिन्न अङ्गोंसे कई पुत्र उत्पन्न किये, जो तपस्याके धनी, वेद-वेदाङ्गोंके विद्वान् तथा ब्रह्मतेजसे जाज्वल्यमान थे। उनके नाम इस प्रकार हैं—अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, मरीचि, भृगु, अङ्गिरा, क्रतु, वसिष्ठ, वोढु, कपिल^१, आसुरि, कवि^२, शंकु, शङ्ख, पञ्चशिख और प्रचेता। उन तपोधनोंने ब्रह्माजीकी आज्ञासे दीर्घकालतक तप करके सृष्टिका कार्य सम्पन्न किया। वे सभी सपत्नीक थे और संसारकी सृष्टि करनेके लिये उन्मुख रहते थे। उन सभी तपोधनोंके बहुत-से पुत्र और पौत्र हुए। मुनिवंशकी परम्पराका कीर्तन करनेवाली वह मनोहर एवं पुण्यस्वरूपा कथा बहुत बड़ी है; अतः उसे यहीं समास किया जाता है। सुन्दरि राधिके! अब तुम वह कथा सुनो, जो प्रकृत प्रसङ्गके अनुकूल है। प्रचेतामुनिके पुत्र श्रीमान् मुनिवर असित हुए। असितने पुत्रकी कामनासे पत्नीसहित दीर्घकालतक तप किया; परंतु तब भी जब पुत्र नहीं हुआ तो वे अत्यन्त विषादग्रस्त हो गये। उस समय आकाशवाणी हुई—'मुने! तुम भगवान् शंकरके पास जाओ और उनके मुखसे मन्त्रका उपदेश ग्रहण करके उसे सिद्ध करो। उस मन्त्रकी जो अधिष्ठात्री देवी हैं वे शीघ्र ही तुम्हें साक्षात् दर्शन देंगी। उन अभीष्ट देवीके वरसे निश्चय ही तुम्हें पुत्रकी प्राप्ति होगी।' यह बात सुनकर वे ब्राह्मणदेवता शंकरजीके समीप गये। जो योगियोंके लिये भी अगम्य है, उस निरामय शिवलोकमें पहुँचकर पत्नीसहित असित दोनों हाथ जोड़ भक्तिभावसे मस्तक झुकाकर एक योगीकी भाँति योगियोंके गुरु महादेवजीकी स्तुति करने लगे।
असित बोले— जगद्गुरो! आपको नमस्कार है। आप शिव हैं और शिव (कल्याण)-के दाता हैं। योगीन्द्रोंके भी योगीन्द्र तथा गुरुओंके भी गुरु हैं; आपको प्रणाम है। मृत्युके लिये भी मृत्युरूप होकर जन्म-मृत्युमय संसारका खण्डन करनेवाले देवता! आपको नमस्कार है। मृत्युके ईश्वर! मृत्युके बीज! मृत्युञ्जय! आपको मेरा प्रणाम है। कालगणना करनेवालोंके लक्ष्यभूत कालरूप परमेश्वर! आप कालके भी काल, ईश्वर और कारण हैं तथा कालके लिये भी कालातीत हैं। कालकाल! आपको नमस्कार है। गुणातीत! गुणाधार! गुणबीज! गुणात्मक! गुणीश! और गुणियोंके आदिकारण! आप समस्त गुणवानोंके गुरु हैं; आपको नमस्कार है। ब्रह्मस्वरूप! ब्रह्मज्ञ!
१-२ अन्य पुराणोंके अनुसार कपिलजी कर्दमके तथा कवि भृगुके पुत्र थे। सम्भव है ये दूसरे कपिल हों।
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५७३
ब्रह्मचिन्तनपरायण! आपको नमस्कार है। आप वेदोंके बीजरूप हैं। इसलिये ब्रह्मबीज कहलाते हैं; आपको मेरा प्रणाम है।
इस प्रकार स्तुति करके शिवको प्रणाम करनेके पश्चात् मुनीश्वर असित उनके सामने खड़े हो गये और दीनकी भाँति नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे। उनके सम्पूर्ण शरीरमें रोमाञ्च हो आया। जो असितद्वारा किये गये महात्मा शंकरके इस स्तोत्रका प्रतिदिन भक्तिभावसे पाठ करता और एक वर्षतक नित्य हविष्य खाकर रहता है—उसे ज्ञानी, चिरञ्जीवी एवं वैष्णव पुत्रकी प्राप्ति होती है। जो धनाभावसे दुःखी हो, वह धनाढ्य और जो मूर्ख हो, वह पण्डित हो जाता है। पत्नीहीन पुरुषको सुशीला एवं पतिव्रता पत्नी प्राप्त होती है तथा वह इस लोकमें सुख भोगकर अन्तमें भगवान् शिवके समीप जाता है। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने यह उत्तम स्तोत्र प्रचेताको दिया था और प्रचेताने अपने पुत्र असितको।
**श्रीकृष्ण कहते हैं—**मुनिका यह स्तोत्र सुनकर भक्तवत्सल भगवान् शंकर स्वयं ही अपने भक्त ब्राह्मणसे बोले।
**शंकरजीने कहा—**मुनिश्रेष्ठ! धैर्य धारण करो। मैं तुम्हारी इच्छाको जानता हूँ; अतः सत्य कहता हूँ। तुम्हें मेरे अंशसे मेरे ही समान पुत्र प्राप्त होगा। इसके लिये मैं तुम्हें एक ऐसा मन्त्र दूँगा, जिसकी कहीं तुलना नहीं है तथा जो सबके लिये परम दुर्लभ है।
यों कहकर भगवान् शिवने असितमुनिको वहीं षोडशाक्षर मन्त्र, स्तोत्र, पूजाविधि, परम अद्भुत 'संसार-विजय' नामक कवच तथा पुरश्चरणका उपदेश दिया। साथ ही यह भी कहा कि 'इस मन्त्रकी इष्टदेवी तुम्हें वर देनेके लिये प्रत्यक्ष दर्शन देंगी।' यों कहकर रुद्रदेव चुप हो गये और असितमुनि उन्हें नमस्कार करके चले गये। उन्होंने सौ वर्षोंतक उस उत्कृष्ट मन्त्रका जप किया। सती राधिके! तदनन्तर तुमने ही मुनिको प्रत्यक्ष दर्शन देकर उन्हें वर दिया—'वत्स! तुम्हें निश्चय ही महाज्ञानी पुत्रकी प्राप्ति होगी।' यह वर देकर तुम पुनः गोलोकमें मेरे पास चली आयीं। तदनन्तर यथासमय भगवान् शिवके अंशसे असितके एक पुत्र हुआ, जो कामदेवके समान सुन्दर था। उसका नाम हुआ देवल। देवल ब्रह्मनिष्ठ महात्मा हुए। उन्होंने राजा सुयज्ञकी सुन्दरी कन्या रत्नमालावतीको, जो सबका मन मोह लेनेवाली थी, विवाहकी विधिसे सानन्द ग्रहण किया। दीर्घकालतक पत्नीके साथ रहकर कालान्तरमें मुनिवर देवल संसारसे विरक्त हो गये और सारा सुख छोड़कर धर्ममें तत्पर हो श्रीहरिके चिन्तनमें लग गये। एक समय रात्रिमें वे विरक्त तपोधन शय्यासे उठे और कमनीय गन्धमादन पर्वतपर तपस्याके लिये चले गये। उनकी पत्नीकी जब निद्रा टूटी, तब वह सती अपने स्वामीको वहाँ न देख विरहाग्निसे दग्ध हो शोकवश अत्यन्त विलाप करने लगी। वह उठकर कभी खड़ी होती और कभी पछाड़ खाकर गिरती थी। रत्नमालावती बारंबार उच्चस्वरसे रोदन करने लगी। तपे हुए पात्रमें पड़े हुए धान्यकी जो दशा होती है, वही दशा उस समय उसके मनकी थी। उस सुन्दरीने खाना-पीना छोड़कर प्राणोंका परित्याग कर दिया। उसके पुत्रने उसका दाह-संस्कार आदि पारलौकिक कृत्य किया। मुनिवर देवल मेरे भक्त एवं जितेन्द्रिय थे। उन्होंने एक सहस्र दिव्य वर्षोंतक गन्धमादनकी गुफामें तप किया।
एक दिन रम्भाने उन परम सुन्दर, शान्तस्वभाव एवं कन्दर्पसदृश रूपवान् मुनिको देख उनसे मिलनकी प्रार्थना की। मुनिने उसकी याचना स्वीकार न करके कहा—'रम्भे! सुनो। मैं वेदोंका
५७४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
सारभूत वचन सुना रहा हूँ, जो तपस्वी ब्राह्मणोंके कुलधर्मके अनुकूल और सत्य है। जो मनुष्य अपनी पत्नीको त्यागकर परायी स्त्रीके साथ सम्बन्ध स्थापित करता है, वह जीते-जी मरा हुआ है। उसके यश, धन और आयुकी हानि होती है। भूतलपर जिसके यशका विस्तार नहीं हुआ, उसका जीवन निष्फल है। एक तपस्वीको उत्तम सम्पत्ति, राज्य और सुखसे क्या लेना है? मैं निष्काम और वृद्ध हूँ। मुझसे तुम्हारा क्या प्रयोजन सिद्ध होगा? माँ! तुम सुन्दरी हो; अतः किसी उत्तम वेश-भूषावाले सुन्दर तरुण पुरुषकी खोज करो।'
देवलजीकी यह बात सुनते ही रम्भाको क्रोध आ गया। उसने पुनः अपनी वही बात दोहरायी। तब मुनि उसे कुछ भी उत्तर न देकर पूर्ववत् ध्यानस्थ हो गये। यह देख रम्भाने रोषपूर्वक शाप देते हुए कहा—'कुटिलहृदय ब्राह्मण! तेरे सारे अवयव टेढ़े-मेढ़े हो जायँ। तेरा शरीर काजलके समान काला तथा रूप-यौवनसे शून्य हो जाय। आकार अत्यन्त विकृत तथा तीनों लोकोंमें निन्दित हो और तेरा पुरातन तप अवश्य ही शीघ्र नष्ट हो जाय।'
यह शाप प्राप्त होनेपर जब मुनिवर देवलने आँख खोलकर देखा तो सारा अङ्ग विकृत तथा पूर्वपुण्यसे वर्जित दिखायी दिया। तब वे अग्निकुण्ड तैयार करके शोकवश अपने प्राण त्याग देनेको उद्यत हुए। उस समय मैंने उन्हें दर्शन एवं वर दिया तथा दिव्य ज्ञान देकर उन्हें समझाया। प्रेमपूर्वक मेरे आश्वासन देनेपर वे शान्त हुए। उन महामुनिके आठों अङ्गोंको वक्र देख मैंने तत्काल ही कौतूहलवश उनका नाम अष्टावक्र* रख दिया। मेरे कहनेसे उन्होंने मलयाचलकी कन्दरामें आकर साठ हजार वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या की। प्रिये! उस तपकी समाप्ति होनेपर मेरा वह भक्त मुझसे आ मिला है। मैंने स्वयं उसे अपनेमें मिला लिया है। प्रलयकालमें सबके नष्ट हो जानेपर भी मेरे भक्तका नाश नहीं होता। इस मुनिने आहार बिलकुल छोड़ दिया था। अतः दीर्घकालकी तपस्या एवं जठराग्निकी ज्वालासे इनके शरीरका भीतरी भाग जलकर भस्मरूप हो गया था। प्रिये! ये मुनि मेरे ही लिये मलयाचलकी कन्दरा छोड़कर यहाँ आये थे। इन अष्टावक्र (देवल)-से बढ़कर दूसरा कोई मेरा भक्त न तो हुआ है और न होगा। ब्रह्माजीके प्रपौत्र मुनिवर देवल ऐसे उत्तम तपस्वी थे; परंतु उस पुंश्चलीके शापसे उसी तरह हीन अवस्थाको पहुँच गये, जैसे पूर्वकालमें ब्रह्माजी अपूजनीय हो गये थे। महात्मा देवलका यह सारा गूढ़ रहस्य मैंने कह सुनाया, जो सुखद और पुण्यप्रद है। अब तुम और क्या सुनना चाहती हो? (अध्याय ३०)
* इस प्रसङ्गसे यह सूचित होता है कि असितपुत्र देवल (भी) कुछ कालतक 'अष्टावक्र' कहलाये। महाभारतके अनुसार 'अष्टावक्र' नामसे प्रसिद्ध एक दूसरे मुनि भी थे, जो जन्मसे ही वक्राङ्ग थे। उद्दालक-कन्या सुजाता उनकी माता थीं और महर्षि कहोड पिता। उन्होंने राजा जनकके दरबारमें शास्त्रार्थी पण्डित बन्दीको पराजित किया था। श्वेतकेतु उनके मामा थे। महर्षि वदान्यकी पुत्री सुप्रभाके साथ उनका विवाह हुआ था। समङ्गा नदीमें स्नान करनेसे इनके सब अङ्ग सीधे हो गये थे। महाभारत वनपर्वके अध्याय १३२ से लेकर १३४ तक उनका प्रसङ्ग है। अनुशासनपर्वके उन्तीसवें और इक्कीसवें अध्यायोंमें भी उनकी कथा आयी है।
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५७५ ब्रह्माजीका मोहिनीके शापसे अपूज्य होना, इस शापके निवारणके लिये उनका वैकुण्ठधाममें जाना और वहाँ अन्यान्य ब्रह्माओंके दर्शनसे उनके अभिमानका दूर होना तदनन्तर श्रीराधिकाने पूछा - श्यामसुन्दर ! ब्रह्माजीको क्यों और किससे शाप प्राप्त हुआ था ? श्रीकृष्ण बोले- प्रिये ! एक बार मोहिनीने ब्रह्माजीसे मिलनकी प्रार्थना की। बहुत समयतक उसका इसके लिये प्रयास चलता रहा; परंतु ब्रह्माजीने उसके उस प्रस्तावको ठुकरा दिया और एक दिन मुनियोंके सामने मोहिनीका उपहास किया। इससे मोहिनी कुपित हो उठी और शाप देती हुई बोली—'ब्रह्मन् ! मैं आपकी दासीके समान हूँ, विनयशील हूँ और दैववश आपकी शरणमें आयी हूँ तो भी आप घमंडमें आकर मेरी हँसी उड़ा रहे हैं; अतः सुदीर्घ कालके लिये आप अपूजनीय हो जायँ। स्वयं भगवान् श्रीहरि शीघ्र ही आपके दर्पका दलन करेंगे। अन्य देवताओंकी प्रत्येक युगमें वार्षिक पूजा होगी; किंतु आपकी नहीं होगी। इस कल्पमें या कल्पान्तरमें, इस देहमें अथवा देहान्तरमें फिर आपकी पूजा नहीं होगी। अबतक जो हो गयी, सो हो गयी।' यों कहकर मोहिनी शीघ्र ही कामलोकमें गयी और पुनः सचेत होनेपर अपने कुकृत्यको याद करके विलाप करने लगी। जगद्विधाता ब्रह्मा मोहिनीका शाप सुनकर काँप उठे। उनका मस्तक झुक गया। उस समय कल्याणकारी मुनियोंने उन्हें एक उपाय बताया—'आप भगवान् वैकुण्ठनाथकी शरणमें जाइये।' ऐसा कहकर वे ऋषि-मुनि अपने-अपने आश्रमोंको चले गये। तत्पश्चात् ब्रह्माजी मेरे ही दूसरे स्वरूप परम शान्त कमलाकान्त श्यामवर्ण भगवान् नारायणकी शरणमें गये। वहाँ जा खिन्नवदन हो चार भुजाधारी श्रीहरिको प्रणाम करके वे जगत्स्रष्टा ब्रह्मा उनके पास ही बैठे। उन्होंने विपत्तिसे उबारनेवाले, दयासिन्धु, दीनबन्धु भगवान्से अपने आगमनका रहस्य बताया। वह सारा रहस्य सुनकर भगवान् विष्णु हँसते हुए बोले। श्रीनारायणने कहा—लोकनाथ ! क्षणभर ठहरो। इसी बीचमें कोई शीघ्रगामी द्वारपाल श्रीहरिके सामने आया और उन्हें प्रणाम करके बोला— 'भगवन् ! दूसरे किसी ब्रह्माण्डके अधिपति दशमुख ब्रह्मा स्वयं पधारकर द्वारपर खड़े हैं। वे आपके महान् भक्त हैं और आपका दर्शन करनेके लिये ही आये हैं।' द्वारपालकी यह बात सुनकर भगवान् नारायणने उक्त ब्रह्माको भीतर बुला लानेके लिये उसे अनुमति दे दी। द्वारपालकी आज्ञासे ब्रह्माने भीतर आकर भक्तिभावसे भगवान्की स्तुति की। उन्होंने ऐसे-ऐसे अति विचित्र स्तोत्र सुनाये, जो चतुर्मुख ब्रह्माने कभी नहीं सुने थे। स्तुति करके भगवान् विष्णुकी आज्ञा पाकर वे चतुर्मुख ब्रह्माको पीछे करके बैठे। तदनन्तर भगवान् नारायणने अपने चार भुजाधारी द्वारपालोंसे कहा— 'जो कोई भी आगन्तुक सज्जन हों, उन्हें आदरपूर्वक भीतर ले आओ।' वृन्दावनविनोदिनि ! इसी समय वहाँ अत्यन्त विनीतभावसे स्वयं शतमुख ब्रह्माका आगमन हुआ। उन्होंने भी अत्यन्त सुन्दर दिव्य स्तोत्रोंद्वारा गूढ़भावसे भगवान्का स्तवन किया। उनके मुखसे निकले हुए श्रेष्ठ स्तोत्र सभीके लिये अश्रुतपूर्व (सर्वथा नवीन) थे। वे भी स्तुतिके पश्चात् भगवान्की आज्ञा पाकर पहलेके आये हुए दोनों ब्रह्माओंके आगे बैठ गये। इसके बाद दूसरे किसी ब्रह्माण्डके अधिपति सहस्रमुख ब्रह्मा श्रीहरिके सामने उपस्थित हुए। उन्होंने भी भक्तिभावसे मस्तक झुकाकर किसीके द्वारा भी अबतक नहीं सुने गये उत्तम स्तोत्रोंसे भगवान्की स्तुति की।
३२- देवी सती और पार्वतीके गर्व-मोचनकी कथा, सतीका देहत्याग, पार्वतीका जन्म, गर्ववश उनके द्वारा आकाशवाणीकी अवहेलना, शंकरजीका आगमन, शैलराजद्वारा उनकी स्तुति तथा उस स्तुतिकी महिमा
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तत्पश्चात् वे भी आज्ञा पाकर सबसे आगे बैठे। उनसे श्रीहरिने समस्त ब्रह्माण्डोंके ब्रह्माओंका और उनके राज्यमें रहनेवाले देवताओंका क्रमशः कुशल-समाचार पूछा। उन सब ब्रह्माओंको देखकर अपनेको विष्णु-तुल्य माननेवाले चतुर्मुख ब्रह्माका घमंड चूर-चूर हो गया। इसके बाद श्रीहरिने विभिन्न ब्रह्माण्डोंमें रहनेवाले अन्यान्य ब्रह्माओंके भी दर्शन कराये। उन्हें देखकर चतुर्मुख ब्रह्मा मृतक-तुल्य हो गये। उस समय भगवान्ने कहा—‘मुझ नारायणके शरीरमें जितने रोम हैं, उतने ही ब्रह्माण्ड और उनके उतने ही ब्रह्मा विद्यमान हैं।’ यह सुनकर वे सभी आगन्तुक ब्रह्मा नारायणको प्रणाम करके शीघ्र ही अपने-अपने स्थानको चले गये। चतुर्मुख ब्रह्माने अपनेको अत्यन्त छोटा तथा अल्प राज्यका अधिपति माना। लज्जासे उनका सिर झुक गया और वे भगवान् विष्णुके चरणोंमें पड़ गये। तब भगवान्ने उनसे पूछा—‘ब्रह्मन्! बोलो, इस समय तुमने स्वप्नकी भाँति यह क्या देखा है।’ उनका प्रश्न सुनकर ब्रह्मा बोले—‘प्रभो! भूत, वर्तमान और भविष्य—सारा जगत् आपकी मायासे ही उत्पन्न हुआ है।’ यों कह चतुर्भुज ब्रह्मा वैकुण्ठकी सभामें लज्जाका अनुभव करते हुए चुप हो गये। तब सर्वान्तर्यामी भगवान् श्रीहरिने उनके शाप-निवारणका उपाय किया।
(अध्याय ३१—३३)
गङ्गाकी उत्पत्ति तथा महिमा
**श्रीकृष्ण कहते हैं—**प्रिये! इसी बीचमें भगवान् शंकर वहाँ उपस्थित हुए। उनके मुखपर मुस्कराहट थी। वे सारे अङ्गोंमें विभूति लगाये वृषभराज नन्दिकेश्वरकी पीठपर बैठे थे। व्याघ्रचर्मका वस्त्र, सर्पमय यज्ञोपवीत, सिरपर सुनहरे रंगकी जटाका भार, ललाटमें अर्धचन्द्र, हाथोंमें त्रिशूल, पट्टिश तथा उत्तम खट्वाङ्ग धारण किये, श्रेष्ठ रत्नोंके सारतत्त्वसे निर्मित स्वर-यन्त्र लिये भगवान् शिव शीघ्र ही वाहनसे उतरे और भक्तिभावसे मस्तक झुका कमलाकान्तको प्रणाम करके उनके वामभागमें बैठे। फिर इन्द्र आदि समस्त देवता, मुनि, आदित्य, वसु, रुद्र, मनु, सिद्ध और चारण वहाँ पधारे। उन सबने पुरुषोत्तमकी स्तुति की। उस समय उनके सारे अङ्ग पुलकित हो रहे थे। फिर समस्त देवताओंने सिर झुकाकर भगवान् शिवको प्रणाम किया। तदनन्तर स्वर-यन्त्र लिये भगवान् शंकरने सुमधुर तालस्वरके साथ संगीत आरम्भ किया। प्रिये! उसमें हम दोनोंके गुणों तथा राससम्बन्धी सुन्दर पदोंका गान होने लगा।
मनको मोह लेनेवाले सामयिक राग,* कण्ठकी
* संगीतमें षड्ज आदि स्वरों, उनके वर्णों और अङ्गोंसे युक्त वह ध्वनि जो किसी विशिष्ट तालमें बैठायी हुई हो और जो मनोरञ्जनके लिये गायी जाती हो। संगीत-शास्त्रके भारतीय आचार्योंने छः राग माने हैं; परंतु इन
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५७७
एकतानता, एक मनोहर मौन, गुरु-लघुके क्रमसे पद-भेद-विराम, अतिदीर्घ गमक तथा मधुर आनन्दके साथ उन्होंने प्रेमपूर्वक स्वयं-निर्मित ऐसा संगीत छेड़ा, जो संसारमें अत्यन्त दुर्लभ है। उस समय भगवान् शिवके सम्पूर्ण अङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया था और वे नेत्रोंसे बारंबार आँसू बहाते थे। प्रिये! उस संगीतको सुननेमात्रसे वहाँ बैठे हुए मुनि तथा देवता मूर्च्छित एवं बेसुध हो द्रव (जल)-रूप हो गये। श्रीहरिके पार्षदोंकी तथा ब्रह्माजीकी भी यही दशा हुई। भगवान् नारायण, लक्ष्मी तथा गान करनेवाले स्वयं शिव भी द्रवरूप हो गये। प्राणेश्वरि! उस समय वैकुण्ठधामको जलसे पूर्ण हुआ देख मुझे शङ्का हुई। तब वहाँ जाकर मैंने उन सब देवता आदिकी मूर्तियों (शरीरों)-का पूर्ववत् निर्माण किया। उनके वैसे ही रूप, वैसे ही अस्त्र-शस्त्र तथा वैसे ही वाहन-भूषण बनाये। उनके स्वभाव, मन तथा विषय-वासनाएँ भी पूर्ववत् थीं। तदनन्तर उस जलराशिके लिये वैकुण्ठके चारों ओर स्थान बनाया; फिर उसकी अधिष्ठात्री देवी (गङ्गा) अपने उस वासस्थानमें आयीं।
समस्त देवताओंके शरीरोंसे उत्पन्न हुई वह
रागोंके नामोंके सम्बन्धमें बहुत मतभेद है। भरत और हनुमत्के मतसे ये छः राग इस प्रकार हैं—भैरव, कौशिक (मालकोस), हिंडोल, दीपक, श्री और मेघ। सोमेश्वर और ब्रह्माके मतसे इन छः रागोंके नाम इस प्रकार हैं—श्री, वसंत, पञ्चम, भैरव, मेघ और नटनारायण। नारद-संहिताका मत है कि मालव, मल्हार, श्री, वसंत, हिंडोल और कर्णाट—ये छः राग हैं। परंतु आजकल प्रायः ब्रह्मा और सोमेश्वरका मत ही अधिक प्रचलित है। स्वर-भेदसे राग तीन प्रकारके कहे गये हैं—(१) सम्पूर्ण, जिसमें सातों स्वर लगते हों; (२) षाड़व, जिसमें केवल छः स्वर लगते हों और कोई एक स्वर वर्जित हो; और (३) ओड़व, जिसमें केवल पाँच स्वर लगते हों और दो स्वर वर्जित हों। मतङ्गके मतसे रागोंके ये तीन भेद हैं—(१) शुद्ध, जो शास्त्रीय नियम तथा विधानके अनुसार हो और जिसमें किसी दूसरे रागकी छाया न हो; (२) सालंक या छायालग, जिसमें किसी दूसरे रागकी छाया भी दिखायी देती हो अथवा जो दो रागोंके योगसे बना हो और (३) संकीर्ण, जो कई रागोंके मेलसे बना हो। संकीर्णको ‘संकर राग’ भी कहते हैं। ऊपर जिन छः रागोंके नाम बतलाये गये हैं, उनमेंसे प्रत्येक रागका एक निश्चित सरगम या स्वर-क्रम है। उसका एक विशिष्ट स्वरूप माना गया है। उसके लिये एक विशिष्ट ऋतु, समय और पहर आदि निश्चित हैं। उसके लिये कुछ रस नियत हैं तथा अनेक ऐसी बातें भी कही गयी हैं, जिनमेंसे अधिकांश केवल कल्पित ही हैं। जैसे, माना गया है कि अमुक रागका अमुक द्वीप या वर्षपर अधिकार है, उसका अधिपति अमुक ग्रह है, आदि। इसके अतिरिक्त भरत और हनुमत्के मतसे प्रत्येक रागकी पाँच-पाँच रागिनियाँ और सोमेश्वर आदिके मतसे छः-छः रागिनियाँ हैं। इस अन्तिम मतके अनुसार प्रत्येक रागके आठ-आठ पुत्र तथा आठ-आठ पुत्रवधुएँ भी हैं। (४) यदि वास्तविक दृष्टिसे देखा जाय तो राग और रागिनीमें कोई अन्तर नहीं है। जो कुछ अन्तर है, वह केवल कल्पित है। हाँ, रागोंमें रागिनियोंकी अपेक्षा कुछ विशेषता और प्रधानता अवश्य होती है और रागिनियाँ उनकी छायासे युक्त जान पड़ती हैं; अतः हम रागिनियोंको रागोंके अवान्तर भेद कह सकते हैं। इसके सिवा और भी बहुत-से राग हैं, जो कई रागोंकी छायापर अथवा मेलसे बनते हैं और ‘संकर राग’ कहलाते हैं। शुद्ध रागोंकी उत्पत्तिके सम्बन्धमें लोगोंका विश्वास है कि जिस प्रकार श्रीकृष्णकी वंशीके सात छेदोंमेंसे सात स्वर निकले हैं, उसी प्रकार श्रीकृष्णजीकी १६०८ गोपिकाओंके गानेसे १६०८ प्रकारके राग उत्पन्न हुए थे और उन्हींमेंसे बचते-बचते अन्तमें केवल छः राग और उनकी ३० या ३६ रागिनियाँ रह गयीं। कुछ लोगोंका यह भी मत है कि महादेवजीके पाँच मुखोंसे पाँच राग (श्री, वसंत, भैरव, पञ्चम और मेघ) निकले हैं और पार्वतीके मुखसे छठा ‘नटनारायण’ राग निकला है।
१- संगीत-शास्त्रके अनुसार तालमेंका विराम जो सम, विषम, अतीत और अनागत—चार प्रकारका होता है।
२- संगीतमें एक श्रुति या स्वरपरसे दूसरी श्रुति या स्वरपर जानेका एक प्रकार। इसके सात भेद हैं—कम्पित, स्फुरित, लीन, भिन्न, स्थविर, आहत और आन्दोलित। पर साधारणतः लोग गानेमें स्वरके कँपानेको ही गमक कहते हैं। तबलेकी गम्भीर आवाजको भी गमक कहते हैं।
(हिंदी-शब्दसागरसे संकलित)
५७८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण दिव्य जलराशि ही देवनदी गङ्गाके नामसे प्रख्यात हुई। वह मुमुक्षुओंको मोक्ष और भक्तोंको हरि- भक्ति प्रदान करनेवाली है। उसका स्पर्श करके आयी हुई वायुके सम्पर्कसे भी पापियोंके करोड़ों जन्मोंके नानाविध पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं। प्राणेश्वरि ! देवनदीके साक्षात् दर्शन तथा स्पर्शका क्या फल होगा—यह मैं भी नहीं जानता; फिर उसके जलमें स्नान करनेसे प्राप्त होनेवाले पुण्यके विषयमें तो कहना ही क्या है ? उसकी महिमाका सम्यक् निरूपण असम्भव है। पृथ्वीपर 'पुष्कर' को सब तीर्थोंसे उत्तम बताया गया है। वेदोंने उसे सर्वश्रेष्ठ कहा है; परंतु वह भी इस (गङ्गा)-की सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं है। राजा भगीरथ इस देवनदीको भूतलपर लाये थे, इसलिये यह 'भागीरथी' नामसे प्रसिद्ध हुई। सुरधुनी अपने स्रोतके अंशसे पृथ्वीपर आयी थी; अतः 'गां गता' इस व्युत्पत्तिके अनुसार उसका 'गङ्गा' नाम प्रसिद्ध हुआ। इसके जलपर क्रोध होनेके कारण महात्मा जह्नुने इस नदीको अपने जानुओं (घुटनों)-द्वारा ग्रहण कर लिया था। फिर उनकी कन्यारूपसे इसका प्राकट्य हुआ; अतः इसका दूसरा नाम 'जाह्नवी' है। वसुके अवतार भीष्म इसके गर्भसे उत्पन्न हुए थे, इस कारण यह 'भीष्मसू' (भीष्मजननी) कहलाती है। गङ्गा मेरी आज्ञासे तीन धाराओंद्वारा स्वर्ग, पृथ्वी तथा पातालमें गयी है; अतः 'त्रिपथगा' कही जाती है। इसकी प्रमुख धारा स्वर्गमें है। वहाँ इसे 'मन्दाकिनी' कहते हैं। स्वर्गमें इसका पाट एक योजन चौड़ा है और यह दस हजार योजनकी दूरीमें प्रवाहित होती है। इसका जल दूधके समान स्वच्छ एवं स्वादिष्ट है तथा इसमें सदा ऊँची-ऊँची लहरें उठती रहती हैं। वैकुण्ठसे यह ब्रह्मलोकमें और वहाँसे स्वर्गमें आयी है। स्वर्गसे चलकर हिमालयके शिखरपर होती हुई यह प्रसन्नतापूर्वक पृथ्वीपर उतरी है। इसकी उस धाराका नाम 'अलकनन्दा' है। यह क्षार-समुद्रमें जाकर मिली है। इसकी जलराशि शुद्ध स्फटिकके समान स्वच्छ तथा अत्यन्त वेगवती है। यह पापियोंके पापरूपी सूखे काठको जलानेके लिये अग्निरूपिणी है। इसीने राजा सगरके पुत्रोंको निर्वाणमोक्ष प्रदान किया है। यह वैकुण्ठधामतक जानेके लिये श्रेष्ठ सोपान है। यदि मृत्युकालमें पहले पुण्यात्मा सत्पुरुषोंके चरणोंको धोकर उस चरणोदकको मुमूर्षु मनुष्यके मुखमें दिया जाय तो उसे गङ्गाजल पीनेका पुण्य होता है। ऐसे पुण्यात्मा सत्पुरुष गङ्गारूपी सोपानपर आरूढ़ हो निरामयपद (वैकुण्ठधाम)- को प्राप्त होते हैं। वे ब्रह्मलोकतकको लाँघकर विमानपर बैठे हुए निर्बाध गतिसे ऊपरके लोक (वैकुण्ठ)-में चले जाते हैं। यदि दैववश पूर्वकर्मके प्रभावसे पापी पुरुष गङ्गामें डूब जायँ तो वे शरीरमें जितने रोएँ हैं, उतने दिव्य वर्षोंतक भगवद्धाममें सानन्द निवास करते हैं। तदनन्तर उन्हें निश्चय ही अपने पाप-पुण्यका फल भोगना पड़ता है। परंतु वह भोग स्वल्पकालमें ही पूरा हो जाता है; तत्पश्चात् भारतवर्षमें पुण्यवानोंके घरमें जन्म ले निश्चल भक्ति पाकर वे भगवत्स्वरूप हो जाते हैं। जो शुद्धिके लिये यात्रा करके देवेश्वरी गङ्गामें नहानेके लिये जाता है, वह जितने पग चलता है, उतने वर्षोंतक अवश्य ही वैकुण्ठधाममें आनन्द भोगता है। यदि आनुषङ्गिकरूपसे भी गङ्गाको पाकर कोई पापयुक्त मनुष्य उसमें स्नान करता है तो वह उस समय सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। यदि वह फिर पापमें लिप्त न हो तो निष्पाप ही रहता है। कलियुगमें पाँच हजार वर्षोंतक भारतवर्षमें गङ्गाकी साक्षात् स्थिति है। उसके विद्यमान होते हुए कलिका क्या प्रभाव रह सकता है ? कलिमें दस हजार वर्षोंतक मेरी प्रतिमाएँ तथा पुराण रहते हैं। उनके होते हुए वहाँ कलिका प्रभाव क्या हो सकता है ?
दहन तथा पार्वतीको तपस्याद्वारा शिवकी प्राप्ति
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५७९
गङ्गाकी जो धारा पाताललोकको जाती है, उसका नाम भोगवती है। वह सदा दुग्ध-फेनके समान स्वच्छ तथा अत्यन्त वेगवती है। अमूल्य रत्नों तथा श्रेष्ठ मणियोंकी वह सदा खान बनी रहती है। सुस्थिर यौवनवाली नागकन्याएँ उसके तटपर सदा ही क्रीड़ा करती हैं। स्वयं देवी गङ्गा वैकुण्ठको चारों ओरसे घेरकर सदा प्रवाहित होती रहती हैं। मेरी इस पुत्रीका विनाश प्रलयकालमें भी नहीं होता। उसका परम मनोहर दिव्य तट नाना रत्नोंकी खान है। इस प्रकार गङ्गाके जन्मका सारा पुण्यदायक प्रसङ्ग मैंने कह सुनाया। अब ब्रह्माजीको मोहिनीके शापसे किस प्रकार छुटकारा मिला, यह सुनो।
(अध्याय ३४)
गङ्गा-स्नानसे ब्रह्माजीको मिले हुए शापकी निवृत्ति, गोलोकमें ब्रह्माजीको भारतीकी प्राप्ति, भारतीसहित ब्रह्माका अपने लोकमें प्रवेश, भगवान् शिवके दर्पभङ्गकी कथा, वृकासुरसे उनकी रक्षा, श्रीराधिकाके पूछनेपर श्रीकृष्णके द्वारा शिवके तत्त्व-रहस्यका निरूपण
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं— प्रिये! तदनन्तर सबने गङ्गाको देखकर मेरी माया मानी। उस समय नारायणने कृपापूर्वक ब्रह्माजीसे कहा।
श्रीनारायण बोले— चतुर्मुख! उठो, जाओ, तुम्हारा कल्याण होगा। तुम्हें शाप लगा है; अतः मेरी आज्ञासे इस गङ्गामें स्नान करके पवित्र हो जाओ। यद्यपि तुम स्वयं पवित्र हो और वे समस्त तीर्थ तुम वैष्णवपतिका स्पर्श प्राप्त करना चाहते हैं, तथापि प्रकृतिकी अवहेलना करने (हँसी उड़ाने)-से तुम्हें शाप मिला है। अहंकार सभीके लिये पापोंका बीज और अमङ्गलकारी होता है। तुम शीघ्र मेरे परात्पर धाम गोलोकको जाओ। वहाँ प्रकृतिकी अंशरूपा मङ्गलदायिनी भारतीको पाओगे। कल्याण-सृष्टिकी बीजरूपिणी प्रकृतिको अपनाओ। अहो! तुमने एक कल्पतक तप किया है तो भी इस समय एक अप्सराके शापसे कोई भी तुम्हारे मन्त्रको नहीं ग्रहण करते हैं। अन्य देवताओंकी पूजामें भी तुम्हारी ही पूजा होगी; क्योंकि तुम्हीं जगत्के धारण-पोषण करनेवाले, स्वात्माराम, सर्वरूपी तथा सब ओर समस्त देहोंमें पूजास्वरूप हो।
उस समय मेरी आज्ञा मानकर जगद्गुरु ब्रह्माने गङ्गाके जलमें स्नान किया और मुझे प्रणाम करके वे शीघ्र ही गोलोकको चले गये। फिर समस्त देवता और मुनि भी प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने स्थानको लौट गये। वे बारंबार मेरे परम निर्मल यशका गान कर रहे थे। ब्रह्माजीने गोलोकमें जाकर मेरे मुखारविन्दसे निर्गत, सम्पूर्ण विद्याओंकी अधिदेवी सती भारतीको प्राप्त किया। वागीश्वरी भारतीको पाकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। उन त्रिभुवनमोहिनी देवीको प्राप्त करके मुझे प्रणाम करनेके अनन्तर वे लौट आये। ब्रह्मलोकके निवासियोंने उन भारतीदेवीको देखा। वे कौतूहलसे भरी हुई, परम सुन्दरी, रमणीया तथा श्वेतवर्णा थीं। उनके मुखपर मन्द मुसकानकी प्रभा फैल रही थी। मुख शरद् ऋतुके चन्द्रमाको लज्जित कर रहा था। नेत्र शरद्-ऋतुके प्रफुल्ल कमलोंके समान जान पड़ते थे। दीप्तिमान् ओष्ठ और अधरपल्लव पके बिम्बफलकी प्रभाको छीने लेते थे। मुक्तापंक्तिकी शोभाको तिरस्कृत करनेवाली दन्तपंक्तियोंसे उनके मुखकी मनोहरता बढ़ गयी थी। रत्ननिर्मित केयूर-कंगन हाथोंकी और रत्नोंके नूपुर चरणोंकी शोभा बढ़ाते थे। रत्नमय युगल कुण्डलोंसे कानोंके नीचेके भाग झलमला रहे थे।
५८० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
रत्नेन्द्रसारनिर्मित हारसे उनका वक्षःस्थल अत्यन्त प्रकाशमान दिखायी देता था। वे अग्निशुद्ध सूक्ष्म वस्त्र धारण करके नूतन यौवनसे सम्पन्न एवं अत्यन्त कमनीय दृष्टिगोचर होती थीं। उनके दो हाथोंमें वीणा और पुस्तक तथा अन्य हाथोंमें व्याख्याकी मुद्रा देखी जाती थी। ब्रह्मलोकवासियोंने उनपर प्रिय वस्तुएँ निछावर करके परम मङ्गलमय उत्सव मनाया और ब्रह्मा तथा भारतीको वे सानन्द पुरीके भीतर ले गये।
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—प्रिये! ब्रह्माण्डोंमें जिन-जिन लोगोंको अपनी शक्तिपर गर्व होता है, उनके उस गर्व या अभिमानको जानकर मैं ही उनपर शासन करता हूँ—उनके घमंडको चूर कर देता हूँ; क्योंकि मैं सबका आत्मा और परात्पर परमेश्वर हूँ; पहले ब्रह्माके गर्वको जो मैंने चूर्ण किया था, वह प्रसङ्ग तो तुमने सुन लिया। अब शंकर, पार्वती, इन्द्र, सूर्य, अग्नि, दुर्वासा तथा धन्वन्तरिके अभिमान-भञ्जनका प्रसङ्ग क्रमशः सुनाता हूँ, सुनो। प्रिये! छोटे-बड़े जो भी लोग हैं, उनके इस तरहके गर्वको मैं अवश्य चूर्ण कर देता हूँ। स्वयं शिव मेरे अंश हैं, जगत्के संहारक हैं और मेरे समान ही तेज, ज्ञान तथा गुणसे परिपूर्ण हैं। प्रिये! योगीलोग उनका ध्यान करते हैं। वे योगीन्द्रोंके गुरुके भी गुरु हैं तथा ज्ञानानन्दस्वरूप हैं। उनकी कथा कहता हूँ, सुनो। साठ सहस्र युगोंतक दिन-रात तपस्या करके मेरी कलासे पूर्ण भगवान् शिव तप और तेजमें मेरे समान हो गये। सनातन तेजकी राशि हो गये। उनमें करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाश प्रकट हुआ। वे भक्तोंकी मनोवाञ्छा पूर्ण करनेके लिये कल्पवृक्षरूप हो गये। योगीन्द्रगण दीर्घकालतक उनके तेजका ध्यान करते-करते उसके भीतर अत्यन्त सुन्दर स्वरूपका साक्षात्कार करने लगते हैं। उनकी अङ्गकान्ति शुद्ध स्फटिकके समान उज्ज्वल है। वे पाँच मुखोंसे सुशोभित होते हैं और उनके प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र शोभा पाते हैं। हाथोंमें त्रिशूल और पट्टिश हैं। कटिभागमें व्याघ्रचर्ममय वस्त्र शोभा पाता है। वे श्वेत कमलके बीजकी मालासे स्वयं ही अपने-आपका—अपने मन्त्रोंका जप करते हैं। उनके प्रसन्न मुखपर मन्द हास्यकी छटा छायी रहती है। वे परात्पर शिव मस्तकपर अर्धचन्द्रका मुकुट तथा सुनहरे रंगकी जटाओंका भार धारण करते हैं। उनका स्वरूप शान्त है। वे तीनों लोकोंके स्वामी तथा भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर रहनेवाले हैं। अपने-आपको परमेश्वर मानकर समस्त सम्पत्तियोंके दाता होकर कल्पवृक्षके समान सबको सारी मनोवाञ्छित वस्तुएँ देते हैं। जो जिस वस्तुकी इच्छा करता है, उसे वही वर देकर वे समस्त वरोंके स्वामी हो गये हैं। इस प्रकार स्वात्माराम शिव अपनी ही लीलासे अभिमानको अपनाकर गर्वयुक्त हो गये।
एक समयकी बात है। वृक नामक दैत्यने शिवके केदारतीर्थमें एक वर्षतक दिन-रात कठोर तपस्या की। कृपानिधान शिव प्रतिदिन कृपापूर्वक अभीष्ट वर देनेके लिये उसके पास जाते थे; परंतु वह असुर किसी दिन भी वर नहीं ग्रहण करता था; वर्ष पूर्ण होनेपर भगवान् शंकर निरन्तर उसके सामने उपस्थित रहने लगे। वे भक्ति-पाशसे बँधकर वर देनेके लिये उद्यत हो क्षणभर भी वहाँसे अन्यत्र न जा सके। सम्पूर्ण ऐश्वर्य, समस्त सिद्धि, भोग, मोक्ष तथा श्रीहरिका पद—यह सब कुछ भगवान् शूलपाणि देना चाहते थे; परंतु उस दैत्यने कुछ भी ग्रहण नहीं किया। वह केवल उनके चरणकमलोंका ध्यान करता रहा। जब ध्यान टूटा, तब उस दैत्यराजने अपने सामने साक्षात् शिवको देखा, जो सम्पूर्ण सम्पदाओंके दाता हैं। उनकी ही मायासे प्रेरित हो वृकने भक्तिपूर्वक यह वर माँगा कि 'प्रभो! मैं जिसके माथेपर हाथ रख दूँ, वह जलकर भस्म हो
··· श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५८१
जाय।' तब 'बहुत अच्छा' कहकर जाते हुए भगवान् शिवके पीछे वह दैत्यराज दौड़ा। फिर तो मृत्युञ्जय शंकर मृत्युके भयसे त्रस्त होकर भागे। उनका डमरू गिर पड़ा। मनोहर व्याघ्रचर्मकी भी यही दशा हुई। वे दिगम्बर होकर दानवके भयसे दसों दिशाओंमें भागने लगे। वे चाहते तो उसे मार डालते; परंतु भक्तवत्सल जो ठहरे। अतः भक्तपर कृपा करके उसे मारते नहीं थे। साधु पुरुष दुष्टके अनुसार बर्ताव कदापि नहीं करते हैं। भगवान् शिव उसे समझा भी न सके। उन्होंने कृपापूर्वक उसे अपना स्वरूप ही माना; क्योंकि उनकी सर्वत्र समान दृष्टि थी। शिव उसे अपनी मृत्यु मानकर भयभीत हो उठे। उनका अहंकार गल गया। भद्रे! मुझे याद करते हुए उन्होंने मेरी ही शरण ली। उस समय मुझे अपने आश्रमपर आते देख उन्हें कुछ धैर्य मिला। उनके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये थे और वे भयसे विह्वल हो 'हे हरे! रक्षा करो, रक्षा करो'— इसका जप कर रहे थे। तब मैंने उस दैत्यको अपने पास बिठाकर समझाया और सब समाचार पूछा। पूछनेपर उसने सब बातें क्रमशः बतायीं। उस समय मेरी आज्ञासे वह असुर तुरंत मायाद्वारा ठगा गया। (मैंने उसको यह कहकर मोहमें डाल दिया कि तुम अपने सिरपर हाथ रखकर परीक्षा तो करो कि यह बात सत्य है या नहीं।) उसने अपने मस्तकपर हाथ रखा और तत्काल जलकर भस्म हो गया। तब सिद्ध, सुरेन्द्र, मुनीन्द्र और मनु प्रसन्नतापूर्वक उत्तम भक्तिभावसे मेरी स्तुति करने लगे और शिवजी लज्जित हो गये। उनका गर्व चूर्ण हो गया। फिर मैंने उन्हें समझाया और वे अपने स्थानको गये।
इसी तरह गर्वमें भरे हुए रुद्र भयानक असुर त्रिपुरका वध करनेके लिये गये। वे मन-ही-मन यह समझकर कि 'मैं तो समस्त लोकोंका संहारक हूँ, फिर मेरे सामने इस पतिंगेके समान दैत्यकी क्या बिसात है?' युद्धक्षेत्रमें गये। उस समय उन्होंने मेरे दिये हुए त्रिशूल तथा श्रेष्ठ कवचको साथ नहीं लिया था। उनका त्रिपुरके साथ एक वर्षतक दिन-रात युद्ध होता रहा; किंतु कोई भी किसीपर विजय नहीं पा सका। समराङ्गणमें दोनों समान सिद्ध हुए। प्रिये! पृथ्वीपर युद्ध करके दैत्यराज मायासे बहुत ऊँचाईपर पचास करोड़ योजन ऊपर उठ गया। साथ ही विश्वनाथ शंकर भी उस दैत्यका वध करनेके लिये तत्काल ऊपरको उठे। वहाँ निराधार स्थानपर एक मासतक युद्ध चलता रहा। भयानक संग्राम हुआ। अन्तमें शिवको उठाकर उस दैत्यने भूतलपर दे मारा। रथसहित रुद्रके धराशायी हो जानेपर देवर्षिगण भयभीत हो मेरी स्तुति करने लगे और बार-बार बोले—'श्रीकृष्ण! रक्षा करो, रक्षा करो।' भयका कारण उपस्थित हुआ जान शिवने निर्भयतापूर्वक मेरा ही स्मरण किया। उन्होंने संकटकालमें मेरे ही दिये हुए स्तोत्रसे भक्तिपूर्वक मेरा स्तवन किया। उस समय अपनी कलाद्वारा शीघ्र ही वृषभरूप धारण करके मैंने सोते शंकरको सींगोंसे उठाया और उन्हें अपना कवच तथा शत्रुर्मदन शूल दिया। उसे पाकर उन्होंने दानवोंके उस अत्यन्त ऊँचे स्थान त्रिपुरको, जो आकाशमें निराधार टिका हुआ था, मेरे दिये हुए शूलसे नष्ट कर दिया। इसके बाद शिवने मुझ दर्पहन्ताका ही बारंबार लज्जापूर्वक स्तवन किया। दैत्यराज त्रिपुर उसी क्षण चूर-चूर होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। यह देख सब देवता और मुनि प्रसन्नतापूर्वक शिवजीकी स्तुति करने लगे। तबसे भगवान् शंकरने विघ्नके बीजस्वरूप दर्पको त्याग दिया। वे ज्ञानानन्दस्वरूपसे स्थित हो सब कर्मोंमें निर्लिप्तभावसे संलग्न रहने लगे। तदनन्तर मैं अपने प्रिय भक्त शंकरको वृषरूपसे पीठपर वहन करने लगा; क्योंकि तीनों लोकोंमें शिवसे बढ़कर प्रियतम मेरे लिये दूसरा
३४- पार्वतीकी तपस्या, उनके तपके प्रभावसे अग्निका शीतल होना, ब्राह्मण-बालकका रूप धारण करके आये हुए शिवके साथ उनकी बातचीत, पार्वतीका घरको लौटना और माता-पिता आदिके द्वारा उनका सत्कार, भिक्षुवेशधारी शंकरका आगमन, शैलराजको उनके विविध रूपोंके दर्शन, उनकी शिव-भक्तिसे देवताओंको चिन्ता, उनका बृहस्पतिजीको शिव-निन्दाके लिये उकसाना तथा बृहस्पतिका देवताओंको शिव-निन्दाके दोष बताकर तपस्याके लिये जाना
| ५८२ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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कोई नहीं है$^१$। ब्रह्मा मेरे मनस्वरूप, महेश्वर मेरे ज्ञानरूप और मूलप्रकृति ईश्वरी भगवती दुर्गा मेरी बुद्धिरूपा हैं। निद्रा आदि जो-जो शक्तियाँ हैं, वे सब-की-सब प्रकृतिकी कलाएँ हैं। साक्षात् सरस्वती मेरी वाणीकी अधिष्ठात्री देवी हैं। कल्याणके अधिदेवता गणेशजी मेरे हर्ष हैं। स्वयं धर्म परमार्थ है तथा अग्निदेव मेरे भक्त हैं; गोलोकके सम्पूर्ण निवासी मेरे समस्त ऐश्वर्यके अधिदेवता हैं। तुम सदा मेरे प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी एवं प्राणोंसे भी अधिक प्यारी हो। गोपाङ्गनाएँ तुम्हारी कलाएँ हैं; अतएव मुझे प्यारी हैं। गोलोकनिवासी समस्त गोप मेरे रोमकूपसे उत्पन्न हुए हैं$^२$। सूर्य मेरे तेज और वायु मेरे प्राण हैं। वरुण जलके अधिदेवता तथा पृथ्वी मेरे मलसे प्रकट हुई है। मेरे शरीरका शून्यभाग ही महाकाश कहा गया है। कामकी उत्पत्ति मेरे मनसे हुई है। इन्द्र आदि सब देवता मेरी कलाके अंशांशसे प्रकट हुए हैं। सृष्टिके बीजरूप जो महत् आदि तत्त्व हैं, उन सबका बीजरूप आश्रयहीन आत्मा मैं स्वयं ही हूँ। कर्मभोगका अधिकारी जीव मेरा प्रतिबिम्ब है। मैं साक्षी और निरीह हूँ। किसी कर्मका भोगी नहीं हूँ। मुझ स्वेच्छामय परमेश्वरका यह शरीर भक्तोंके ध्यानके लिये है। एकमात्र परात्पर परमेश्वर मैं ही प्रकृति हूँ और मैं ही पुरुष हूँ।
श्रीराधिकाने पूछा—भगवन्! आप सब तत्त्वोंके ज्ञाता, सबके बीज और सनातन पुरुष हैं। समस्त संदेहोंका निवारण करनेवाले प्रभो! मेरे अभीष्ट प्रश्नका समाधान कीजिये। भगवान् शंकर सम्पूर्ण ज्ञानोंके अधिदेवता, समस्त तत्त्वोंके ज्ञाता, मृत्युञ्जय, कालके भी काल तथा आपके ही तुल्य महान् हैं। फिर वे अपने सारे अङ्गोंमें विभूति क्यों लगाते हैं? पञ्चमुख और त्रिलोचन क्यों कहलाते हैं? दिगम्बर और जटाधारी क्यों हैं? सर्प-समुदायसे क्यों विभूषित होते हैं? वे देवेन्द्र श्रेष्ठ वाहन छोड़कर वृषभके द्वारा क्यों भ्रमण करते हैं? रत्नसारनिर्मित आभूषण क्यों नहीं धारण करते हैं? अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्रको त्यागकर व्याघ्रचर्म क्यों पहनते हैं? पारिजात छोड़कर धतूरेके फूल क्यों धारण करते हैं? उन्हें मस्तकपर रत्नमय किरीट धारण करनेकी इच्छा क्यों नहीं होती? जटापर ही उनकी अधिक प्रीति क्यों है? दिव्यलोक छोड़कर उन प्रभुको श्मशानमें रहनेकी अभिलाषा क्यों होती है? चन्दन, अगुरु, कस्तूरी तथा सुगन्धित पुष्पोंको छोड़कर वे बिल्वपत्र तथा बिल्व-काष्ठके अनुलेपनकी स्पृहा क्यों रखते हैं? मैं यह सब जानना चाहती हूँ। प्रभो! आप विस्तारके साथ इसका वर्णन करें। नाथ! इसे सुननेके लिये मेरे मनमें कौतूहल बढ़ रहा है। इच्छा जाग उठी है।
राधिकाकी यह बात सुनकर मधुसूदनने हँसते हुए उन्हें अपने समीप बिठा लिया और कथा कहना आरम्भ किया।
श्रीकृष्ण बोले—प्रिये! पूर्णतम महेश्वरने साठ हजार युगोंतक तप करते हुए मनके द्वारा सानन्द मेरा ध्यान किया। तत्पश्चात् वे तपस्यासे विरत हो गये। इसी बीच उन्होंने मुझे अपने सामने खड़ा देखा। अत्यन्त कमनीय अङ्ग, किशोर अवस्था और परम उत्तम श्यामसुन्दर रूप—सब कुछ अनिर्वचनीय था। मेरे उस रूपको देखकर त्रिलोचनके लोचन तृप्त न हो सके। वे एकटक नेत्रोंसे देखते रहे तथा भक्तिके उद्रेकसे
१. ततोऽहं वृषरूपेण वहामि तेन तं प्रियम्। मम प्रियतमो नास्ति त्रैलोक्येषु शिवात्परः॥
(३६। ५७)
२. गोपाङ्गनास्तव कला अतएव मम प्रियाः। मल्लोमकूपजा गोपाः सर्वे गोलोकवासिनः॥
(३६। ६२)
९१- ब्राह्मणबालकका रूप धारणकर शंकरजीका तपस्या करती हुई पार्वतीके पास आना और उनसे बातचीत
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५८३ प्रेम-विह्वल हो महाभक्त शिव रोने लगे। उन्होंने सोचा, सहस्रमुख शेषनाग तथा चतुर्मुख ब्रह्मा बड़े भाग्यवान् हैं, जिन्होंने बहुसंख्यक नेत्रोंसे भगवान्के मनोहर रूपका दर्शन करके अनेक मुखोंसे उनकी स्तुति की है। मैं ऐसे स्वामीको पाकर दो ही नेत्रोंसे इनके रूपको क्या देखूँ और एक ही मुखसे इनकी क्या स्तुति करूँ? इस बातको उन्होंने चार बार दोहराया। तपस्वी शंकरके मन-ही-मन इस प्रकार संकल्प करनेपर उनके चार मुख और प्रकट हो गये तथा पहलेके मुखको लेकर पञ्चम संख्याकी ही पूर्ति हो गयी। उनका एक-एक मुख तीन-तीन नेत्रोंसे सुशोभित होने लगा; इसलिये वे पञ्चमुख और त्रिलोचन नामसे प्रसिद्ध हुए। शिवकी स्तुतिकी अपेक्षा मेरे रूपके दर्शनमें ही अधिक प्रेम है; इसलिये उनके नेत्र ही अधिक प्रकट हुए। उन ब्रह्मस्वरूप शिवके वे तीन नेत्र सत्त्व, रज तथा तम नामक तीन गुणरूप हैं; इसका कारण सुनो। भगवान् शिव सात्त्विक अंशवाली दृष्टिसे देखते हुए सात्त्विक जनोंकी, राजस दृष्टिसे राजसिक लोगोंकी तथा तामस दृष्टिसे तमोगुणी लोगोंकी रक्षा करते हैं। संहारकर्ता हरके ललाटवर्ती तामस नेत्रसे पीछे चलकर संहारकालमें क्रोधपूर्वक संवर्तक अग्निका आविर्भाव होता है। वे अग्निदेव करोड़ों ताड़ोंके बराबर ऊँचे, करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान तथा विशाल लपटोंसे युक्त हो अपनी जीभ लपलपाते हुए तीनों लोकोंको दग्ध कर देनेमें समर्थ हैं। भगवान् शंकर सतीके दाह-संस्कारजनित भस्मको लेकर अपने अङ्गोंमें मलते हैं। इसलिये 'विभूतिधारी' कहे जाते हैं। सतीके प्रति प्रेमभावके कारण ही वे उनकी हड्डियोंकी माला और भस्म धारण करते हैं। यद्यपि शिव स्वात्माराम हैं, तथापि उन्होंने पूरे एक सालतक सतीके शवको लेकर चारों ओर घूमते हुए रोदन किया था। सतीका एक-एक अङ्ग जहाँ-जहाँ गिरा, वहाँ- वहाँ सिद्धपीठ हो गया, जो मन्त्रोंकी सिद्धि प्रदान करनेवाला है। राधिके! तदनन्तर अवशिष्ट शवको छातीसे लगाकर वे मूर्च्छित हो सिद्धक्षेत्रमें गिर पड़े। तब मैंने महेश्वरके पास जा उन्हें गोदमें ले सचेत किया और शोकको हर लेनेवाले परम उत्तम दिव्य तत्त्वका उपदेश दिया। उस समय शिव संतुष्ट हो अपने लोकको पधारे और अपनी ही दूसरी मूर्ति कालके द्वारा उन्होंने अपनी प्रिया सतीको प्राप्त कर लिया। वे योगस्थ होनेके कारण दिगम्बर हैं। उन नित्य परमेश्वरमें इच्छाका सर्वथा अभाव है। उनके सिरपर जो जटाएँ हैं, वे तपस्या-कालकी हैं, जिन्हें वे आज भी विवेकपूर्वक धारण करते हैं। योगीको केशोंका संस्कार करने (बालोंको सँवारने) तथा शरीरको वेश-भूषासे विभूषित करनेकी इच्छा नहीं होती। उसका चन्दन और कीचड़में तथा मिट्टीके ढेले और श्रेष्ठ मणिरत्नमें भी समभाव होता है। गरुड़से द्वेष रखनेवाले सर्प भगवान् शंकरकी शरणमें गये। उन्हीं शरणागतोंको वे कृपापूर्वक अपने शरीरमें धारण करते हैं। उनका वृषभरूप वाहन तो मैं स्वयं हूँ। दूसरा कोई भी उनका भार वहन करनेमें समर्थ नहीं है। पूर्वकालमें त्रिपुरके वधके समय मेरे कलांशसे उस वृषभकी उत्पत्ति हुई। पारिजात आदि पुष्प तथा चन्दन आदि सुगन्धित पदार्थ वे शिव मुझको अर्पित कर चुके हैं; इसलिये उनमें उनकी कभी प्रीति नहीं होती। धतूर, बिल्वपत्र, बिल्व-काष्ठका अनुलेपन, गन्धहीन पुष्प तथा व्याघ्रचर्म योगियोंको अभीष्ट हैं। इसलिये उनमें उनकी सदा प्रीति रहती है। दिव्य लोकमें, दिव्य शय्यामें और जनसमुदायमें उनका मन नहीं लगता है; इसलिये वे अत्यन्त एकान्त श्मशानमें रहकर दिन-रात मेरा ध्यान किया करते हैं। ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त प्रत्येक प्राणीको भगवान् शिव समान समझते हैं। केवल मेरे इस अनिर्वचनीय रूपमें ही उनका मन निरन्तर लगा
५८४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण रहता है। ब्रह्माजीका पतन हो जानेपर भी शूलपाणि शंकरका क्षय नहीं होता। उनकी आयुका प्रमाण मैं भी नहीं जानता, फिर श्रुति क्या जानेगी ? मृत्युञ्जय शिव ज्ञानस्वरूप हैं। वे मेरे तेजके समान शूल धारण करते हैं। मेरे बिना कोई भी शंकरको जीत नहीं सकता। शंकर मेरे परम आत्मा हैं। शिव मेरे लिये प्राणोंसे भी बढ़कर हैं। उन त्रिलोचनमें मेरा मन सदा लगा रहता है। भगवान् भवसे बढ़कर मेरा प्रिय और कोई नहीं है। राधे ! मैं गोलोक और वैकुण्ठमें नहीं रहता। तुम्हारे वक्षमें भी वास नहीं करता। मैं तो सदाशिवके प्रेमपाशमें बँधकर उन्हींके हृदयमें निरन्तर निवास करता हूँ*। शंकर अपने पाँच मुखोंद्वारा मीठी तानके साथ सदा मेरी गाथाका स्वरसिद्ध गान किया करते हैं। इसलिये मैं उनके समीप रहता हूँ। वे योगद्वारा भ्रूभङ्गकी लीलामात्रसे ब्रह्माण्ड-समुदायकी सृष्टि और संहार करनेमें समर्थ हैं। शंकरसे बढ़कर दूसरा कोई योगी नहीं है। जो अपने दिव्य ज्ञानसे भ्रूभङ्ग-लीलाद्वारा नष्ट हुए मृत्यु और काल आदिकी पुनः सृष्टि करनेमें समर्थ हैं; उन शंकरसे बढ़कर कोई ज्ञानी नहीं है। वे मेरी भक्ति, दास्यभाव, मुक्ति, समस्त सम्पत्ति तथा सम्पूर्ण सिद्धिको भी देनेमें समर्थ हैं; अतः शंकरसे बढ़कर कोई दाता नहीं है। वे पाँच मुखोंसे दिन- रात मेरे नाम और यशका गान करते हैं और निरन्तर मेरे स्वरूपका ध्यान करते रहते हैं; अतः शंकरसे बढ़कर कोई भक्त नहीं है। मैं, सुदर्शनचक्र तथा शिव-ये तीनों समान तेजस्वी हैं। सृष्टिकर्ता ब्रह्मा भी योग और तेजमें हम लोगोंकी समानता नहीं करते हैं। प्रिये ! इस प्रकार मैंने शंकरके निर्मल यशका पूर्णतः वर्णन किया, तथापि उनका भी दर्प दलित हुआ। अब तुम और क्या सुनना चाहती हो ? (अध्याय ३५-३६) देवी सती और पार्वतीके गर्व-मोचनकी कथा, सतीका देहत्याग, पार्वतीका जन्म, गर्ववश उनके द्वारा आकाशवाणीकी अवहेलना, शंकरजीका आगमन, शैलराजद्वारा उनकी स्तुति तथा उस स्तुतिकी महिमा तदनन्तर शिव-निर्माल्यका प्रसङ्ग सुनाकर श्रीकृष्णने कहा-देवि ! जगद्गुरु शंकरके दर्प- भङ्गका वृत्तान्त तो तुमने सुन लिया। अब मुझसे दुर्गाके दर्पविमोचनकी कथा सुनो। सम्पूर्ण देवताओंके तेजसे प्रकट हो जगदम्बाने कामिनीका कमनीय एवं मनोहर रूप धारण किया तथा दानवेन्द्रोंका वध करके देवकुलकी रक्षा की। इसके बाद देवीने दक्षपत्नीके उदरसे जन्म लिया। दक्षकन्या सतीदेवीने पिनाकपाणि शिवको पतिरूपमें ग्रहण किया और बड़ी भक्तिके साथ वे निरन्तर स्वामीकी सेवामें लगी रहीं। दैवयोगसे देवताओंकी सभामें दक्षके साथ शिवकी अकारण शत्रुता हो गयी। दक्षने घर आकर एक यज्ञका आयोजन किया। उसमें उन्होंने समस्त देवताओंको आमन्त्रित किया; किंतु क्रोधके कारण शंकरको नहीं बुलाया। सब देवता अपनी पत्नियोंके साथ दक्षके घर आये; परंतु स्वाभिमानवश शंकर अपने गणोंके साथ वहाँ नहीं गये। उनके मनमें भी
- शंकरः परमात्मा मे प्राणेभ्योऽपि परः शिवः। त्र्यम्बके मन्मनः शश्वन्न प्रियो मे भवात्परः ॥ न संवसामि गोलोके वैकुण्ठे तव वक्षसि । सदाशिवस्य हृदये निबद्धः प्रेमपाशतः ॥ (३६।१०८, ११०)
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५८५ दक्षके प्रति बड़ा रोष था। सतीके मनमें पिता आदिके प्रति मोह था; इसलिये उन्होंने यत्नपूर्वक पतिदेवको उस यज्ञमें चलनेके लिये समझाया। जब किसी तरह उन्हें वहाँ ले जानेमें वे समर्थ न हो सकीं, तब स्वयं चञ्चल हो उठीं और पतिकी आज्ञा प्राप्त किये बिना ही दर्पवश पिताके घर चली आयीं। पतिके शापसे वहाँ उनका दर्प- भङ्ग हुआ। पिताने उनसे बाततक नहीं की। वाणीमात्रसे भी पुत्रीका सत्कार नहीं किया। इतना ही नहीं, उन्हें वहाँ पतिकी निन्दा भी सुननी पड़ी। उसे सुनकर स्वाभिमानवश सतीने अपने शरीरको त्याग दिया। प्रिये ! इस प्रकार सतीके दर्प-भङ्गका वृत्तान्त कहा गया। अब तुम उनके जन्मान्तर तथा दर्प- दलनकी कथा सुनो। सतीने शीघ्र ही गिरिराज हिमालयकी पत्नी मेनाके गर्भसे जन्म ग्रहण किया। शिवने प्रेमवश सतीकी चिताका भस्म और उनकी अस्थियाँ ग्रहण कीं। अस्थियोंकी तो माला बनायी और भस्मसे अङ्गरागका काम लिया। वे प्रेमवश बार-बार सतीको याद करते और उनके विरहमें इधर-उधर घूमते रहते थे। उधर मेनाने देवीको जन्म दिया। उनकी आकृति बड़ी ही मनोहर थी। विधाताकी सृष्टिमें गिरिराजनन्दिनीके लिये कहीं कोई उपमा नहीं थी। गुणोंकी तो वे जननी ही हैं; अतः सभी और सब प्रकारके सद्गुणोंको धारण करती हैं। समस्त देवपत्नियों उनकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हैं। जैसे शुक्लपक्षमें चन्द्रमाकी कला बढ़ती है, उसी तरह हिमालयके घरमें वे देवी दिनोंदिन बढ़ने लगीं। जब उन्होंने युवावस्थामें प्रवेश किया, तब उन जगदम्बाको सम्बोधित करके आकाशवाणीने कहा—'शिवे ! तुम कठोर तपस्याद्वारा भगवान् शिवको पति-रूपमें प्राप्त करो; क्योंकि तपस्याके बिना ईश्वरको पाना अथवा उनके अंशसे गर्भ धारण करना असम्भव है।' यह आकाशवाणी सुनकर यौवनके गर्वसे भरी हुई पार्वती हँसकर चुप हो रहीं। वह मन-ही-मन सोचने लगीं कि 'जो मेरे दूसरे जन्मकी अस्थि और भस्मको धारण करते हैं; वे इस जन्ममें मुझे सयानी हुई देख कैसे नहीं ग्रहण करेंगे। जो चतुर होकर भी मेरे शोकसे समूचे ब्रह्माण्डमें भटकते फिरे; वे ही मुझ परम सुन्दरीको अपनी आँखोंसे देख लेनेपर क्यों नहीं ग्रहण करेंगे ? जिन कृपानिधानने मेरे लिये दक्षयज्ञका विध्वंस कर डाला था; वे अपनी जन्म-जन्मकी पत्नी मुझ पार्वतीको क्यों नहीं ग्रहण करेंगे ? पूर्वजन्मसे ही जो जिसकी पत्नी है और जिसका जो पति है, उन दोनोंमें यहाँ भेद कैसे हो सकता है ? क्योंकि प्रारब्धको कोई पलट नहीं सकता।' अत्यन्त अभिमानके कारण अपनेको समस्त रूप और गुणोंका आधार मानकर साध्वी शिवाने तप नहीं किया। उन्होंने शिवको ईश्वर नहीं समझा। 'समस्त सुन्दरियोंमें मुझसे बढ़कर सुन्दरी दूसरी कोई नहीं है'—यह धारणा हृदयमें लेकर शिवादेवी गर्ववश तपस्यामें नहीं प्रवृत्त हुईं। वे यही सोचती थीं कि पुरुष अपनी स्त्रियोंके रूप, यौवन तथा वेश-भूषाका ग्राहक है। शिव मेरा नाम सुनते ही बिना तपस्याके मुझे ग्रहण कर लेंगे। मनमें यह विश्वास लेकर गिरिजा हिमवान्के घरमें रहती थीं और दिन-रात सखी-सहेलियोंके बीच खेल-कूदमें मतवाली रहा करती थीं। इसी समय शीघ्रतापूर्वक दूतने गिरिराजके भवनमें आकर दोनों हाथ जोड़ उनके सामने मधुर वाणीमें कहा। दूत बोला-शैलराज ! उठिये, उठिये। अक्षयवटके पास जाइये। वहाँ वृषभवाहन महादेवजी अपने गणोंके साथ पधारे हैं। महाराज ! आप भक्तिभावसे मस्तक झुका उन्हें मधुपर्क आदि देकर उन इन्द्रियातीत देवेश्वरका पूजन कीजिये।