भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 401

गणपतिखण्ड ३११ बल-पराक्रमसे सम्पन्न बहुत-से भूपालोंका वध | उठाया। त्रिशूल चलाते समय आकाशवाणी हुई- कर डाला। इस समय यहाँ शिशु-अवस्थावाले | 'विप्रवरो ! शिवजीका यह त्रिशूल अमोघ है, इसे राजकुमार ही आये हैं। आपने सम्पूर्ण पृथ्वीको | मत चलाओ; क्योंकि मत्स्यराजके गलेमें सर्वाङ्गोंकी इक्कीस बार भूपालोंसे शून्य कर देनेके लिये जो | रक्षा करनेवाला शिवजीका दिव्य कवच बँधा है, प्रतिज्ञा की है, उसका पालन कीजिये। युद्ध | जिसे पूर्वकालमें दुर्वासाने दिया था। अतः पहले करना तो क्षत्रियोंका धर्म ही है। युद्धमें मृत्युको | राजासे उस प्राण-प्रदान करनेवाले कवचको माँग प्राप्त हो जाना उनके लिये निन्दित नहीं है; परंतु | लो।' मुने! तदनन्तर परशुरामने त्रिशूल चलाकर ब्राह्मणोंकी रण-स्पृहा लोक और वेद-दोनोंमें | राजापर चोट की, परंतु राजाके शरीरसे टकराकर विडम्बनाकी पात्र है। वाणी ही जिनका बल और | उस त्रिशूलके सौ टुकड़े हो गये। तब आकाशवाणी तप ही जिनका धन है, उन ब्राह्मणोंकी शान्ति ही | सुनकर महान् पराक्रमी जमदग्निनन्दन परशुरामने प्रत्येक युगमें स्वस्तिकारक कर्म है। युद्ध करना | शृङ्गधारी संन्यासीका वेष धारण करके राजासे ब्राह्मणका धर्म नहीं है। शान्तिपरायण ब्राह्मण | कवचकी याचना की। राजाने 'ब्रह्माण्ड-विजय' युद्धके लिये उद्योगशील हो, ऐसा तो न देखनेमें | नामक वह उत्तम कवच उन्हें दे दिया। उस ही आया है और न सुना ही गया है। भगवान् | कवचको लेकर परशुरामने पुनः त्रिशूलसे ही नारायणके विद्यमान रहते यह दूसरी तरहका | प्रहार किया। उसके आघातसे मत्स्यराज, जो उलट-फेर कैसे हो गया ? | चन्द्रवंशमें उत्पन्न, गुणवान् और महाबली था, रणाङ्गणमें यों कहकर राजेन्द्र कार्तवीर्य | जिसके मुखकी कान्ति सैकड़ों चन्द्रमाओंके समान शान्त हो गया। उसके उस वचनको सुनकर सभी | थी, भूतलपर गिर पड़ा। लोग मौन हो गये। तदनन्तर परशुरामके सभी | नारदने कहा-महाभाग नारायण ! मत्स्यराजने भाई, जो बड़े शूरवीर तथा हाथोंमें अत्यन्त तीखे | शिवजीके जिस कवचको धारण किया था, शस्त्र धारण किये हुए थे, उनकी आज्ञासे युद्ध | उसका वर्णन कीजिये; क्योंकि उसे सुननेके लिये करनेके लिये आगे बढ़े। तब जो स्वयं मङ्गलस्वरूप | मुझे कौतूहल हो रहा है। तथा मङ्गलोंका आश्रयस्थान था, उस महाबली | नारायण बोले-विप्रवर ! महात्मा शंकरके मत्स्यराजने भी उन सबको युद्धोन्मुख देखकर | उस 'ब्रह्माण्डविजय' नामक कवचका, जो सर्वाङ्गकी युद्ध करना आरम्भ किया। उस राजेन्द्रने बाणोंका | रक्षा करनेवाला है, वर्णन करता हूँ; सुनो। जाल बिछाकर उन सभीको रोक दिया। तब | पूर्वकालमें दुर्वासाने बुद्धिमान् मत्स्यराजको सम्पूर्ण जमदग्निके पुत्रोंने उस बाण-समूहको छिन्न-भिन्न | पापोंका समूल नाश करनेवाला षडक्षर-मन्त्र कर दिया। मुने! राजाने सैकड़ों सूर्योंके समान | बतलाकर इसे प्रदान किया था। यदि सिद्धि प्राप्त प्रकाशमान दिव्यास्त्र चलाया; परंतु मुनियोंने | हो जाय तो इस कवचके शरीरपर स्थित रहते माहेश्वरास्त्रके द्वारा खेल-ही-खेलमें उसे काट दिया। | अस्त्र-शस्त्रके प्रहारके समय, जलमें तथा अग्निमें पुनः मुनियोंने दिव्यास्त्रद्वारा राजाके बाणसहित | प्राणियोंकी मृत्यु नहीं होती-इसमें संशय नहीं धनुष, रथ, सारथि और कवचकी धज्जियाँ उड़ा | है। जिसे पढ़कर एवं धारण करके दुर्वासा सिद्ध दीं। इस प्रकार राजाको शस्त्रहीन देखकर | होकर लोकपूजित हो गये, जिसके पढ़ने और मुनियोंको महान् हर्ष हुआ। तब उन्होंने मत्स्यराजका | धारण करनेसे जैगीषव्य महायोगी कहलाने लगे। वध करनेकी इच्छासे शिवजीका त्रिशूल हाथमें | जिसे धारण करके वामदेव, देवल, स्वयं च्यवन,