ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 400, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ें३९० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
साथ सती हो गयी। भूपाल! इन दोनोंके वधसे परलोकमें तुम्हारी क्या गति होगी? यह सारा संसार तो कमलके पत्तेपर पड़े हुए जलकी बूँदकी तरह मिथ्या ही है। सुयश हो अथवा अपयश, इसकी तो कथामात्र अवशिष्ट रह जाती है। अहो! सत्पुरुषोंकी दुष्कीर्ति हो, इससे बढ़कर और क्या विडम्बना होगी? कपिला कहाँ गयी, तुम कहाँ गये, विवाद कहाँ गया और मुनि कहाँ चले गये; परंतु एक विद्वान् राजाने जो कर्म कर डाला, वह हलवाहा भी नहीं कर सकता। मेरे धर्मात्मा पिताने तो तुम-जैसे नरेशको उपवास करते देखकर भोजन कराया और तुमने उन्हें वैसा फल दिया! राजन्! तुमने शास्त्रोंका अध्ययन किया है, तुम प्रतिदिन ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक दान देते हो और तुम्हारे यशसे सारा जगत् व्याप्त है। फिर बुढ़ापेमें तुम्हारी अपकीर्ति कैसे हुई? प्राचीन कालके वन्दीगण ऐसा कहते हैं कि भूतलपर कार्तवीर्यार्जुनके समान दाता, सर्वश्रेष्ठ, धर्मात्मा, यशस्वी, पुण्यशाली और उत्तम बुद्धिसम्पन्न न कोई हुआ है और न आगे होगा। जो पुराणोंमें विख्यात है, उसकी ऐसी अपकीर्ति! आश्चर्य है। राजन्! प्राणियोंके लिये दुर्वाक्य तीखे अस्त्रसे भी बढ़कर दुस्सह होता है; इसीलिये संकट-कालमें भी सत्पुरुषोंके मुखसे दुर्वचन नहीं निकलते। राजेन्द्र! मैं तुमपर दोषारोपण नहीं कर रहा हूँ, बल्कि सच्ची बात कह रहा हूँ; अतः इस राजसभामें तुम मुझे उत्तर दो। इस सभामें सूर्य, चन्द्र और मनुके वंशज विद्यमान हैं; अतः सभामें तुम ठीक-ठीक बतलाओ, जिसे तुम्हारे पितर और देवगण भी सुनें। साथ ही सत्-असत्को कहनेमें समर्थ ये सारे नरेश भी श्रवण करें; क्योंकि समदृष्टि रखनेवाले सत्पुरुष लोग पक्षपातकी बात नहीं कहते। युद्धस्थलमें इतना कहकर परशुराम चुप हो गये। तब बृहस्पतिके समान बुद्धिमान् राजाने कहना आरम्भ किया।
कार्तवीर्यार्जुनने कहा— हे राम! आप श्रीहरिके अंश, हरिके भक्त और जितेन्द्रिय हैं। मैंने जिनके मुखसे धर्म श्रवण किया है, आप उनके गुरुके भी गुरु हैं। जो कर्मवश ब्राह्मण-कुलमें उत्पन्न हुआ है, ब्रह्म-चिन्तन करता है और अपने धर्ममें तत्पर एवं शुद्ध है, इसीलिये वह ब्राह्मण कहलाता है। जो मनन करनेके कारण नित्य बाहर-भीतर कर्म करता रहता है, सदा मौन धारण किये रहता है और समय आनेपर बोलता है, वह मुनि कहलाता है। जिसकी सुवर्ण और मिट्टीके ढेलेमें, घर और जंगलमें तथा कीचड़ और अत्यन्त चिकने चन्दनमें समताकी भावना है, वह योगी कहा जाता है। जो सम्पूर्ण जीवोंमें समत्व-बुद्धिसे विष्णुकी भावना करता है और श्रीहरिकी भक्ति करता है, वह हरिभक्त कहा जाता है*। ब्राह्मणोंका धन तप है। चूँकि तपस्या कल्पतरु और कामधेनुके समान है, इसीलिये उनकी निरन्तर तपमें इच्छा लगी रहती है। रजोगुणी पुरुष कर्मोंके रागवश राजसिक कार्य करता है और रागान्ध होकर रजोगुणी कार्योंमें लगा रहता है; इसी कारण वह राजा कहा जाता है। मुने! रागवश मैंने कामधेनुकी याचना की थी; अतः मुझ अनुरागी क्षत्रियका इसमें कौन-सा अपराध हुआ? फिर भी, आपके पिताने महान्
* कर्मणा ब्राह्मणो जातः करोति ब्रह्मभावनम्। स्वधर्मनिरतः शुद्धस्तस्माद् ब्राह्मण उच्यते॥
अन्तर्बहिश्च मननात् कुरुते कर्म नित्यशः। मौनी शश्वद् वदेत् काले यो हि स मुनिरुच्यते॥
स्वर्णे लोष्टे गृहेऽरण्ये पङ्के सुस्निग्धचन्दने। समता भावना यस्य स योगी परिकीर्तितः॥
सर्वजीवेषु यो विष्णुं भावयेत् समताधिया। हरौ करोति भक्तिं च हरिभक्तः स च स्मृतः॥
(३५।७०—७३)