भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 404
३९४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

अम्बिकाका मन प्रसन्न हो गया और 'भय मत करो' यों कहकर वे वहीं अन्तर्धान हो गयीं। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस परशुरामकृत स्तोत्रका पाठ करता है, वह अनायास ही महान् भयसे छूट जाता है। वह त्रिलोकीमें पूजित, त्रैलोक्यविजयी, ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ और शत्रुपक्षका विमर्दन करनेवाला हो जाता है*। इसी बीच ब्रह्माजी धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भृगुवंशी परशुरामके पास आकर उनसे उस रहस्यका वर्णन करने लगे।

ब्रह्माजी बोले—महाभाग राम! अपनी प्रतिज्ञा सफल करनेके लिये पहले तुम सुचन्द्रकी विजयके हेतुभूत रहस्यका मुझसे श्रवण करो। पूर्वकालमें दुर्वासाने सुचन्द्रको दशाक्षरी महाविद्या तथा भद्रकालीका परम दुर्लभ कवच प्रदान किया था। भद्रकालीका कवच देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ है। वह कवच सम्पूर्ण शत्रुओंका विनाश करनेवाला, अत्यन्त पूजनीय, प्रशंसनीय और त्रिलोकीपर विजय पानेका कारण है। वह कवच जिसके गलेमें वर्तमान है, उसे जीतनेके लिये भूतलपर तुम कैसे समर्थ हो सकते हो? अतः भार्गव! तुम भिक्षाके लिये जाओ और राजासे प्रार्थना करो। सूर्यवंशमें उत्पन्न हुआ वह राजा परम धर्मात्मा एवं दानी है। माँगनेपर वह निश्चय ही प्राण, कवच, मन्त्र आदि सब कुछ दे डालेगा।

मुने! तब परशुराम संन्यासीका वेष धारण करके राजाके पास गये और उससे उन्होंने मन्त्र तथा परम अद्भुत कवचकी याचना की। तब राजाने अत्यन्त आदरपूर्वक उन्हें मन्त्र और कवच दे दिया। तदनन्तर परशुरामने शंकरजीके त्रिशूलसे उस राजाका काम तमाम कर दिया।

(अध्याय ३६)


दशाक्षरी महाविद्या तथा काली-कवचका वर्णन

नारदजीने कहा—सर्वज्ञ नाथ! अब मैं आपके मुखसे भद्रकाली-कवच तथा उस दशाक्षरी महाविद्याको सुनना चाहता हूँ।

श्रीनारायण बोले—नारद! मैं दशाक्षरी महाविद्या तथा तीनों लोकोंमें दुर्लभ उस गोपनीय कवचका वर्णन करता हूँ, सुनो। 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं कालिकायै स्वाहा' यही दशाक्षरी महाविद्या है। इसे पुष्करतीर्थमें सूर्य-ग्रहणके अवसरपर दुर्वासाने राजाको दिया था। उस समय राजाने दस लाख जप करके मन्त्र सिद्ध किया और


* परशुराम उवाच—
नमः शङ्करकान्तायै सारायै ते नमो नमः। नमो दुर्गतिनाशिन्यै मायायै ते नमो नमः॥
नमो नमो जगद्धात्र्यै जगत्कर्त्र्यै नमो नमः। नमोऽस्तु ते जगन्मात्रे कारणायै नमो नमः॥
प्रसीद जगतां मातः सृष्टिसंहारकारिणि। त्वत्पादे शरणं यामि प्रतिज्ञां सार्थिकां कुरु॥
त्वयि मे विमुखायां च को मां रक्षितुमीश्वरः। त्वं प्रसन्ना भव शुभे मां भक्तं भक्तवत्सले॥
युष्माभिः शिवलोके च मह्यं दत्तो वरः पुरा। तं वरं सफलं कर्तुं त्वमर्हसि वरानने॥
जामदग्न्यस्तवं श्रुत्वा प्रसन्नाभवदम्बिका। मा भैरित्येवमुक्त्वा तु तत्रैवान्तरधीयत॥
एतद् भृगुकृतं स्तोत्रं भक्तियुक्तश्च यः पठेत्। महाभयात् समुत्तीर्णः स भवेदवलीलया॥
स पूजितश्च त्रैलोक्ये त्रैलोक्यविजयी भवेत्। ज्ञानिश्रेष्ठो भवेच्चैव वैरिपक्षविमर्दकः॥
(गणपतिखण्ड ३६। २९—३६)