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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

३४- दुर्गाकवचका वर्णन

गणपतिखण्ड ३११ बल-पराक्रमसे सम्पन्न बहुत-से भूपालोंका वध | उठाया। त्रिशूल चलाते समय आकाशवाणी हुई- कर डाला। इस समय यहाँ शिशु-अवस्थावाले | 'विप्रवरो ! शिवजीका यह त्रिशूल अमोघ है, इसे राजकुमार ही आये हैं। आपने सम्पूर्ण पृथ्वीको | मत चलाओ; क्योंकि मत्स्यराजके गलेमें सर्वाङ्गोंकी इक्कीस बार भूपालोंसे शून्य कर देनेके लिये जो | रक्षा करनेवाला शिवजीका दिव्य कवच बँधा है, प्रतिज्ञा की है, उसका पालन कीजिये। युद्ध | जिसे पूर्वकालमें दुर्वासाने दिया था। अतः पहले करना तो क्षत्रियोंका धर्म ही है। युद्धमें मृत्युको | राजासे उस प्राण-प्रदान करनेवाले कवचको माँग प्राप्त हो जाना उनके लिये निन्दित नहीं है; परंतु | लो।' मुने! तदनन्तर परशुरामने त्रिशूल चलाकर ब्राह्मणोंकी रण-स्पृहा लोक और वेद-दोनोंमें | राजापर चोट की, परंतु राजाके शरीरसे टकराकर विडम्बनाकी पात्र है। वाणी ही जिनका बल और | उस त्रिशूलके सौ टुकड़े हो गये। तब आकाशवाणी तप ही जिनका धन है, उन ब्राह्मणोंकी शान्ति ही | सुनकर महान् पराक्रमी जमदग्निनन्दन परशुरामने प्रत्येक युगमें स्वस्तिकारक कर्म है। युद्ध करना | शृङ्गधारी संन्यासीका वेष धारण करके राजासे ब्राह्मणका धर्म नहीं है। शान्तिपरायण ब्राह्मण | कवचकी याचना की। राजाने 'ब्रह्माण्ड-विजय' युद्धके लिये उद्योगशील हो, ऐसा तो न देखनेमें | नामक वह उत्तम कवच उन्हें दे दिया। उस ही आया है और न सुना ही गया है। भगवान् | कवचको लेकर परशुरामने पुनः त्रिशूलसे ही नारायणके विद्यमान रहते यह दूसरी तरहका | प्रहार किया। उसके आघातसे मत्स्यराज, जो उलट-फेर कैसे हो गया ? | चन्द्रवंशमें उत्पन्न, गुणवान् और महाबली था, रणाङ्गणमें यों कहकर राजेन्द्र कार्तवीर्य | जिसके मुखकी कान्ति सैकड़ों चन्द्रमाओंके समान शान्त हो गया। उसके उस वचनको सुनकर सभी | थी, भूतलपर गिर पड़ा। लोग मौन हो गये। तदनन्तर परशुरामके सभी | नारदने कहा-महाभाग नारायण ! मत्स्यराजने भाई, जो बड़े शूरवीर तथा हाथोंमें अत्यन्त तीखे | शिवजीके जिस कवचको धारण किया था, शस्त्र धारण किये हुए थे, उनकी आज्ञासे युद्ध | उसका वर्णन कीजिये; क्योंकि उसे सुननेके लिये करनेके लिये आगे बढ़े। तब जो स्वयं मङ्गलस्वरूप | मुझे कौतूहल हो रहा है। तथा मङ्गलोंका आश्रयस्थान था, उस महाबली | नारायण बोले-विप्रवर ! महात्मा शंकरके मत्स्यराजने भी उन सबको युद्धोन्मुख देखकर | उस 'ब्रह्माण्डविजय' नामक कवचका, जो सर्वाङ्गकी युद्ध करना आरम्भ किया। उस राजेन्द्रने बाणोंका | रक्षा करनेवाला है, वर्णन करता हूँ; सुनो। जाल बिछाकर उन सभीको रोक दिया। तब | पूर्वकालमें दुर्वासाने बुद्धिमान् मत्स्यराजको सम्पूर्ण जमदग्निके पुत्रोंने उस बाण-समूहको छिन्न-भिन्न | पापोंका समूल नाश करनेवाला षडक्षर-मन्त्र कर दिया। मुने! राजाने सैकड़ों सूर्योंके समान | बतलाकर इसे प्रदान किया था। यदि सिद्धि प्राप्त प्रकाशमान दिव्यास्त्र चलाया; परंतु मुनियोंने | हो जाय तो इस कवचके शरीरपर स्थित रहते माहेश्वरास्त्रके द्वारा खेल-ही-खेलमें उसे काट दिया। | अस्त्र-शस्त्रके प्रहारके समय, जलमें तथा अग्निमें पुनः मुनियोंने दिव्यास्त्रद्वारा राजाके बाणसहित | प्राणियोंकी मृत्यु नहीं होती-इसमें संशय नहीं धनुष, रथ, सारथि और कवचकी धज्जियाँ उड़ा | है। जिसे पढ़कर एवं धारण करके दुर्वासा सिद्ध दीं। इस प्रकार राजाको शस्त्रहीन देखकर | होकर लोकपूजित हो गये, जिसके पढ़ने और मुनियोंको महान् हर्ष हुआ। तब उन्होंने मत्स्यराजका | धारण करनेसे जैगीषव्य महायोगी कहलाने लगे। वध करनेकी इच्छासे शिवजीका त्रिशूल हाथमें | जिसे धारण करके वामदेव, देवल, स्वयं च्यवन,

३१२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

अगस्त्य और पुलस्त्य विश्ववन्द्य हो गये। 'ॐ नमः शिवाय' यह सदा मेरे मस्तककी रक्षा करे। 'ॐ नमः शिवाय स्वाहा' यह सदा ललाटकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं शिवाय स्वाहा' सदा नेत्रोंकी रक्षा करे। ॐ ह्रीं क्लीं हूं शिवाय नमः' मेरी नासिकाकी रक्षा करे। 'ॐ नमः शिवाय शान्ताय स्वाहा' सदा कण्ठकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं हूं संहारकर्त्रे स्वाहा' सदा कानोंकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं पञ्चवक्त्राय स्वाहा' सदा दाँतकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं महेशाय स्वाहा' सदा मेरे ओठकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं त्रिनेत्राय स्वाहा' सदा केशोंकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं ऐं महादेवाय स्वाहा' सदा छातीकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं रुद्राय स्वाहा' सदा नाभिकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं ऐं श्रीं ईश्वराय स्वाहा' सदा पृष्ठभागकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं क्लीं मृत्युञ्जयाय स्वाहा' सदा भौंहोंकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ईशानाय स्वाहा' सदा पार्श्वभागकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं ईश्वराय स्वाहा' सदा मेरे उदरकी रक्षा करे। 'ॐ श्रीं क्लीं मृत्युञ्जयाय स्वाहा' सदा भुजाओंकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ईश्वराय स्वाहा' मेरे हाथोंकी रक्षा करे। 'ॐ महेश्वराय रुद्राय नमः' सदा मेरे नितम्बकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं भूतनाथाय स्वाहा' सदा पैरोंकी रक्षा करे। 'ॐ सर्वेश्वराय सर्वाय स्वाहा' सदा सर्वाङ्गकी रक्षा करे। पूर्वमें 'भूतेश' मेरी रक्षा करें। अग्निकोणमें 'शंकर' रक्षा करें। दक्षिणमें 'रुद्र' तथा नैर्ऋत्यकोणमें स्थाणु मेरी रक्षा करें। पश्चिममें 'खण्डपरशु', वायव्यकोणमें 'चन्द्रशेखर', उत्तरमें 'गिरिश' और ईशानकोणमें स्वयं 'ईश्वर' रक्षा करें। ऊर्ध्वभागमें 'मृड' और अधोभागमें स्वयं 'मृत्युञ्जय' सदा रक्षा करें। जलमें, स्थलमें, आकाशमें, सोते समय अथवा जागते रहनेपर भक्तवत्सल 'पिनाकी' सदा मुझ भक्तकी स्नेहपूर्वक रक्षा करें।

वत्स! इस प्रकार मैंने तुमसे इस परम अद्भुत कवचका वर्णन कर दिया। इसके दस लाख जपसे ही सिद्धि हो जाती है, यह निश्चित है। यदि यह कवच सिद्ध हो जाय तो वह निश्चय ही रुद्र-तुल्य हो जाता है। वत्स! तुम्हारे स्नेहके कारण मैंने वर्णन कर दिया है, तुम्हें इसे किसीको नहीं बतलाना चाहिये; क्योंकि यह काण्वशाखोक्त कवच अत्यन्त गोपनीय तथा परम दुर्लभ है। सहस्रों अश्वमेध और सैकड़ों राजसूय—ये सभी इस कवचकी सोलहवीं कलाकी समानता नहीं कर सकते। इस कवचकी कृपासे मनुष्य निश्चय ही जीवन्मुक्त, सर्वज्ञ, सम्पूर्ण सिद्धियोंका स्वामी और मनके समान वेगशाली हो जाता है। इस कवचको बिना जाने जो भगवान् शंकरका भजन करता है, उसके लिये एक करोड़ जप करनेपर भी मन्त्र सिद्धिदायक नहीं होता।* (अध्याय ३५)


* नारायण उवाच—
कवचं शृणु विप्रेन्द्र शङ्करस्य महात्मनः। ब्रह्माण्डविजयं नाम सर्वावयवरक्षणम्॥
पुरा दुर्वाससा दत्तं मत्स्यराजाय धीमते। दत्त्वा षडक्षरं मन्त्रं सर्वपापप्रणाशनम्॥
स्थिते च कवचे देहे नास्ति मृत्युश्च जीविनाम्। अस्त्रे शस्त्रे जले वह्नौ सिद्धिश्चैत्रास्ति संशयः॥
यद् धृत्वा पठनात् सिद्धो दुर्वासा विश्वपूजितः॥
जैगीषव्यो महायोगी पठनाद् धारणाद् यतः। यद् धृत्वा वामदेवश्च देवलश्च्यवनः स्वयम्॥
अगस्त्यश्च पुलस्त्यश्च बभूव विश्वपूजितः॥
ॐ नमः शिवायति च मस्तकं मे सदाऽवतु। ॐ नमः शिवायति च स्वाहा भालं सदाऽवतु॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं शिवायति स्वाहा नेत्रे सदाऽवतु। ॐ ह्रीं क्लीं हूं शिवायति नमो मे पातु नासिकाम्॥
ॐ नमः शिवाय शान्ताय स्वाहा कण्ठं सदाऽवतु। ॐ ह्रीं श्रीं हूं संहारकर्त्रे स्वाहा कर्णौ सदाऽवतु॥
ॐ ह्रीं श्रीं पञ्चवक्त्राय स्वाहा दन्तं सदाऽवतु। ॐ ह्रीं महेशाय स्वाहा चाधरं पातु मे सदा॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं त्रिनेत्राय स्वाहा केशान् सदाऽवतु। ॐ ह्रीं ऐं महादेवाय स्वाहा वक्षः सदाऽवतु॥

३५- परशुरामद्वारा पुत्रसहित राजा सहस्राक्षका वध, कार्तवीर्य-परशुराम-युद्ध, परशुरामकी मूर्च्छा, शिवद्वारा उन्हें पुनर्जीवनदान, कार्तवीर्य-परशुराम-संवाद, आकाशवाणी सुनकर शिवका विप्रवेष धारण करके कार्तवीर्यसे कवच माँग लेना, परशुद्वारा कार्तवीर्य तथा अन्यान्य क्षत्रियोंका संहार, ब्रह्माका आगमन और परशुरामको गुरुस्वरूप शिवकी शरणमें जानेका उपदेश देकर स्वस्थानको लौट जाना

गणपतिखण्ड ३९३

मत्स्यराजके वधके पश्चात् अनेकों राजाओंका आना और परशुरामद्वारा मारा जाना, पुनः राजा सुचन्द्र और परशुरामका युद्ध, परशुरामद्वारा कालीस्तवन, ब्रह्माका आकर परशुरामको युक्ति बताना, परशुरामका राजा सुचन्द्रसे मन्त्र और कवच माँगकर उसका वध करना

श्रीनारायण कहते हैं—नारद! युद्धमें मत्स्यराजके गिर जानेपर महाराज कार्तवीर्यके भेजे हुए बृहद्वल, सोमदत्त, विदर्भ, मिथिलेश्वर, निषधराज, मगधाधिपति एवं कान्यकुब्ज, सौराष्ट्र, राढीय, वारेन्द्र, सौम्य वंगीय, महाराष्ट्र, गुर्जरजातीय और कलिंग आदिके सैकड़ों-सैकड़ों राजा बारह अक्षौहिणी सेनाके साथ आये; परंतु परशुरामजीने सबको रणभूमिमें सुला दिया। यह देखकर एक लाख नरपतियोंके साथ बारह अक्षौहिणी सेना लेकर राजा सुचन्द्र रणस्थलमें आये। सुचन्द्रके साथ भयानक युद्ध हुआ, पर वे परास्त न हो सके। तब परशुरामने देखा कि मुण्डमाला धारण किये हुए विकटानना भयंकरी जगज्जननी भद्रकाली उनकी रक्षा कर रही हैं। यह देखकर परशुरामने शस्त्रास्त्रका त्याग करके महामायाकी स्तुति आरम्भ की।

परशुराम बोले—आप शंकरजीकी प्रियतमा पत्नी हैं, आपको नमस्कार है। सारस्वरूपा आपको बारंबार प्रणाम है। दुर्गतिनाशिनीको मेरा अभिवादन है। मायारूपा आपको मैं बारंबार सिर झुकाता हूँ। जगद्धात्रीको नमस्कार-नमस्कार। जगत्कर्त्रीको पुनः-पुनः प्रणाम। जगज्जननीको मेरा नमस्कार प्राप्त हो। कारणरूपा आपको बारंबार अभिवादन है। सृष्टिका संहार करनेवाली जगन्माता! प्रसन्न होइये। मैं आपके चरणोंकी शरण ग्रहण करता हूँ, मेरी प्रतिज्ञा सफल कीजिये। मेरे प्रति आपके विमुख हो जानेपर कौन मेरी रक्षा कर सकता है? भक्तवत्सले! शुभे! आप मुझ भक्तपर कृपा कीजिये। सुमुखि! पहले शिवलोकमें आपलोगोंने मुझे जो वरदान दिया था, उस वरको आपको सफल करना चाहिये।

परशुरामद्वारा किये गये इस स्तवनको सुनकर

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं रुद्राय स्वाहा नाभिं सदाऽवतु। ॐ ह्रीं ऐं श्रीं ईश्वराय स्वाहा पृष्ठं सदाऽवतु॥
ॐ ह्रीं क्लीं मृत्युञ्जयाय स्वाहा भ्रूश्च सदाऽवतु। ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ईशानाय स्वाहा पार्श्वं सदाऽवतु॥
ॐ ह्रीं ईश्वराय स्वाहा उदरं पातु मे सदा। ॐ श्रीं क्लीं मृत्युञ्जयाय स्वाहा बाहू सदाऽवतु॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ईश्वराय स्वाहा पातु करौ मम। ॐ महेश्वराय रुद्राय नितम्बं पातु मे सदा॥
ॐ ह्रीं श्रीं भूतनाथाय स्वाहा पादौ सदाऽवतु। ॐ सर्वेश्वराय सर्व्वाय स्वाहा सर्वं सदाऽवतु॥
प्राच्यां मां पातु भूतेश आग्नेय्यां पातु शंकरः। दक्षिणे पातु मां रुद्रो नैर्ऋत्यां स्थाणुरेव च॥
पश्चिमे खण्डपरशुर्वायव्यां चन्द्रशेखरः। उत्तरे गिरिशः पातु ऐशान्यामीश्वरः स्वयम्॥
ऊर्ध्वे मृडः सदा पातु अधो मृत्युञ्जयः स्वयम्। जले स्थले चान्तरिक्षे स्वप्ने जागरणे सदा॥
पिनाकी पातु मां प्रीत्या भक्तं च भक्तवत्सलः॥
इति ते कथितं वत्स कवचं परमाद्भुतम्। दशलक्षजपेनैव सिद्धिर्भवति निश्चितम्॥
यदि स्यात् सिद्धकवचो रुद्रतुल्यो भवेद् ध्रुवम्। तव स्नेहान्मयाऽऽख्यातं प्रवक्तव्यं न कस्यचित्॥
कवचं काण्वशाखोक्तमतिगोप्यं सुदुर्लभम्। अश्वमेधसहस्राणि राजसूयशतानि च॥
सर्वाणि कवचस्यास्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्। कवचस्य प्रसादेन जीवन्मुक्तो भवेन्नरः॥
सर्वज्ञः सर्वसिद्धीशो मनोयायी भवेद् ध्रुवम्। इदं कवचमज्ञात्वा भजेद् यः शङ्करं प्रभुम्॥
शतलक्षप्रजप्तोऽपि न मन्त्रः सिद्धिदायकः॥

(३५।११४-११६, ११९-१३९)

३९४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

अम्बिकाका मन प्रसन्न हो गया और 'भय मत करो' यों कहकर वे वहीं अन्तर्धान हो गयीं। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस परशुरामकृत स्तोत्रका पाठ करता है, वह अनायास ही महान् भयसे छूट जाता है। वह त्रिलोकीमें पूजित, त्रैलोक्यविजयी, ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ और शत्रुपक्षका विमर्दन करनेवाला हो जाता है*। इसी बीच ब्रह्माजी धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भृगुवंशी परशुरामके पास आकर उनसे उस रहस्यका वर्णन करने लगे।

ब्रह्माजी बोले—महाभाग राम! अपनी प्रतिज्ञा सफल करनेके लिये पहले तुम सुचन्द्रकी विजयके हेतुभूत रहस्यका मुझसे श्रवण करो। पूर्वकालमें दुर्वासाने सुचन्द्रको दशाक्षरी महाविद्या तथा भद्रकालीका परम दुर्लभ कवच प्रदान किया था। भद्रकालीका कवच देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ है। वह कवच सम्पूर्ण शत्रुओंका विनाश करनेवाला, अत्यन्त पूजनीय, प्रशंसनीय और त्रिलोकीपर विजय पानेका कारण है। वह कवच जिसके गलेमें वर्तमान है, उसे जीतनेके लिये भूतलपर तुम कैसे समर्थ हो सकते हो? अतः भार्गव! तुम भिक्षाके लिये जाओ और राजासे प्रार्थना करो। सूर्यवंशमें उत्पन्न हुआ वह राजा परम धर्मात्मा एवं दानी है। माँगनेपर वह निश्चय ही प्राण, कवच, मन्त्र आदि सब कुछ दे डालेगा।

मुने! तब परशुराम संन्यासीका वेष धारण करके राजाके पास गये और उससे उन्होंने मन्त्र तथा परम अद्भुत कवचकी याचना की। तब राजाने अत्यन्त आदरपूर्वक उन्हें मन्त्र और कवच दे दिया। तदनन्तर परशुरामने शंकरजीके त्रिशूलसे उस राजाका काम तमाम कर दिया।

(अध्याय ३६)


दशाक्षरी महाविद्या तथा काली-कवचका वर्णन

नारदजीने कहा—सर्वज्ञ नाथ! अब मैं आपके मुखसे भद्रकाली-कवच तथा उस दशाक्षरी महाविद्याको सुनना चाहता हूँ।

श्रीनारायण बोले—नारद! मैं दशाक्षरी महाविद्या तथा तीनों लोकोंमें दुर्लभ उस गोपनीय कवचका वर्णन करता हूँ, सुनो। 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं कालिकायै स्वाहा' यही दशाक्षरी महाविद्या है। इसे पुष्करतीर्थमें सूर्य-ग्रहणके अवसरपर दुर्वासाने राजाको दिया था। उस समय राजाने दस लाख जप करके मन्त्र सिद्ध किया और


* परशुराम उवाच—
नमः शङ्करकान्तायै सारायै ते नमो नमः। नमो दुर्गतिनाशिन्यै मायायै ते नमो नमः॥
नमो नमो जगद्धात्र्यै जगत्कर्त्र्यै नमो नमः। नमोऽस्तु ते जगन्मात्रे कारणायै नमो नमः॥
प्रसीद जगतां मातः सृष्टिसंहारकारिणि। त्वत्पादे शरणं यामि प्रतिज्ञां सार्थिकां कुरु॥
त्वयि मे विमुखायां च को मां रक्षितुमीश्वरः। त्वं प्रसन्ना भव शुभे मां भक्तं भक्तवत्सले॥
युष्माभिः शिवलोके च मह्यं दत्तो वरः पुरा। तं वरं सफलं कर्तुं त्वमर्हसि वरानने॥
जामदग्न्यस्तवं श्रुत्वा प्रसन्नाभवदम्बिका। मा भैरित्येवमुक्त्वा तु तत्रैवान्तरधीयत॥
एतद् भृगुकृतं स्तोत्रं भक्तियुक्तश्च यः पठेत्। महाभयात् समुत्तीर्णः स भवेदवलीलया॥
स पूजितश्च त्रैलोक्ये त्रैलोक्यविजयी भवेत्। ज्ञानिश्रेष्ठो भवेच्चैव वैरिपक्षविमर्दकः॥
(गणपतिखण्ड ३६। २९—३६)

गणपतिखण्ड ३९५

इस उत्तम कवचके पाँच लाख जपसे ही वे सिद्धकवच हो गये। तत्पश्चात् वे अयोध्यामें लौट आये और इसी कवचकी कृपासे उन्होंने सारी पृथ्वीको जीत लिया।

नारदजीने कहा—प्रभो! जो तीनों लोकोंमें दुर्लभ है, उस दशाक्षरी महाविद्याको तो मैंने सुन लिया। अब मैं कवच सुनना चाहता हूँ, वह मुझसे वर्णन कीजिये।

श्रीनारायण बोले—विप्रेन्द्र! पूर्वकालमें त्रिपुर-वधके भयंकर अवसरपर शिवकी विजयके लिये नारायणने कृपा करके शिवको जो परम अद्भुत कवच प्रदान किया था, उसका वर्णन करता हूँ, सुनो। मुने! वह कवच अत्यन्त गोपनीयोसे भी गोपनीय, तत्त्वस्वरूप तथा सम्पूर्ण मन्त्रसमुदायका मूर्तिमान् स्वरूप है। उसीको पूर्वकालमें शिवजीने दुर्वासाको दिया था और दुर्वासाने महामनस्वी राजा सुचन्द्रको प्रदान किया था।

‘ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं कालिकायै स्वाहा’ मेरे मस्तककी रक्षा करे। ‘क्लीं’ कपालकी तथा ‘ह्रीं ह्रीं ह्रीं’ नेत्रोंकी रक्षा करे। ‘ॐ ह्रीं त्रिलोचने स्वाहा’ सदा मेरी नासिकाकी रक्षा करे। ‘क्रीं कालिके रक्ष रक्ष स्वाहा’ सदा दाँतोंकी रक्षा करे। ‘ह्रीं भद्रकालिके स्वाहा’ मेरे दोनों ओठोंकी रक्षा करे। ‘ॐ ह्रीं ह्रीं क्लीं कालिकायै स्वाहा’ सदा कण्ठकी रक्षा करे। ‘ॐ ह्रीं कालिकायै स्वाहा’ सदा दोनों कानोंकी रक्षा करें। ‘ॐ क्रीं क्रीं क्लीं काल्यै स्वाहा’ सदा मेरे कंधोंकी रक्षा करे। ‘ॐ क्रीं भद्रकाल्यै स्वाहा’ सदा मेरे वक्षःस्थलकी रक्षा करे। ‘ॐ क्रीं कालिकायै स्वाहा’ सदा मेरी नाभिकी रक्षा करे। ‘ॐ ह्रीं कालिकायै स्वाहा’ सदा मेरे पृष्ठभागकी रक्षा करे। ‘रक्तबीजविनाशिन्यै स्वाहा’ सदा हाथोंकी रक्षा करे। ‘ॐ ह्रीं क्लीं मुण्डमालिन्यै स्वाहा’ सदा पैरोंकी रक्षा करे। ‘ॐ ह्रीं चामुण्डायै स्वाहा’ सदा मेरे सर्वाङ्गकी रक्षा करे। पूर्वमें ‘महाकाली’ और अग्निकोणमें ‘रक्तदन्तिका’ रक्षा करें। दक्षिणमें चामुण्डा रक्षा करें। नैर्ऋत्यकोणमें ‘कालिका’ रक्षा करें। पश्चिममें ‘श्यामा’ रक्षा करें। वायव्यकोणमें ‘चण्डिका’, उत्तरमें ‘विकटास्या’ और ईशानकोणमें ‘अट्टहासिनी’ रक्षा करें। ऊर्ध्वभागमें ‘लोलजिह्वा’ रक्षा करें। अधोभागमें सदा ‘आद्यामाया’ रक्षा करें। जल, स्थल और अन्तरिक्षमें सदा ‘विश्वप्रसू’ रक्षा करें।

वत्स! यह कवच समस्त मन्त्रसमूहका मूर्तरूप, सम्पूर्ण कवचोंका सारभूत और उत्कृष्टसे भी उत्कृष्टतर है; इसे मैंने तुम्हें बतला दिया। इसी कवचकी कृपासे राजा सुचन्द्र सातों द्वीपोंके अधिपति हो गये थे। इसी कवचके प्रभावसे पृथ्वीपति मान्धाता सप्तद्वीपवती पृथ्वीके अधिपति हुए थे। इसीके बलसे प्रचेता और लोमश सिद्ध हुए थे तथा इसीके बलसे सौभरि और पिप्पलायन योगियोंमें श्रेष्ठ कहलाये। जिसे यह कवच सिद्ध हो जाता है, वह समस्त सिद्धियोंका स्वामी बन जाता है। सभी महादान, तपस्या और व्रत इस कवचकी सोलहवीं कलाकी भी बराबरी नहीं कर सकते, यह निश्चित है। जो इस कवचको जाने बिना जगज्जननी कालीका भजन करता है, उसके लिये एक करोड़ जप करनेपर भी यह मन्त्र सिद्धिदायक नहीं होता।

(अध्याय ३७)

३६- परशुरामका कैलास-गमन, वहाँ शिव-भवनमें पार्षदोंसहित गणेशको प्रणाम करके आगे बढ़नेको उद्यत होना, गणेशद्वारा रोके जानेपर उनके साथ वार्तालाप

३९६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

सुचन्द्र-पुत्र पुष्कराक्षके साथ परशुरामका युद्ध, पाशुपतास्त्र छोड़नेके लिये उद्यत परशुरामके पास विष्णुका आना और उन्हें समझाना, विष्णुका विप्रवेषसे पुत्रसहित पुष्कराक्षसे लक्ष्मीकवच तथा दुर्गाकवचको माँग लेना, लक्ष्मीकवचका वर्णन

श्रीनारायण कहते हैं—ब्रह्मन्! रणक्षेत्रमें राजाधिराजोंके शिरोमणि सुचन्द्रके गिर जानेपर तीन अक्षौहिणी सेनाके साथ पुष्कराक्ष आ धमका। महान् पराक्रमी राजा पुष्कराक्ष सूर्यवंशमें उत्पन्न, महालक्ष्मीका सेवक, लक्ष्मीवान् और सूर्यके समान प्रभावशाली था। वह सुचन्द्रका पुत्र था। उसके गलेमें महालक्ष्मीका मनोहर कवच बँधा था, जिसके प्रभावसे वह परमैश्वर्यसम्पन्न और त्रिलोकविजयी हो गया था। उसे देखकर बुद्धिमान् परशुरामके सभी भाई हाथोंमें नाना प्रकारके शस्त्रास्त्र धारण करके युद्ध करनेके लिये आ डटे। राजाने लीलापूर्वक बाणसमूहकी वर्षा करके उन्हें छेद डाला। तब उन वीरोंने भी हँसते-हँसते उन बाणोंके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। फिर तो पुष्कराक्षके साथ घोर युद्ध आरम्भ हुआ। परशुरामने पाशुपतास्त्रके सिवा सभी अस्त्र-शस्त्रोंका प्रयोग किया, पर पुष्कराक्षने सबको काट गिराया। तब अपने समस्त शस्त्रास्त्रोंको विफल देखकर परशुरामने स्नान करके शिवजीको प्रणाम किया और पाशुपतास्त्रका प्रयोग करना चाहा; इतनेमें भगवान् नारायण ब्राह्मणका वेष धारण करके वहाँ प्रकट हो गये और बोले।

[ ब्राह्मणवेषधारी ] नारायणने कहा—वत्स भार्गव! यह क्या कर रहे हो? तुम तो ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ हो; फिर भ्रमवश क्रोधावेशमें आकर मनुष्यका वध करनेके लिये पाशुपतका प्रयोग क्यों कर रहे हो? इस पाशुपतसे तो तत्काल ही सारा विश्व भस्म हो सकता है; क्योंकि यह शस्त्र परमेश्वर श्रीकृष्णके अतिरिक्त और सबका विनाशक है। अहो! पाशुपतको जीतनेकी शक्ति तो सुदर्शनमें ही है; क्योंकि श्रीहरिका सुदर्शनचक्र समस्त अस्त्रोंका मान मर्दन करनेवाला है। शिवजीका पाशुपतास्त्र और श्रीहरिका सुदर्शनचक्र—ये ही दोनों तीनों लोकोंमें समस्त अस्त्रोंमें प्रधान हैं। इसलिये ब्रह्मन्! तुम पाशुपतास्त्रको रख दो और मेरी बात सुनो। इस समय तुम जिस प्रकार महाबली राजा पुष्कराक्षको जीत सकोगे तथा जिस प्रकार अजेय कार्तवीर्यपर विजय पा सकोगे, वह सारा उपाय तुम्हें बतलाता हूँ; सावधानतया श्रवण करो। महालक्ष्मीका कवच, जो तीनों लोकोंमें दुर्लभ है, पुष्कराक्षने भक्तिपूर्वक विधि-विधानके साथ अपने गलेमें धारण कर रखा है और पुष्कराक्षका पुत्र दुर्गतिनाशिनी दुर्गाका परम अद्भुत एवं उत्तम कवच अपनी दाहिनी भुजापर बाँधे हुए है। इन कवचोंकी कृपासे वे दोनों विश्वपर विजय पा लेनेमें समर्थ हैं। उनके शरीरपर कवचोंके वर्तमान रहते त्रिभुवनमें उन्हें कौन जीत सकता है। मुने! मैं तुम्हारी प्रतिज्ञा सफल करनेके निमित्त उन दोनोंके संनिकट माँगनेके लिये जाऊँगा और उनसे कवचकी याचना करूँगा। ब्राह्मणकी बात सुनकर परशुरामका मन भयभीत हो गया, तब वे दुःखी हृदयसे उस वृद्ध ब्राह्मणसे बोले।

परशुरामने कहा—‘महाप्राज्ञ! ब्राह्मणरूपधारी आप कौन हैं, मैं यह नहीं जान पा रहा हूँ; अतः मुझ अनजानको शीघ्र ही अपना परिचय दीजिये, तत्पश्चात् राजाके पास जाइये।’ परशुरामका वचन सुनकर ब्राह्मणको हँसी आ गयी, वे ‘मैं विष्णु हूँ’ यों कहकर राजाके पास याचना करनेके लिये चले गये। उन दोनोंके संनिकट जाकर विष्णुने उनसे कवचकी याचना की। तब विष्णुकी

गणपतिखण्ड ३९७

मायासे मोहित होकर उन्होंने विष्णुको दोनों कवच दान कर दिये। भगवान् विष्णु उन कवचोंको लेकर वैकुण्ठको चले गये। नारदजीने पूछा—महामुने! भूपाल पुष्कराक्षको महालक्ष्मीका कवच किसने दिया था? तथा पुष्कराक्षके पुत्रको दुर्गाका दुर्लभ कवच किसने बताया था? आप इसे बतलानेकी कृपा करें; क्योंकि इसे सुननेकी मेरी प्रबल उत्कण्ठा है। जगद्गुरो! साथ ही मुझे यह भी बताइये कि उन दोनोंके कवच कैसे थे, उनका क्या फल है और वे दोनों मन्त्र किस तरहके थे? श्रीनारायणने कहा—नारद! बुद्धिमान् पुष्कराक्षको महालक्ष्मीका कवच और दशाक्षर- मन्त्र सनत्कुमारने दिया था। उन्होंने ही गोपनीय स्तोत्र, उसका चरित, पूजाकी विधि और सामवेदोक्त मनोहर ध्यान भी बतलाया था। दुर्गाका कवच, गुह्य स्तोत्र और दशाक्षर-मन्त्र पूर्वकालमें दुर्वासाने पुष्कराक्ष-पुत्रको प्रदान किया था। इसके पश्चात् देवीके उस परम अद्भुत सम्पूर्ण चरितको सुनोगे, जिसे उन्होंने महायुद्धके आरम्भमें प्रार्थना करनेपर बतलाया था। अब मैं तुम्हें महालक्ष्मीका मन्त्र बतलाता हूँ; उसे श्रवण करो। ‘ॐ श्रीं कमलवासिन्यै स्वाहा' यही वह परम अद्भुत मन्त्र है। मुने! सनत्कुमारने बुद्धिमान् पुष्कराक्षको जो पूजाविधि और सामवेदोक्त ध्यान बतलाया था, उसे सुनो। सहस्रदलकमल जिनका आसन है, जो भगवान् पद्मनाभकी सती-साध्वी प्रियतमा हैं, कमल जिनका घर है, जिनका मुख कमलके सदृश और नेत्र कमलपत्रकी-सी आभावाले हैं, कमलका फूल जिन्हें अधिक प्रिय है, जो कमल-पुष्पकी शय्यापर शयन करती हैं, जिनके हाथमें कमल शोभा पाता है, जो कमल-पुष्पोंकी मालासे विभूषित हैं, कमलोंके आभूषण जिनकी शोभा बढ़ाते हैं, जो स्वयं कमलोंकी शोभाकी वृद्धि करनेवाली हैं और मुस्कराती हुई जो कमल-वनकी ओर निहार रही हैं; उन पद्मिनी देवीका मैं आनन्दपूर्वक भजन करता हूँ। साधकको चाहिये कि चन्दनका अष्टदल- कमल बनाकर उसपर कमल-पुष्पोंद्वारा महालक्ष्मीकी पूजा करे। फिर 'गण'का भलीभाँति पूजन करके उन्हें षोडशोपचार समर्पित करे। तदनन्तर स्तुति करके भक्तिपूर्वक उनके सामने सिर झुकावे। ब्रह्मन् ! अब सबका साररूप कवच तुम्हें बतलाता हूँ; सुनो। श्रीनारायण आगे कहते हैं—विप्रवर! भगवान् पद्मनाभने अपने नाभिकमलपर स्थित ब्रह्माको लक्ष्मीका जो परम शुभकारक कवच प्रदान किया था, उसे सुनो। उस कवचको पाकर ब्रह्माने कमलपर बैठे-बैठे जगत्की सृष्टि की और महालक्ष्मीकी कृपासे वे लक्ष्मीवान् हो गये। फिर पद्मालयासे वरदान प्राप्त करके ब्रह्मा लोकोंके अधीश्वर हो गये। उन्हीं ब्रह्माने पद्मकल्पमें अपने प्रिय पुत्र बुद्धिमान् सनत्कुमारको यह परम अद्भुत कवच दिया था। नारद! सनत्कुमारने वह कवच पुष्कराक्षको प्रदान किया था, जिसके पढ़ने एवं धारण करनेसे ब्रह्मा समस्त सिद्धोंके स्वामी, महान् परमैश्वर्यसे सम्पन्न और सम्पूर्ण सम्पदाओंसे युक्त हो गये। सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके प्रदाता इस कवचके प्रजापति ऋषि हैं, बृहती छन्द है, स्वयं पद्मालया देवी हैं और धर्म-अर्थ-काम-मोक्षमें इसका विनियोग किया जाता है। यह परम अद्भुत कवच महापुरुषोंके पुण्यका कारण है। ‘ॐ ह्रीं कमलवासिन्यै स्वाहा' मेरे मस्तककी रक्षा करे। ‘श्रीं' मेरे कपालकी और ‘श्रीं श्रियै नमः' नेत्रोंकी रक्षा करे। ‘ॐ श्रीं श्रियै स्वाहा' सदा दोनों कानोंकी रक्षा करे। ‘ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्मै स्वाहा' मेरी नासिकाकी रक्षा करे। ‘ॐ श्रीं पद्मालयायै स्वाहा'

३७- परशुरामका शिवके अन्तःपुरमें जानेके लिये गणेशसे अनुरोध, गणेशका उन्हें समझाना, न माननेपर उन्हें स्तम्भित करके अपनी सूँड़में लपेटकर सभी लोकोंमें घुमाते हुए गोलोकमें श्रीकृष्णका दर्शन कराकर भूतलपर छोड़ देना, होशमें आनेपर परशुरामका कुपित होकर गणेशपर फरसेका प्रहार करना, गणेशका एक दाँत टूट जाना, देवलोकमें हाहाकार, पार्वतीका रुदन और शिवसे प्रार्थना

३९८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

सदा दाँतोंकी रक्षा करे। 'ॐ श्रीं कृष्णप्रियायै स्वाहा' सदा दाँतोंके छिद्रोंकी रक्षा करे। 'ॐ श्रीं नारायणेशायै स्वाहा' सदा मेरे कण्ठकी रक्षा करे। 'ॐ श्रीं केशवकान्तायै स्वाहा' सदा मेरे कंधोंकी रक्षा करे। 'ॐ श्रीं पद्मानिवासिन्यै स्वाहा' सदा नाभिकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं संसारमात्रे स्वाहा' सदा मेरे वक्षःस्थलकी रक्षा करे। 'ॐ श्रीं श्रीं कृष्णकान्तायै स्वाहा' सदा पीठकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं श्रियै स्वाहा' सदा मेरे हाथोंकी रक्षा करे। 'ॐ श्रीं निवासकान्तायै स्वाहा' सदा मेरे पैरोंकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं श्रियै स्वाहा' मेरे सर्वाङ्गकी रक्षा करे। पूर्व दिशामें 'महालक्ष्मी' और अग्निकोणमें 'कमलालया' मेरी रक्षा करें। दक्षिणमें 'पद्मा' और नैर्ऋत्यकोणमें 'श्रीहरिप्रिया' मेरी रक्षा करें। पश्चिममें 'पद्मालया' और वायव्यकोणमें स्वयं 'श्री' मेरी रक्षा करें। उत्तरमें 'कमला' और ईशानकोणमें 'सिन्धुकन्या' रक्षा करें। ऊर्ध्वभागमें 'नारायणेशी' रक्षा करें। अधोभागमें 'विष्णुप्रिया' रक्षा करें। 'विष्णुप्राणाधिका' सदा सब ओरसे मेरी रक्षा करें।

वत्स! इस प्रकार मैंने तुमसे इस सर्वैश्वर्यप्रद नामक परम अद्भुत कवचका वर्णन कर दिया। यह समस्त मन्त्रसमुदायका मूर्तिमान् स्वरूप है। धर्मात्मा पुरुष ब्राह्मणको मेरुके समान सुवर्णका पहाड़ दान करके जो फल पाता है, उससे कहीं अधिक फल इस कवचसे मिलता है। जो मनुष्य विधिवत् गुरुकी अर्चना करके इस कवचको गलेमें अथवा दाहिनी भुजापर धारण करता है, वह प्रत्येक जन्ममें श्रीसम्पन्न होता है और उसके घरमें लक्ष्मी सौ पीढ़ियोंतक निश्चलरूपसे निवास करती हैं। वह देवेन्द्रों तथा राक्षसराजोंद्वारा निश्चय ही अवध्य हो जाता है। जिसके गलेमें यह कवच विद्यमान रहता है, उस बुद्धिमान्‌ने सभी प्रकारके पुण्य कर लिये, सम्पूर्ण यज्ञोंमें दीक्षा ग्रहण कर ली और समस्त तीर्थोंमें स्नान कर लिया। लोभ, मोह और भयसे भी इसे जिस-किसीको नहीं देना चाहिये; अपितु शरणागत एवं गुरुभक्त शिष्यके सामने ही प्रकट करना चाहिये। इस कवचका ज्ञान प्राप्त किये बिना जो जगज्जननी लक्ष्मीका जप करता है, उसके लिये करोड़ोंकी संख्यामें जप करनेपर भी मन्त्र सिद्धिदायक नहीं होता।*

(अध्याय ३८)


* नारायण उवाच

सर्वसम्पत्प्रदस्यास्य कवचस्य प्रजापतिः। ऋषिश्च्छन्दश्च बृहती देवी पद्मालया स्वयम्॥
धर्मार्थकाममोक्षेषु विनियोगः प्रकीर्तितः। पुण्यबीजं च महतां कवचं परमाद्भुतम्॥
ॐ ह्रीं कमलवासिन्यै स्वाहा मे पातु मस्तकम्। श्रीं मे पातु कपालं च लोचने श्रीं श्रियै नमः॥
ॐ श्रीं श्रियै स्वाहेति च कर्णयुग्मं सदाऽवतु। ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै स्वाहा मे पातु नासिकाम्॥
ॐ श्रीं पद्मालयायै च स्वाहा दन्तं सदाऽवतु। ॐ श्रीं कृष्णप्रियायै च दन्तरन्ध्रं सदाऽवतु॥
ॐ श्रीं नारायणेशायै मम कण्ठं सदाऽवतु। ॐ श्रीं केशवकान्तायै मम स्कन्धं सदाऽवतु॥
ॐ श्रीं पद्मानिवासिन्यै स्वाहा नाभिं सदाऽवतु। ॐ ह्रीं श्रीं संसारमात्रे मम वक्षः सदाऽवतु॥
ॐ श्रीं श्रीं कृष्णकान्तायै स्वाहा पृष्ठं सदाऽवतु। ॐ ह्रीं श्रीं श्रियै स्वाहा मम हस्तौ सदाऽवतु॥
ॐ श्रीं निवासकान्तायै मम पादौ सदाऽवतु। ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं श्रियै स्वाहा सर्वाङ्गं मे सदाऽवतु॥
प्राच्यां पातु महालक्ष्मीराग्नेय्यां कमलालया। पद्मा मां दक्षिणे पातु नैर्ऋत्यां श्रीहरिप्रिया॥
पद्मालया पश्चिमे मां वायव्यां पातु श्रीः स्वयम्। उत्तरे कमला पातु ऐशान्यां सिन्धुकन्या॥
नारायणेशी पातूर्ध्वमधो विष्णुप्रियाऽवतु। सततं सर्वतः पातु विष्णुप्राणाधिका मम॥

५८- परशुरामका कुपित होकर गणेशपर फरसेका प्रहार करना और उनका एक दाँत टूट जाना

गणपतिखण्ड३९९

दुर्गाकवचका वर्णन

नारदजीने कहा—प्रभो! महालक्ष्मीके मनोहर कवचका वर्णन तो आपने कर दिया। ब्रह्मन्! अब दुर्गतिनाशिनी दुर्गाके उस उत्तम कवचको बतलाइये, जो पद्माक्षके प्राणतुल्य, जीवनदाता, बलका हेतु, कवचोंका सार-तत्त्व और दुर्गाकी सेवाका मूल कारण है।

श्रीनारायण बोले—नारद! प्राचीन कालमें श्रीकृष्णने गोलोकमें ब्रह्माको दुर्गाका जो शुभप्रद कवच दिया था, उसका वर्णन करता हूँ; सुनो। पूर्वकालमें त्रिपुर-संग्रामके अवसरपर ब्रह्माजीने इसे शंकरको दिया, जिसे भक्तिपूर्वक धारण करके रुद्रने त्रिपुरका संहार किया था। फिर शंकरने इसे गौतमको और गौतमने पद्माक्षको दिया, जिसके प्रभावसे विजयी पद्माक्ष सातों द्वीपोंका अधिपति हो गया। जिसके पढ़ने एवं धारण करनेसे ब्रह्मा भूतलपर ज्ञानवान् और शक्तिसम्पन्न हो गये। जिसके प्रभावसे शिव सर्वज्ञ और योगियोंके गुरु हुए और मुनिश्रेष्ठ गौतम शिव-तुल्य माने गये। इस 'ब्रह्माण्डविजय' नामक कवचके प्रजापति ऋषि हैं। गायत्री छन्द है। दुर्गतिनाशिनी दुर्गा देवी हैं और ब्रह्माण्डविजयके लिये इसका विनियोग किया जाता है। यह परम अद्भुत कवच महापुरुषोंका पुण्यतीर्थ है।

'ॐ ह्रीं दुर्गतिनाशिन्यै स्वाहा' मेरे मस्तककी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं' मेरे कपालकी और 'ॐ ह्रीं श्रीं' नेत्रोंकी रक्षा करे। 'ॐ दुर्गायै नमः' सदा मेरे दोनों कानोंकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं' सदा सब ओरसे मेरी नासिकाकी रक्षा करे। 'ह्रीं श्रीं हूं' दाँतोंकी और 'क्लीं' दोनों ओष्ठोंकी रक्षा करे। 'क्रीं क्रीं क्रीं' कण्ठकी रक्षा करे। 'दुर्गे' कपोलोंकी रक्षा करे। 'दुर्गविनाशिन्यै स्वाहा' निरन्तर कंधोंकी रक्षा करे। 'विपद्विनाशिन्यै स्वाहा' सब ओरसे मेरे वक्षःस्थलकी रक्षा करे। 'दुर्गे दुर्गे रक्षणीति स्वाहा' सदा नाभिकी रक्षा करे। 'दुर्गे दुर्गे रक्ष रक्ष' सब ओरसे मेरी पीठकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं दुर्गायै स्वाहा' सदा हाथ-पैरोंकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं दुर्गायै स्वाहा' सदा मेरे सर्वाङ्गकी रक्षा करे। पूर्वमें 'महामाया' रक्षा करे। अग्निकोणमें 'कालिका', दक्षिणमें 'दक्षकन्या' और नैर्ऋत्यकोणमें 'शिवसुन्दरी' रक्षा करे। पश्चिममें 'पार्वती', वायव्यकोणमें 'वाराही', उत्तरमें 'कुबेरमाता' और ईशानकोणमें 'ईश्वरी' सदा-सर्वदा रक्षा करें। ऊर्ध्वभागमें 'नारायणी' रक्षा करें और अधोभागमें सदा 'अम्बिका' रक्षा करें। जाग्रत्कालमें 'ज्ञानप्रदा' रक्षा करें और सोते समय 'निद्रा' सदा रक्षा करें।


इति ते कथितं वत्स सर्वमन्त्रौघविग्रहम्। सर्वैश्वर्यप्रदं नाम कवचं परमाद्भुतम्॥
सुवर्णपर्वतं दत्त्वा मेरुतुल्यं द्विजातये। यत् फलं लभते धर्मो कवचेन ततोऽधिकम्॥
गुरुमभ्यर्च्य विधिवत् कवचं धारयेत्तु यः। कण्ठे वा दक्षिणे बाहौ स श्रीमान् प्रतिजन्मनि॥
अस्ति लक्ष्मीर्गृहे तस्य निश्चला शतपूरुषम्। देवेन्द्रैश्चासुरेन्द्रैश्च सोऽवध्यो निश्चितं भवेत्॥
स सर्वपुण्यवान् धीमान् सर्वयज्ञेषु दीक्षितः। स स्नातः सर्वतीर्थेषु यस्येदं कवचं गले॥
यस्मै कस्मै न दातव्यं लोभमोहभयैरपि। गुरुभक्ताय शिष्याय शरणाय प्रकाशयेत्॥
इदं कवचमज्ञात्वा जपेल्लक्ष्मीं जगत्प्रसूम्। कोटिसंख्यप्रजप्तोऽपि न मन्त्रः सिद्धिदायकः॥
(गणपतिखण्ड ३८।६४-८२)

३८- पार्वतीकी शिवसे प्रार्थना, परशुरामको देखकर उन्हें मारनेके लिये उद्यत होना, परशुरामद्वारा इष्टदेवका ध्यान, भगवान्‌का वामनरूपसे पधारना, शिव-पार्वतीको समझाना और गणेशस्तोत्रको प्रकट करना

४००संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

वत्स! इस प्रकार मैंने तुम्हें यह 'ब्रह्माण्डविजय' नामक कवच बतला दिया। यह परम अद्भुत तथा सम्पूर्ण मन्त्र-समुदायका मूर्तिमान् स्वरूप है। समस्त तीर्थोंमें भलीभाँति गोता लगानेसे, सम्पूर्ण यज्ञोंका अनुष्ठान करनेसे तथा सभी प्रकारके व्रतोपवास करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह फल मनुष्य इस कवचके धारण करनेसे पा लेता है। जो विधिपूर्वक वस्त्र, अलंकार और चन्दनसे गुरुकी पूजा करके इस कवचको गलेमें अथवा दाहिनी भुजापर धारण करता है, वह सम्पूर्ण शत्रुओंका मर्दन करनेवाला तथा त्रिलोकविजयी होता है। जो इस कवचको न जानकर दुर्गतिनाशिनी दुर्गाका भजन करता है, उसके लिये एक करोड़ जप करनेपर भी मन्त्र सिद्धिदायक नहीं होता। नारद! यह काण्वशाखोक्त सुन्दर कवच, जिसका मैंने वर्णन किया है, परम गोपनीय तथा अत्यन्त दुर्लभ है। इसे जिस किसीको नहीं देना चाहिये।* (अध्याय ३९)


* नारायण उवाच —

श्रृणु नारद वक्ष्यामि दुर्गायाः कवचं शुभम्। श्रीकृष्णैनैव यद्दत्तं गोलोके ब्रह्मणे पुरा॥
ब्रह्मा त्रिपुरसंग्रामे शङ्कराय ददौ पुरा। जघान त्रिपुरं रुद्रो यद् धृत्वा भक्तिपूर्वकम्॥
हरो ददौ गौतमाय पद्माक्षाय च गौतमः। यतो बभूव पद्माक्षः सप्तद्वीपेश्वरो जयी॥
यद् धृत्वा पठनाद् ब्रह्मा ज्ञानवान् शक्तिमान् भुवि। शिवो बभूव सर्वज्ञो योगिनां च गुरुर्यतः।
शिवतुल्यो गौतमश्च बभूव मुनिसत्तमः॥
ब्रह्माण्डविजयस्यास्य कवचस्य प्रजापतिः। ऋषिश्चन्दश्च गायत्री देवी दुर्गतिनाशिनी॥
ब्रह्माण्डविजये चैव विनियोगः प्रकीर्तितः। पुण्यतीर्थं च महतां कवचं परमाद्भुतम्॥
ॐ ह्रीं दुर्गतिनाशिन्यै स्वाहा मे पातु मस्तकम्। ॐ ह्रीं मे पातु कपालं च ॐ ह्रीं श्रीमिति लोचने॥
पातु मे कर्णयुग्मं च ॐ दुर्गायै नमः सदा। ॐ ह्रीं श्रीमिति नासां मे सदा पातु च सर्वतः॥
ह्रीं श्रीं ह्रीमिति दन्तानि पातु क्लीमोष्ठयुग्मकम्। क्रीं क्रीं क्रीं पातु कण्ठं च दुर्गे रक्षतु गण्डकम्॥
स्कन्धं दुर्गविनाशिन्यै स्वाहा पातु निरन्तरम्। वक्षो विपद्विनाशिन्यै स्वाहा मे पातु सर्वतः॥
दुर्गे दुर्गे रक्षणीति स्वाहा नाभिं सदाऽवतु। दुर्गे दुर्गे रक्ष रक्ष पृष्ठं मे पातु सर्वतः॥
ॐ ह्रीं दुर्गायै स्वाहा च हस्तौ पादौ सदाऽवतु। ॐ ह्रीं दुर्गायै स्वाहा च सर्वाङ्गं मे सदाऽवतु॥
प्राच्यां पातु महामाया आग्नेय्यां पातु कालिका। दक्षिणे दक्षकन्या च नैर्ऋत्यां शिवसुन्दरी॥
पश्चिमे पार्वती पातु वाराही वारुणे सदा। कुबेरमाता कौबेर्यामैशान्यामीश्वरी सदा॥
ऊर्ध्वे नारायणी पातु अम्बिकाधः सदाऽवतु। ज्ञाने ज्ञानप्रदा पातु स्वप्ने निद्रा सदाऽवतु॥
इति ते कथितं वत्स सर्वमन्त्रौघविग्रहम्। ब्रह्माण्डविजयं नाम कवचं परमाद्भुतम्॥
सुस्नातः सर्वतीर्थेषु सर्वयज्ञेषु यत् फलम्। सर्वव्रतोपवासे च तत् फलं लभते नरः॥
गुरुमभ्यर्च्य विधिवद् वस्त्रालंकारचन्दनैः। कण्ठे वा दक्षिणे बाहौ कवचं धारयेत्तु यः॥
स च त्रैलोक्यविजयी सर्वशत्रुप्रमर्दकः। इदं कवचमज्ञात्वा भजेद् दुर्गतिनाशिनीम्॥
शतलक्षप्रजप्तोऽपि न मन्त्रः सिद्धिदायकः॥
कवचं काण्वशाखोक्तमुक्तं नारद सुन्दरम्। यस्मै कस्मै न दातव्यं गोपनीयं सुदुर्लभम्॥
(गणपतिखण्ड ३९। ३—२३)

गणपतिखण्ड ४०१

परशुरामद्वारा पुत्रसहित राजा सहस्राक्षकका वध, कार्तवीर्य-परशुराम-युद्ध, परशुरामकी मूर्च्छा, शिवद्वारा उन्हें पुनर्जीवन दान, कार्तवीर्य-परशुराम-संवाद, आकाशवाणी सुनकर शिवका विप्रवेष धारण करके कार्तवीर्यसे कवच माँग लेना, परशुद्वारा कार्तवीर्य तथा अन्यान्य क्षत्रियोंका संहार, ब्रह्माका आगमन और परशुरामको गुरुस्वरूप शिवकी शरणमें जानेका उपदेश देकर स्वस्थानको लौट जाना

श्रीनारायण कहते हैं—नारद! जब भगवान् विष्णु महालक्ष्मीकवच तथा दुर्गाकवचको लेकर वैकुण्ठको चले गये, तब भृगुनन्दन परशुरामने पुत्रसहित राजा *सहस्राक्षपर प्रहार किया। यद्यपि राजा कवचहीन था तथापि वह प्रयत्नपूर्वक ब्रह्मास्त्रद्वारा एक सप्ताहतक युद्ध करता रहा। अन्ततोगत्वा पुत्रसहित धराशायी हो गया। सहस्राक्षके गिर जानेपर महाबली कार्तवीर्यार्जुन दो लाख अक्षौहिणी सेनाके साथ स्वयं युद्ध करनेके लिये आया। वह रत्ननिर्मित खोलसे आच्छादित स्वर्णमय रथपर सवार हो अपने चारों ओर नाना प्रकारके अस्त्रोंको सुसज्जित करके रणके मुहानेपर डटकर खड़ा हो गया। परशुरामने राजराजेश्वर कार्तवीर्यको समरभूमिमें उपस्थित देखा। वह रत्ननिर्मित आभूषणोंसे सुशोभित करोड़ों राजाओंसे घिरा हुआ था। रत्ननिर्मित छत्र उसकी शोभा बढ़ा रहा था। वह रत्नोंके गहनोंसे विभूषित था। उसके सर्वाङ्गमें चन्दनकी खौर लगी हुई थी। उसका रूप अत्यन्त मनोहर था और वह मन्द-मन्द मुस्करा रहा था। राजा मुनिवर परशुरामको देखकर रथसे उतर पड़ा और उन्हें प्रणाम करके पुनः रथपर सवार हो राज-समुदायके साथ सामने खड़ा हुआ। तब परशुरामने राजाको समयोचित शुभाशीर्वाद दिया और पुनः यों कहा—'अनुयायियोंसहित तुम स्वर्गमें जाओ।' नारद! इसके बाद वहाँ दोनों सेनाओंमें युद्ध होने लगा। तब परशुरामके शिष्य तथा उनके महाबली भाई कार्तवीर्यसे पीड़ित होकर भाग खड़े हुए। उस समय उनके सारे अङ्ग घायल हो गये थे। राजाके बाणसमूहसे आच्छादित होनेके कारण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ परशुरामको अपनी तथा राजाकी सेना ही नहीं दीख रही थी। फिर तो परस्पर घोर दिव्यास्त्रोंका प्रयोग होने लगा। अन्तमें राजाने दत्तात्रेयके दिये हुए अमोघ शूलको यथाविधि मन्त्रोंका पाठ करके परशुरामपर छोड़ दिया। उस सैकड़ों सूर्योंके समान प्रभावशाली एवं प्रलयाग्निकी शिखाके सदृश शूलके लगते ही परशुराम धराशायी हो गये। तदनन्तर भगवान् शिवने वहाँ आकर परशुरामको पुनर्जीवन दान दिया। इसी समय वहाँ युद्धस्थलमें भक्तवत्सल कृपालु भगवान् दत्तात्रेय शिष्यकी रक्षा करनेके लिये आ पहुँचे। फिर परशुरामने क्रुद्ध होकर पाशुपतास्त्र हाथमें लिया; परंतु दत्तात्रेयकी दृष्टि पड़नेसे वे रणभूमिमें स्तम्भित हो गये। तब रणके मुहानेपर स्तम्भित हुए परशुरामने देखा कि जिनके शरीरकी कान्ति नूतन जलधरके सदृश है; जो हाथमें वंशी लिये बजा रहे हैं; सैकड़ों गोप जिनके साथ हैं; जो मुस्कराते हुए प्रज्वलित सुदर्शन चक्रको निरन्तर घुमा रहे हैं और अनेकों पार्षदोंसे घिरे हुए हैं एवं ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर जिनका स्तवन कर रहे हैं; वे गोपवेषधारी श्रीकृष्ण युद्धक्षेत्रमें राजाकी रक्षा कर रहे हैं। इसी समय वहाँ यों आकाशवाणी हुई—'दत्तात्रेयद्वारा दिया हुआ परमात्मा श्रीकृष्णका कवच उत्तम


* पुष्कराक्षका दूसरा नाम प्रतीत होता है।

४०२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण रत्नकी गुटिकाके साथ राजाकी दाहिनी भुजापर बँधा हुआ है, अतः योगियोंके गुरु शंकर भिक्षारूपसे जब उस कवचको माँग लेंगे, तभी परशुराम राजाका वध करनेमें समर्थ हो सकेंगे।' नारद ! उस आकाशवाणीको सुनकर शंकर ब्राह्मणका रूप धारण करके गये और राजासे याचना करके उसका कवच माँग लाये। फिर शम्भुने श्रीकृष्णका वह कवच परशुरामको दे दिया। इसके बाद देवगण अपने-अपने उत्तम स्थानको चले गये। तब परशुरामने राजाको युद्धके लिये प्रेरित करते हुए कहा। परशुरामजी बोले- राजेन्द्र ! उठो और साहसपूर्वक युद्ध करो; क्योंकि मनुष्योंकी जय- पराजयमें काल ही कारण है। तुमने विधिपूर्वक शास्त्रोंका अध्ययन किया है, दान दिया है, सारी पृथ्वीपर उत्तम रीतिसे शासन किया है, संग्राममें यशोधर्वक कार्य किया है, इस समय मुझे मूर्च्छित कर दिया है, सभी राजाओंको जीत लिया है, लीलापूर्वक रावणको काबूमें कर लिया है और दत्तात्रेयद्वारा दिये गये त्रिशूलसे मुझे पराजित कर दिया है; परंतु शंकरजीने मुझे पुनः जीवित कर दिया है। परशुरामकी बात सुनकर परम धर्मात्मा राजा कार्तवीर्यने सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और यथार्थ बात कहना आरम्भ किया। राजाने कहा- प्रभो! मैंने क्या अध्ययन किया, क्या दान दिया अथवा पृथ्वीका क्या उत्तम शासन किया? भूतलपर मेरे समान कितने भूपाल इस लोकसे चले गये। मेरी बुद्धि, तेज, पराक्रम, विविध प्रकारकी युद्ध-निपुणता, लक्ष्मी, ऐश्वर्य, ज्ञान, दानशक्ति, लौकिक गुण, आचार, विनय, विद्या, प्रतिष्ठा, परम तप-ये सभी मनोरमाके साथ ही नष्ट हो गये। समय आनेपर इन्द्र मानव हो जायेंगे। समय आनेपर ब्रह्मा भी मरेंगे। समय आनेपर प्रकृति श्रीकृष्णके शरीरमें तिरोहित हो जायगी। समय आनेपर सभी देवता मर जायँगे और समय आनेपर त्रिलोकीमें स्थित समस्त चर- अचर प्राणी नष्ट हो जाते हैं। कालका अतिक्रमण करना दुष्कर है। परात्पर श्रीकृष्ण उस काल- के-काल हैं और स्वेच्छानुसार सृष्टिरचयिताके स्रष्टा, संहारकर्ताके संहारक और पालन करनेवालेके पालक हैं। जो महान्, स्थूलसे स्थूलतम, सूक्ष्मसे सूक्ष्मतम, कृश, परमाणुपरक काल, कालभेदक काल है। सारे विश्व जिसके रोयें हैं; वह महाविराट् पुरुष तेजमें परमात्मा श्रीकृष्णके सोलहवें अंशके बराबर है, जिससे क्षुद्र विराट् उत्पन्न हुआ है, जो सबका उत्कृष्ट कारण है। जो स्वयं स्रष्टा है और ब्रह्मा जिसके नाभिकमलसे उत्पन्न हुए हैं। उस समय ब्रह्मा यत्नपूर्वक लाखों वर्षोंतक भ्रमण करनेपर भी जब नाभिकमलके दण्डका अन्त न पा सके, तब अपने स्थानपर स्थित हो गये। वहाँ उन्होंने वायुका आहार करके एक लाख वर्षतक तप किया। तदनन्तर उन्हें गोलोक तथा पार्षदसहित श्रीकृष्णके दर्शन हुए। उस समय श्रीकृष्ण गोप और गोपियोंसे घिरे हुए थे, उनके दो भुजाएँ थीं, हाथमें मुरली लिये हुए थे, रत्न-सिंहासनपर आसीन थे और राधाको वक्षःस्थलसे लगाये हुए थे। उन्हें देखकर ब्रह्माने बारंबार प्रणाम किया और ईश्वरेच्छा जानकर उनकी आज्ञा ले सृष्टिकी रचना करनेमें मन लगाया। शिव, जो सृष्टिके संहारक हैं, वे सृष्टि- कर्ताके ललाटसे उत्पन्न हुए हैं। श्वेतद्वीपनिवासी क्षुद्र विराट् विष्णु पालनकर्ता हैं। सृष्टिके कारणभूत ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर सभी विश्वोंमें श्रीकृष्णकी कलासे उत्पन्न हुए हैं। प्रकृति सबको जन्म देनेवाली है और श्रीकृष्ण प्रकृतिसे परे हैं। मायापति परमेश्वर भी उस प्रकृतिरूपिणी शक्तिके बिना सृष्टिका विधान करनेमें समर्थ नहीं हैं; क्योंकि माया बिना सृष्टिकी रचना नहीं हो सकती। वह महेश्वरी माया नित्य है। वह सृष्टि, संहार और पालनकर्ता श्रीकृष्णमें छिपी रहती है

गणपतिखण्ड ४०३ और सृष्टि-रचनाके समय प्रकट हो जाती है। जैसे मिट्टीके बिना कुम्हार घड़ा नहीं बना सकता और स्वर्णके बिना सोनार कुण्डलका निर्माण करनेमें असमर्थ है (उसी तरह स्रष्टा मायाके बिना सृष्टि- रचना नहीं कर सकते)। वह शक्ति ईश्वरकी इच्छासे सृष्टिकालमें राधा, पद्मा, सावित्री, दुर्गादेवी और सरस्वती नामसे पाँच प्रकारकी हो जाती हैं। परमात्मा श्रीकृष्णकी जो प्राणाधिष्ठात्री देवी हैं, वह प्राणोंसे भी बढ़कर प्रियतमा 'राधा' कही जाती हैं। जो सम्पूर्ण मङ्गलोंको सम्पन्न करनेवाली, परमानन्दरूपा तथा ऐश्वर्यकी अधिष्ठात्री देवी हैं; वे 'पद्मा' नामसे पुकारी जाती हैं। जो वेद, शास्त्र और योगकी जननी, परम दुर्लभ और परमेश्वरकी विद्याकी अधिष्ठात्री देवी हैं; उनका नाम 'सावित्री' है। जो सर्वशक्तिस्वरूपिणी, सर्वज्ञानात्मिका, सर्वस्वरूपा और बुद्धिकी अधिष्ठात्री देवी हैं; वे दुर्गनाशिनी 'दुर्गा' कहलाती हैं। जो वाणीकी अधिष्ठात्री देवी और सदा शास्त्र-ज्ञान प्रदान करनेवाली हैं तथा जो श्रीकृष्णके कण्ठसे उत्पन्न हुई हैं; वे देवी 'सरस्वती' कही जाती हैं। आदिमें स्वयं मूलप्रकृति परमेश्वरीदेवी पाँच प्रकारकी थीं। परंतु वे ही पीछे सृष्टि-क्रमसे बहुत-सी कलाओंवाली हो गयीं। सृष्टि-कालमें मायाद्वारा स्त्रियाँ प्रकृतिके और पुरुषगण पुरुषके अंशसे उत्पन्न हुए; क्योंकि माया-शक्ति बिना सृष्टि नहीं हो सकती। ब्रह्मन् ! प्रत्येक विश्वमें सृष्टि सदा ब्रह्मासे ही प्रकट होती है। विष्णु उसके पालक और निरन्तर मङ्गल प्रदान करनेवाले शिव संहारक हैं। परशुराम ! यह ज्ञान दत्तात्रेयजीका दिया हुआ है, उन्होंने पुष्करतीर्थमें माघी पूर्णिमाके दिन दीक्षाके अवसरपर मुनिवरोंके संनिकट मुझे दिया था। इतना कहकर कार्तवीर्यने मुस्कराते हुए परशुरामको नमस्कार किया और शीघ्र ही बाणसहित धनुष हाथमें लेकर वह रथपर जा बैठा। तत्पश्चात् परशुरामने श्रीहरिका स्मरण करते हुए ब्रह्मास्त्रद्वारा राजाकी सेनाका सफाया कर दिया। फिर लीलापूर्वक पाशुपतास्त्रका प्रयोग करके राजाकी जीवनलीला समाप्त कर दी। इसी प्रकार परशुरामने शिवजीका स्मरण करते हुए खेल-ही-खेलमें क्रमशः इक्कीस बार पृथ्वीको राजाओंसे शून्य कर दिया। परशुरामने अपनी प्रतिज्ञाकी रक्षा करनेके लिये क्षत्रियोंके गर्भमें स्थित तथा माताकी गोदमें खेलनेवाले शिशुओंका, नौजवानोंका तथा वृद्धोंका संहार कर डाला। इस प्रकार कार्तवीर्य गोलोकमें श्रीकृष्णके संनिकट चला गया और परशुराम श्रीहरिका स्मरण करते हुए अपने आश्रमको लौट गये। महेश्वरने इक्कीस बार पृथ्वीको भूपालोंसे हीन देख और रामको फरसेद्वारा क्रीडा करते देखकर उनका नाम परशुराम रख दिया। नारद! तब देवता, मुनि, देवियाँ, सिद्ध, गन्धर्व, किन्नर - ये सभी लोग परशुरामके मस्तकपर पुष्पोंकी वृष्टि करने लगे। स्वर्गमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं और हरिनाम- संकीर्तन होने लगा। इस प्रकार परशुरामके उज्ज्वल यशसे सारा जगत् व्याप्त हो गया। फिर ब्रह्मा, भृगु, शुक्र, च्यवन, वाल्मीकि तथा परम प्रसन्न हुए जमदग्नि ब्रह्मलोकसे वहाँ पधारे। उनके सारे अङ्ग पुलकायमान थे और नेत्रोंमें आनन्दके आँसू छलक आये थे। वे सभी हाथमें दूब और पुष्प लेकर मङ्गलाशासन कर रहे थे। तब परशुरामने दण्डकी भाँति भूमिपर लेटकर उन सबको प्रणाम किया। तब क्रमशः 'तात' यों कहते हुए पहले ब्रह्माने उन्हें अपनी गोदमें बैठा लिया। फिर जगद्गुरु स्वयं ब्रह्मा परशुरामसे हितकारक, नीतियुक्त, वेदका सारतत्त्व और परिणाममें सुखदायक वचन बोले। ब्रह्माने कहा - राम ! जो सम्पूर्ण सम्पत्तियोंको देनेवाला परमोत्कृष्ट, सर्वसम्मत और सत्य है, वह काण्वशाखोक्त वचन कहता हूँ, सुनो। जो सभी पूजनीयोंमें इष्ट, पूज्यतम और प्रधान है, वह जन्म देनेके कारण जनक और पालन करनेके कारण पिता कहा जाता है। किंतु मुने! जो

३९- परशुरामको गौरीका स्तवन करनेके लिये कहकर विष्णुका वैकुण्ठ-गमन, परशुरामका पार्वतीकी स्तुति करना

४०४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

अन्नदाता पिता है, वह जन्मदाता पितासे बड़ा है; क्योंकि पितासे उत्पन्न हुआ शरीर अन्नके बिना नित्य क्षीण होता जाता है। माता उन दोनोंसे सौ गुनी पूज्या, मान्या और वन्दनीया है; क्योंकि गर्भमें धारण करने और पालन-पोषण करनेसे वह उन दोनोंसे बड़ी है। श्रुतिमें ऐसा सुना गया है कि अपना अभीष्टदेव उन सबसे सौगुना बढ़कर पूज्य है और ज्ञान, विद्या तथा मन्त्र देनेवाला गुरु अभीष्टदेवसे भी बढ़कर है। गुरुपुत्र गुरुकी भाँति ही मान्य है; किंतु गुरुपत्नी उससे भी अधिक पूज्या है। देवताके रुष्ट होनेपर गुरु रक्षा कर लेते हैं, परंतु गुरुके क्रुद्ध होनेपर कोई भी रक्षा नहीं कर सकता। इसलिये गुरु ही ब्रह्मा, गुरु ही विष्णु, गुरु ही महेश्वरदेव, गुरु ही परब्रह्म और ब्राह्मणोंसे भी बढ़कर प्रिय हैं। गुरु ही ज्ञान देते हैं और वह ज्ञान हरि-भक्ति उत्पन्न करता है। इस प्रकार जो हरि-भक्ति प्रदान करनेवाला है, उससे बढ़कर बन्धु दूसरा कौन है? अज्ञानरूपी अन्धकारसे आच्छादित हुए मनुष्यको जहाँसे ज्ञानरूपी दीपक प्राप्त होता है, जिसे पाकर सब कुछ निर्मल दीखने लगता है, उससे बढ़कर बन्धु दूसरा कौन है? गुरुके दिये हुए मन्त्रका जप करनेसे ज्ञानकी प्राप्ति होती है और उस ज्ञानसे सर्वज्ञता तथा सिद्धि मिलती है; अतः गुरुसे बढ़कर बन्धु दूसरा कौन है? गुरुद्वारा दी गयी जिस विद्याके बलसे मनुष्य सर्वत्र सुखपूर्वक विजयी होता है और जगत्में पूज्य भी हो जाता है, उस गुरुसे बढ़कर बन्धु दूसरा कौन है? हे पुत्र! श्रीकृष्ण तुम्हारे अभीष्टदेव हैं और स्वयं शंकर गुरु हैं; अतः तुम अभीष्टदेवसे भी बढ़कर पूजनीय गुरुकी शरण ग्रहण करो। जिनके आश्रयसे तुमने इक्कीस बार पृथ्वीको भूपालोंसे रहित कर दिया है और श्रीहरिकी भक्ति प्राप्त की है; उन शिवकी शरणमें जाओ। जो मङ्गलस्वरूप, कल्याणकी मूर्ति, कल्याणदाता, कल्याणके कारण, पार्वतीके आराध्य और शान्तरूप हैं; अपने गुरुदेव उन शिवकी शरणमें जाओ। तुम्हारे इष्टदेव जो गोलोकनाथ भगवान् श्रीकृष्ण हैं, वे ही अपने अंशसे शिवका रूप धारण करके तुम्हारे गुरु हुए हैं, अतः उन्हींकी शरण ग्रहण करो। बेटा! समस्त प्राणियोंमें श्रीकृष्ण आत्मा हैं, शिव ज्ञान हैं, मैं मन हूँ और विष्णुकी सारी शक्तियोंसे सम्पन्न प्रकृति प्राण है। जो ज्ञानदाता, ज्ञानस्वरूप, ज्ञानके कारण, सनातन मृत्युको जीतनेवाले तथा कालके भी काल हैं; उन गुरुकी शरणमें जाओ। जो ब्रह्मज्योतिःस्वरूप, भक्तोंके लिये मूर्तिमान् अनुग्रह, सर्वज्ञ, ऐश्वर्यशाली और सनातन हैं; उन गुरुदेवकी शरणका आश्रय लो। प्रकृतिस्वरूपिणी पार्वतीने लाखों वर्षोतक तपस्या करके जिन परमेश्वरको अपने मनोनीत प्रियतम पतिके रूपमें प्राप्त किया है; उन गुरुदेवकी शरण ग्रहण करो। नारद! इतना कहकर कमलजन्मा ब्रह्मा मुनियोंके साथ चले गये। तब परशुरामने भी कैलास जानेका विचार किया।

(अध्याय ४०)


परशुरामका कैलास-गमन, वहाँ शिव-भवनमें पार्षदोंसहित गणेशको प्रणाम करके आगे बढ़नेको उद्यत होना, गणेशद्वारा रोके जानेपर उनके साथ वार्तालाप

श्रीनारायण कहते हैं— नारद! श्रीहरिका कवच धारण करके जब परशुरामने पृथ्वीको क्षत्रियोंसे रहित कर दिया, तब वे अपने गुरुदेव शिवको नमस्कार करने और गुरुपत्नी अम्बा शिवाको तथा दोनों गुरुपुत्र कार्तिकेय और गणेश्वरको, जो गुणोंमें नारायणके समान थे, देखनेके लिये कैलासको चले। वे भृगुवंशी महात्मा मनके समान वेगशाली थे; अतः उसी

गणपतिखण्ड४०५

क्षण कैलासपर जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने अत्यन्त रमणीय परम मनोहर नगर देखा। वह नगर ऐसी बड़ी-बड़ी सड़कोंसे सुशोभित था, जो अत्यन्त भली लगती थीं। उनकी भूमि सोनेकी भूमिकी-सी थी, जिनपर शुद्ध स्फटिकके सदृश मणियाँ जड़ी हुई थीं। उस नगरमें चारों ओर सिंदूरकी-सी रंगवाली मणियोंकी वेदिकाएँ बनी थीं। वह राशि-की-राशि मुक्ताओंसे संयुक्त और मणियोंके मण्डपोंसे परिपूर्ण था। उसमें यक्षोंके एक अरब दिव्य भवन थे, जो रत्नों और काञ्चनोंसे परिपूर्ण, यक्षेन्द्रगणोंसे परिवेष्टित और मणिनिर्मित किवाड़, खम्भे और सीढ़ियोंसे शोभायमान थे। वह नगर दिव्य सुवर्ण-कलशों, चाँदीके बने हुए श्वेत चँवरों, रत्नोंके आभूषणोंसे विभूषित था। वह उदीप्त होती हुई सुन्दरियों, हाथोंमें चित्रलिखित पुत्तलिकाएँ लिये हुए निरन्तर स्वच्छन्दतापूर्वक हँसते और खेलते हुए सुन्दर-सुन्दर बालकों एवं बालिकाओं तथा स्वर्गगङ्गाके तटपर उगे हुए पारिजातके वृक्षसमूहोंसे खचाखच भरा था। सुगन्धित एवं खिले हुए पुष्पसमूहोंसे सम्पन्न, कल्पवृक्षोंका आश्रय लेनेवाले कामधेनुसे पुरस्कृत, सिद्धविद्यामें अत्यन्त निपुण पुण्यवान् सिद्धोंद्वारा सेवित था। जो तीन लाख योजन ऊँचे और सौ योजनके विस्तारवाले थे। जिनमें सैकड़ों मोटी-मोटी डालियाँ थीं, जो असंख्य शाखासमूहों और असंख्य फलोंसे संयुक्त थे। परम मनोहर शब्द करनेवाले विभिन्न प्रकारके पक्षिसमूहोंसे व्याप्त थे। शीतल-सुगन्ध वायु जिन्हें कम्पायमान कर रही थी, ऐसे अविनाशी वटवृक्षोंसे, सहस्रों पुष्पोद्यानोंसे, सैकड़ों सरोवरोंसे तथा मणियों एवं रत्नोंसे बने हुए सिद्धेन्द्रोंके लाखों भवनोंसे वह नगर सुशोभित था। उसे देखकर परशुरामका मन अत्यन्त प्रसन्नतासे खिल उठा। फिर सामने ही उन्हें शंकरजीका शोभाशाली रमणीय आश्रम दीख पड़ा। विश्वकर्माने बहुमूल्य सुनहली मणियोंद्वारा उसकी रचना की थी। उसमें हीरे जड़े हुए थे। वह पंद्रह योजन ऊँचा और चार योजन विस्तृत था। उसके चारों ओर अत्यन्त सुन्दर सुडौल चौकोर परकोटा बना हुआ था। दरवाजोंपर नाना प्रकारकी चित्रकारियोंसे युक्त रत्नोंके किवाड़ लगे थे। वह उत्तम मणियोंकी वेदियोंसे युक्त तथा मणियोंके खंभोंसे सुशोभित था।

नारद! परशुरामने उस आश्रमके प्रधानद्वारके दाहिनी ओर वृषेन्द्रको और बायीं ओर सिंह तथा नन्दीश्वर, महाकाल, भयंकर पिंगलाक्ष, विशालाक्ष, बाण, महाबली विरूपाक्ष, विकटाक्ष, भास्कराक्ष, रक्ताक्ष, विकटोदर, संहारभैरव, भयंकर कालभैरव, रुरुभैरव, ईशकी-सी आभावाले महाभैरव, कृष्णाङ्गभैरव, दृढ़पराक्रमी क्रोधभैरव, कपालभैरव, रुद्रभैरव तथा सिद्धेन्द्रों, रुद्रगणों, विद्याधरों, गुह्यकों, भूतों, प्रेतों, पिशाचों, कूष्माण्डों, ब्रह्मराक्षसों, वेतालों, दानवों, जटाधारी योगीन्द्रों, यक्षों, किंपुरुषों और किन्नरोंको देखा। उन्हें देखकर भृगुनन्दनने उनके साथ वार्तालाप किया। फिर नन्दिकेश्वरकी आज्ञा ले वे प्रसन्न मनसे भीतर घुसे। आगे बढ़नेपर उन्हें बहुमूल्य रत्नोंके बने हुए सैकड़ों मन्दिर दीख पड़े, जो अमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित चमचमाते हुए कलशोंसे सुशोभित थे। अमूल्य रत्नोंके बने हुए किवाड़, जिनमें हीरे जड़े हुए थे और मोतियाँ एवं निर्मल शीशे लगे हुए थे, उन मन्दिरोंकी शोभा बढ़ा रहे थे। उनमें गोरोचना नामक मणियोंके हजारों खंभे लगे थे और वे मणियोंकी सीढ़ियोंसे सम्पन्न थे। परशुरामने उनके भीतरी द्वारको देखा, जो नाना प्रकारकी चित्रकारीसे चित्रित तथा हीरे-मोतियोंकी गुँथी हुई मालाओंसे सुशोभित था। उसकी बायीं ओर कार्तिकेय और दाहिनी ओर गणेश तथा शिव-तुल्य पराक्रमी विशालकाय वीरभद्र दीख पड़े। नारद! वहाँ प्रधान-प्रधान पार्षद और क्षेत्रपाल भी रत्नाभरणोंसे विभूषित हो रत्ननिर्मित सिंहासनोंपर बैठे हुए थे। महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न भृगुवंशी

५९- परशुरामकी स्तुतिसे प्रसन्न होकर दुर्गाका उन्हें अभय वरदान देना

४०६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण परशुराम उन सबसे सम्भाषण करके हाथमें फरसा लिये हुए शीघ्र ही आगे बढ़नेको उद्यत हुए। उन्हें आगे बढ़ते देखकर गणेशने कहा—'भाई! क्षणभर ठहर जाओ। इस समय महादेव निद्राके वशीभूत होकर शयन कर रहे हैं। मैं उन ईश्वरकी आज्ञा लेकर यहाँ आता हूँ और तुम्हें साथ लिवा ले चलूँगा। इस समय रुक जाओ।' गणेशकी बात सुनकर महाबली परशुराम, जो बृहस्पतिके समान वक्ता थे, कहनेके लिये उद्यत हुए। (अध्याय ४१) परशुरामका शिवके अन्तःपुरमें जानेके लिये गणेशसे अनुरोध, गणेशका उन्हें समझना, न माननेपर उन्हें स्तम्भित करके अपनी सूँड़में लपेटकर सभी लोकोंमें घुमाते हुए गोलोकमें श्रीकृष्णका दर्शन कराकर भूतलपर छोड़ देना, होशमें आनेपर परशुरामका कुपित होकर गणेशपर फरसेका प्रहार करना, गणेशका एक दाँत टूट जाना, देवलोकमें हाहाकार, पार्वतीका रुदन और शिवसे प्रार्थना परशुरामने कहा— भाई! मैं ईश्वरको प्रणाम करनेके लिये अन्तःपुरमें जाऊँगा और भक्तिपूर्वक माता पार्वतीको नमस्कार करके तुरंत ही घरको लौट जाऊँगा। जो सगुण-निर्गुण, भक्तोंके लिये अनुग्रहके मूर्तरूप, सत्य, सत्यस्वरूप, ब्रह्मज्योति, सनातन, स्वेच्छामय, दयासिन्धु, दीनबन्धु, मुनियोंके ईश्वर, आत्मामें रमण करनेवाले, पूर्णकाम, व्यक्त- अव्यक्त, परात्पर, पर-अपरके रचयिता, इन्द्रस्वरूप, सम्मानित, पुरातन, परमात्मा, ईशान, सबके आदि, अविनाशी, समस्त मङ्गलोंके मङ्गलस्वरूप, सम्पूर्ण मङ्गलोंके कारण, सभी मङ्गलोंके दाता, शान्त, समस्त ऐश्वर्योंको प्रदान करनेवाले, परमोत्कृष्ट, शीघ्र ही संतुष्ट होनेवाले, प्रसन्न मुखवाले, शरणमें आये हुएकी रक्षा करनेवाले, भक्तोंके लिये अभयप्रद, भक्तवत्सल और समदर्शी हैं, जिनसे मैंने नाना प्रकारकी विद्याओं और अनेक प्रकारके परम दुर्लभ शस्त्रोंको प्राप्त किया है; उन जगदीश्वर गुरुके इस समय मैं दर्शन करना चाहता हूँ। यों कहकर परशुराम गणपतिके आगे खड़े हो गये। इसपर श्रीगणेशजीने उनको बहुत तरहसे समझाया कि इस समय भगवान् शंकर और माताजी अन्तःपुरमें हैं। आपको वहाँ नहीं जाना चाहिये, पर परशुरामजी हठ करते ही रहे। उन्होंने अनेकों युक्तियोंद्वारा अपना अंदर जाना निर्दोष बतलाया। यों परस्पर दोनोंमें वाद-विवाद होता रहा। गणेशजी विनयपूर्वक ही परशुरामको रोकते रहे, पर जब परशुरामने बलपूर्वक जाना चाहा तो गणेशजीने रोक दिया। तब परस्परमें वाग्युद्ध और करताड़न होने लगा। अन्तमें परशुरामने गणेशजीपर अपना फरसा उठा लिया। तब कार्तिकेयने बीचमें आकर उन्हें समझाया। परशुरामने गणेशजीको धक्का दे दिया, वे गिर पड़े। फिर उठकर उन्होंने परशुरामको फटकारा। इसपर परशुरामने पुनः कुठार उठा लिया। तब गणेशजीने अपनी सूँड़को बहुत लंबा कर लिया और उसमें परशुरामको लपेटकर वे घुमाने लगे। जैसे छोटेसे साँपको गरुड़ ऊपर उठा लेता है, वैसे ही अपने योगबलसे शिवपुत्र गणेशने उनको उठाकर स्तम्भित कर दिया और सप्तद्वीप, सप्तपर्वत, सप्तसागर, भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, जनलोक, तपोलोक, ध्रुवलोक, गौरीलोक, शम्भुलोक उनको दिखा दिये। तदनन्तर उन्हें गम्भीर समुद्रमें फेंक दिया। जब वे तैरने लगे तो पुनः पकड़कर उठा लिया और घुमाते हुए वैकुण्ठ दिखलाकर फिर

४०- सबका स्तवन-पूजन और नमस्कार करके परशुरामका जानेके लिये उद्यत होना, गणेश-पूजामें तुलसी-निषेधके प्रसङ्गमें गणेश-तुलसीके संवादका वर्णन तथा गणपति-खण्डका श्रवण-माहात्म्य

गणपतिखण्ड ४०७


गोलोकधाममें भगवान् श्रीकृष्णके दर्शन कराये। उस समय भगवान् रत्नाभरणोंसे विभूषित हो रत्ननिर्मित सिंहासनपर आसीन थे। राधाजी उनके वक्षःस्थलसे सटी हुई थीं। तेजमें वे करोड़ों सूर्योंके समान प्रभावशाली थे। उनके दो भुजाएँ थीं, हाथमें मुरली शोभा पा रही थी, परम मनोहर रूप था और वे मन्द-मन्द मुस्करा रहे थे। इस प्रकार श्रीकृष्णके दर्शन कराकर उनसे बारंबार प्रणाम कराया। यों सम्पूर्ण पापोंका पूर्णतया नाश कर देनेवाले इष्टदेव श्रीकृष्णके दर्शन कराकर गणेशजीने परशुरामके भ्रूणहत्याजनित पापको दूर कर दिया। यों तो पापजनित यातना भोगे बिना नष्ट नहीं होती, किंतु परशुरामको थोड़ी ही भोगनी पड़ी और सब श्रीकृष्णके दर्शनसे नष्ट हो गयी। क्षणभरके बाद परशुरामकी चेतना लौट आयी और वे वेगपूर्वक भूतलपर गिर पड़े। उस समय उनका गणेशद्वारा किया गया स्तम्भन भी दूर हो गया। तब उन्होंने अपने अभीष्टदेव श्रीकृष्ण, अपने गुरु जगद्गुरु शम्भु तथा गुरुद्वारा दिये गये परम दुर्लभ स्तोत्र और कवचका स्मरण किया। मुने! तदनन्तर परशुरामने अपने अमोघ फरसेको, जिसकी प्रभा ग्रीष्म-ऋतुके मध्याह्नकालिक सूर्यकी प्रभासे सौगुनी थी और जो तेजमें शिव-तुल्य था, गणेशपर चला दिया। पिताके उस अमोघ अस्त्रको आते देखकर स्वयं गणपतिने उसे अपने बायें दाँतसे पकड़ लिया; उस अस्त्रको व्यर्थ नहीं होने दिया। तब महादेवजीके बलसे वह फरसा वेगपूर्वक गिरकर मूलसहित गणेशके दाँतको काटकर पुनः परशुरामके हाथमें लौट आया। यह देखकर वीरभद्र, कार्तिकेय और क्षेत्रपाल आदि पार्षद तथा आकाशमें देवगण महान् भयसे भीत होकर हाहाकार करने लगे।

इधर वह दाँत खूनसे सनकर शब्द करता हुआ भूमिपर गिर पड़ा, मानो गेरुसे युक्त स्फटिकका पर्वत धराशायी हो गया हो। विप्रवर! उस महान् शब्दसे भयभीत होकर पृथ्वी काँप उठी। सभी कैलासवासी प्राणी उसी क्षण डरके मारे मूर्च्छित हो गये। उस समय निद्राके स्वामी जगदीश्वर शिवकी निद्रा भंग हो गयी। वे घबराये हुए पार्वतीके साथ अन्तःपुरसे बाहर आये। मुने! उस समय गणेश घायल हो गये थे, उनका दाँत टूट गया था और मुख रक्तसे सराबोर था। उनका क्रोध शान्त हो गया था और वे लज्जित होकर मुस्कराते हुए सिर झुकाये हुए थे। उन्हें इस दशामें सामने देखकर पार्वतीने शीघ्र ही स्कन्दसे पूछा—‘बेटा! यह क्या बात है?’ तब स्कन्दने भयपूर्वक पूर्वापरका सारा वृत्तान्त उनसे कह सुनाया। उसे सुनकर दुर्गाको क्रोध आ गया। वे कृपापरवश हो रोने लगीं और शम्भुके सामने अपने पुत्र गणेशको छातीसे लगाकर बोलीं। सती-साध्वी पार्वतीने शोकके कारण डरकर विनयपूर्वक शम्भुको समझाया और फिर प्रणत होकर प्रणतकी पीड़ा हरनेवाले पतिदेवसे कहने लगीं।

(अध्याय ४२-४३)

४०८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण पार्वतीकी शिवसे प्रार्थना, परशुरामको देखकर उन्हें मारनेके लिये उद्यत होना, परशुरामद्वारा इष्टदेवका ध्यान, भगवान्का वामनरूपसे पधारना, शिव-पार्वतीको समझाना और गणेशस्तोत्रको प्रकट करना पार्वतीने कहा- प्रभो! जगत्में सभी लोग शंकरकी किंकरी मुझ दुर्गाको जानते हैं कि यह अपेक्षारहित दासी है, उसका जीवन व्यर्थ है। परंतु ईश्वरके लिये तृणसे लेकर पर्वतपर्यन्त सभी जातियाँ समान हैं; अतः दासीपुत्र गणेश और आपके शिष्य परशुराम-इन दोनोंमें किसका दोष है, इसपर विचार करना उचित है; क्योंकि आप धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ हैं। वीरभद्र, कार्तिकेय और पार्षदगण इसके साक्षी हैं। भला, गवाहीके काममें झूठ कौन कहेगा। साथ ही ये दोनों भाई इन लोगोंके लिये समान हैं। यों तो धर्म-निर्णयके अवसरपर गवाही देते समय सत्पुरुषोंके लिये शत्रु और मित्र समान हो जाते हैं (अर्थात् उनकी पक्षपातकी भावना नहीं रहती); क्योंकि जो गवाह गवाहीके विषयको ठीक-ठीक जानते हुए भी सभामें काम, क्रोध, लोभ अथवा भयके कारण झूठी गवाही देता है, वह अपनी सौ पीढ़ियोंको नरकमें गिराकर स्वयं भी कुम्भीपाक नरकमें जाता है। यद्यपि मैं इन दोनोंको समझाने तथा इसका निर्णय करनेमें समर्थ हूँ, तथापि आपके समक्ष मेरा आज्ञा देना श्रुतिमें निन्दित कहा गया है। प्रभो! सभामें राजाके वर्तमान रहते भृत्योंकी प्रभाका उसी प्रकार मूल्य नहीं होता, जैसे सूर्यके उदय होनेपर पृथ्वीपर जुगनूकी कोई गणना नहीं होती। सदा परित्यागके भयसे डरी हुई मैंने चिरकालतक तपस्या करके आपके चरणकमलोंको पाया है; अतः जगन्नाथ ! दारुण पुत्र-स्नेहके कारण क्रोध, शोक और मोहके वशीभूत होकर मैंने जो कुछ कहा है, उसे क्षमा कीजिये। यदि आपने मेरा परित्याग कर दिया तो उस पुत्रसे क्या लाभ ? क्योंकि उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई पतिव्रता नारीके लिये पति सौ पुत्रोंसे बढ़कर है। जो नारी नीच कुलमें उत्पन्न, दुष्टस्वभाववाली, ज्ञानहीन और माता-पिताके दोषसे निन्दित होती है, वह अपने पतिको नहीं मानती। उत्तम कुलमें पैदा हुई स्त्री अपने निन्दित, पतित, मूर्ख, दरिद्र, रोगी और जड पतिको भी सदा विष्णुके समान समझती है। समस्त तेजस्वियोंमें श्रेष्ठ अग्नि अथवा सूर्य पतिव्रताके तेजकी सोलहवीं कलाकी समानता नहीं कर सकते। महादान, पुण्यप्रद व्रतोपवास और तप- ये सभी पति-सेवाके सोलहवें अंशकी समता करनेके योग्य नहीं हैं। * उत्तम कुलमें जन्म लेनेवाली स्त्रियोंके लिये चाहे पुत्र हो, पिता हो अथवा सहोदर भाई हो, कोई भी पतिके समान नहीं होता। स्वामीसे इतना कहकर दुर्गाने अपने सामने परशुरामको देखा, जो निर्भय होकर शम्भुके चरणकमलोंकी सेवा कर रहे थे। तब पार्वती उनसे बोलीं। पार्वतीने कहा- हे महाभाग राम! तुम ब्रह्मवंशमें उत्पन्न हुए हो। तुम्हारी बुद्धि सदसत्का विवेचन करनेवाली है। तुम जमदग्निके पुत्र और योगियोंके गुरु इन महादेवके शिष्य हो। सती- साध्वी रेणुका, जो लक्ष्मीके अंशसे उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई हैं, तुम्हारी माता हैं। तुम्हारे नाना विष्णुभक्त और मामा उनसे भी बढ़कर वैष्णव हैं। तुम मनुके वंशमें उत्पन्न हुए राजा रेणुकके दौहित्र

  • कुत्सितं पतितं मूढं दरिद्रं रोगिणं जडम्। कुलजा विष्णुतुल्यं च कान्तं पश्यति संततम् ॥ हुताशनो वा सूर्यो वा सर्वतेजस्विनां परः। पतिव्रतातेजसश्च कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ महादानानि पुण्यानि व्रतान्यनशनानि च। तपांसि पतिसेवायां कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ (गणपतिखण्ड ४४ । १३-१५)

गणपतिखण्ड ४०९ हो। साधुस्वभाववाले शूरवीर राजा विष्णुयशा तुम्हारे मामा हैं। तुम किसके दोषसे ऐसे दुर्धर्ष हो गये हो ? इस अशुद्धिका कारण मुझे ज्ञात नहीं हो रहा है; क्योंकि जिनके दोषसे मनुष्य दूषित हो जाता है, तुम्हारे वे सभी सम्बन्धी शुद्ध मनवाले हैं। तुमने करुणासागर गुरु और अमोघ फरसा पाकर पहले क्षत्रिय-जातिपर परीक्षा करके पुनः गुरु-पुत्रपर परीक्षा की है। कहाँ तो श्रुतिमें 'गुरुको दक्षिणा देना उचित है' - यों सुना जाता है और कहाँ तुमने गुरुपुत्रके दाँतको ही तोड़ दिया, अब उसका मस्तक भी काट डालो। शंकरके वरदान तथा अमोघवीर्य फरसेसे तो चूहोंको खानेवाला सियार सिंह और शार्दूलको भी मार सकता है। जितेन्द्रिय पुरुषोंमें श्रेष्ठ गणेश तुम्हारे-जैसे लाखों- करोड़ों जन्तुओंको मार डालनेकी शक्ति रखता है, परंतु वह मक्खीपर हाथ नहीं उठाता। श्रीकृष्णके अंशसे उत्पन्न हुआ यह गणेश तेजमें श्रीकृष्णके ही समान है। अन्य देवता श्रीकृष्णकी कलाएँ हैं। इसीसे इसकी अग्रपूजा होती है। यों कहकर पार्वती क्रोधवश उन परशुरामको मारनेके लिये उद्यत हो गयीं। तब परशुरामने मन-ही-मन गुरुको प्रणाम करके अपने इष्टदेव श्रीकृष्णका स्मरण किया। इतनेमें ही दुर्गाने अपने सामने एक अत्यन्त बौने ब्राह्मण-बालकको उपस्थित देखा। उसकी कान्ति करोड़ों सूर्योंके समान थी। उसके दाँत स्वच्छ थे। वह शुक्ल वस्त्र, शुक्ल यज्ञोपवीत, दण्ड, छत्र और ललाटपर उज्ज्वल तिलक धारण किये हुए था। उसके गलेमें तुलसीकी माला पड़ी थी। उसका रूप परम मनोहर था, मुखपर मन्द मुसकान थी और वह रत्नोंके बाजूबंद, कङ्कण और रत्नमालासे विभूषित था। पैरोंमें रत्नोंके नूपुर थे। मस्तकपर बहुमूल्य रत्नोंके मुकुटकी उज्ज्वल छटा थी और कपोलोंपर रत्ननिर्मित दो कुण्डल झलमला रहे थे, जिससे उसकी विशेष शोभा हो रही थी। वह भक्तोंका ईश और भक्तवत्सल था तथा भक्तोंको बायें हाथसे स्थिरमुद्रा और दाहिने हाथसे अभयमुद्रा दिखा रहा था। उसके साथ नगरके हँसते हुए बालक और बालिकाओंका समूह था और कैलासवासी आबालवृद्ध सभी उसकी ओर हर्षपूर्वक देख रहे थे। उस बालकको देखकर पुत्रों तथा भृत्योंसहित शम्भुने घबराकर भक्तिपूर्वक सिर झुकाकर प्रणाम किया। तत्पश्चात् दुर्गाने भी दण्डकी भाँति भूमिपर लेटकर नमस्कार किया। तब बालकने सबको अभीष्टप्रद आशीर्वाद दिया। उसे देखकर सभी बालक भयके कारण महान् आश्चर्यमें पड़ गये। तदनन्तर शिवजीने भक्तिपूर्वक उसे षोडशोपचार समर्पित करके उस परिपूर्णतमकी वेदोक्त-विधिसे पूजा की और फिर सिर झुकाकर काण्वशाखामें कहे हुए स्तोत्रद्वारा उन सनातन भगवान्की स्तुति की। उस समय उनके सर्वाङ्गमें रोमाञ्च हो आया था। पुनः जो रत्नसिंहासनपर आसीन थे और अपने उत्कृष्ट तेजसे जिन्होंने सबको आच्छादित कर रखा था, उन वामन- भगवान्से स्वयं शंकरजी कहने लगे। शंकरजीने कहा - ब्रह्मन् ! जो आत्माराम हैं, उनके विषयमें कुशलप्रश्न करना अत्यन्त विडम्बनाकी बात है; क्योंकि वे स्वयं कुशलके आधार और कुशल-अकुशलके प्रदाता हैं। श्रीकृष्णकी सेवाके फलोदयसे आज आप जो मुझे अतिथिरूपसे प्राप्त हुए हैं, इससे मेरा जन्म सफल और जीवन धन्य हो गया। कृपासागर परिपूर्णतम श्रीकृष्ण लोगोंके उद्धारके लिये पुण्यक्षेत्र भारतमें अपनी कलासे अवतीर्ण हुए हैं। जिसने अतिथिका आदर-सत्कार किया है, उसने मानो सम्पूर्ण देवताओंकी पूजा कर ली; क्योंकि जिसपर अतिथि प्रसन्न हो जाता है, उसपर स्वयं श्रीहरि प्रसन्न हो जाते हैं। समस्त तीर्थोंमें स्नान करनेसे, सर्वस्व दान करनेसे, सभी प्रकारके व्रतोपवाससे, सम्पूर्ण यज्ञोंमें दीक्षा ग्रहण करनेसे, सभी प्रकारकी

१- नारदजीके प्रश्न तथा मुनिवर नारायणद्वारा भगवान् विष्णु एवं वैष्णवोंके माहात्म्यका वर्णन, श्रीराधा और श्रीकृष्णके गोकुलमें अवतार लेनेका एक कारण श्रीदाम और राधाका परस्पर शाप

४१० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

तपस्याओंसे और नित्य-नैमित्तिकादि विविध कर्मानुष्ठानोंसे जो फल प्राप्त होता है—वह अतिथिसेवाकी सोलहवीं कलाकी समानता नहीं कर सकता। अतिथि जिसके गृहसे निराश एवं रुष्ट होकर चला जाता है, उसका पुण्य निश्चय ही नष्ट हो जाता है।

श्रीनारायण कहते हैं—नारद! शंकरके वचन सुनकर जगत्पति स्वयं श्रीहरि संतुष्ट हो गये और मेघके समान गम्भीर वाणीद्वारा उनसे बोले।

विष्णुने कहा—शिवजी! आपलोगोंके कोलाहलको जानकर कृष्णभक्त परशुरामकी रक्षा करनेके लिये इस समय मैं श्वेतद्वीपसे आ रहा हूँ; क्योंकि इन कृष्णभक्तोंका कहीं अमङ्गल नहीं होता। गुरुके कोपके अतिरिक्त अन्य अवस्थाओंमें मैं हाथमें चक्र लेकर उनकी रक्षा करता रहता हूँ। गुरुके रुष्ट होनेपर मैं रक्षा नहीं करता; क्योंकि गुरुकी अवहेलना बलवती होती है। जो गुरुकी सेवासे हीन है, उससे बढ़कर पापी दूसरा नहीं है। अहो! जिसकी कृपासे मानव सब कुछ देखता है, वह पिता सबके लिये सबसे बढ़कर माननीय और पूजनीय होता है। वह मनुष्योंके जन्म देनेके कारण जनक, रक्षा करनेके कारण पिता और विस्तीर्ण करनेके कारण कलारूपसे प्रजापति है। उस पितासे माता गर्भमें धारण करने एवं पालन-पोषण करनेसे सौगुनी बढ़कर वन्दनीया, पूज्या और मान्या है। वह प्रसव करनेवाली वसुन्धराके समान है। अन्नदाता मातासे भी सौगुना वन्दनीय, पूज्य और मान्य है; क्योंकि अन्नके बिना शरीर नष्ट हो जाता है और विष्णु ही कलारूपसे अन्नदाता होते हैं। अभीष्टदेव अन्नदातासे भी सौगुना श्रेष्ठ कहा जाता है। किंतु विद्या और मन्त्र प्रदान करनेवाला गुरु अभीष्टदेवसे भी सौगुना बढ़कर है। जो अज्ञानरूपी अन्धकारसे आच्छादित हुए समस्त पदार्थोंको ज्ञानदीपकरूपी नेत्रसे दिखलाता है, उससे बढ़कर बान्धव कौन है? गुरुद्वारा दिये गये मन्त्र और तपसे अभीष्ट सुख, सर्वज्ञता और समस्त सिद्धियोंकी प्राप्ति होती है; अतः गुरुसे बढ़कर बान्धव दूसरा कौन है? गुरुद्वारा दी गयी विद्याके बलसे मनुष्य सर्वत्र समयपर विजयी होता है, इसलिये जगत्में गुरुसे बढ़कर पूज्य और उनसे अधिक प्रिय बन्धु कौन हो सकता है? जो मूर्ख विद्यामद अथवा धनमदसे अंधा होकर गुरुकी सेवा नहीं करता, वह ब्रह्महत्या आदि पापोंसे लिपायमान होता है; इसमें संशय नहीं है। जो दरिद्र, पतित एवं क्षुद्र गुरुके साथ साधारण मानवकी भाँति आचरण करता है, वह तीर्थस्नायी होनेपर भी अपवित्र है और उसका कर्मोंके करनेमें अधिकार नहीं है। शिव! जो छल-कपट करके माता, पिता, भार्या, गुरुपत्नी और गुरुका पालन-पोषण नहीं करता, वह महान् पापी है। गुरु ही ब्रह्मा, गुरु ही विष्णु, गुरु ही महेश्वरदेव, गुरु ही परब्रह्म, गुरु ही सूर्यरूप, गुरु ही चन्द्र, इन्द्र, वायु, वरुण और अग्निरूप हैं। यहाँतक कि गुरु स्वयं सर्वरूपी ऐश्वर्यशाली परमात्मा हैं। वेदसे उत्तम दूसरा शास्त्र नहीं है, श्रीकृष्णसे बढ़कर दूसरा देवता नहीं है, गङ्गाके समान दूसरा तीर्थ नहीं है और तुलसीसे उत्तम दूसरा पुष्प नहीं है*। पृथ्वीसे बढ़कर दूसरा क्षमावान् नहीं है, पुत्रसे अधिक दूसरा कोई प्रिय नहीं है, दैवसे बढ़कर शक्ति नहीं है और एकादशीसे उत्तम व्रत नहीं है। शालग्रामसे बढ़कर यन्त्र, भारतसे उत्तम क्षेत्र और पुण्यस्थलोंमें वृन्दावनके समान पुण्यस्थान नहीं है। मोक्षदायिनी पुरियोंमें काशी और वैष्णवोंमें शिवके समान दूसरा नहीं है। न तो पार्वतीसे अधिक कोई पतिव्रता है और न गणेशसे उत्तम कोई जितेन्द्रिय है। न तो विद्याके समान कोई


* नास्ति वेदात् परं शास्त्रं न हि कृष्णात् परः सुरः। नास्ति गङ्गासमं तीर्थं न पुष्पं तुलसीपरम्॥
(गणपतिखण्ड ४४। ७२)