ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण परशुराम उन सबसे सम्भाषण करके हाथमें फरसा लिये हुए शीघ्र ही आगे बढ़नेको उद्यत हुए। उन्हें आगे बढ़ते देखकर गणेशने कहा—'भाई! क्षणभर ठहर जाओ। इस समय महादेव निद्राके वशीभूत होकर शयन कर रहे हैं। मैं उन ईश्वरकी आज्ञा लेकर यहाँ आता हूँ और तुम्हें साथ लिवा ले चलूँगा। इस समय रुक जाओ।' गणेशकी बात सुनकर महाबली परशुराम, जो बृहस्पतिके समान वक्ता थे, कहनेके लिये उद्यत हुए। (अध्याय ४१) परशुरामका शिवके अन्तःपुरमें जानेके लिये गणेशसे अनुरोध, गणेशका उन्हें समझना, न माननेपर उन्हें स्तम्भित करके अपनी सूँड़में लपेटकर सभी लोकोंमें घुमाते हुए गोलोकमें श्रीकृष्णका दर्शन कराकर भूतलपर छोड़ देना, होशमें आनेपर परशुरामका कुपित होकर गणेशपर फरसेका प्रहार करना, गणेशका एक दाँत टूट जाना, देवलोकमें हाहाकार, पार्वतीका रुदन और शिवसे प्रार्थना परशुरामने कहा— भाई! मैं ईश्वरको प्रणाम करनेके लिये अन्तःपुरमें जाऊँगा और भक्तिपूर्वक माता पार्वतीको नमस्कार करके तुरंत ही घरको लौट जाऊँगा। जो सगुण-निर्गुण, भक्तोंके लिये अनुग्रहके मूर्तरूप, सत्य, सत्यस्वरूप, ब्रह्मज्योति, सनातन, स्वेच्छामय, दयासिन्धु, दीनबन्धु, मुनियोंके ईश्वर, आत्मामें रमण करनेवाले, पूर्णकाम, व्यक्त- अव्यक्त, परात्पर, पर-अपरके रचयिता, इन्द्रस्वरूप, सम्मानित, पुरातन, परमात्मा, ईशान, सबके आदि, अविनाशी, समस्त मङ्गलोंके मङ्गलस्वरूप, सम्पूर्ण मङ्गलोंके कारण, सभी मङ्गलोंके दाता, शान्त, समस्त ऐश्वर्योंको प्रदान करनेवाले, परमोत्कृष्ट, शीघ्र ही संतुष्ट होनेवाले, प्रसन्न मुखवाले, शरणमें आये हुएकी रक्षा करनेवाले, भक्तोंके लिये अभयप्रद, भक्तवत्सल और समदर्शी हैं, जिनसे मैंने नाना प्रकारकी विद्याओं और अनेक प्रकारके परम दुर्लभ शस्त्रोंको प्राप्त किया है; उन जगदीश्वर गुरुके इस समय मैं दर्शन करना चाहता हूँ। यों कहकर परशुराम गणपतिके आगे खड़े हो गये। इसपर श्रीगणेशजीने उनको बहुत तरहसे समझाया कि इस समय भगवान् शंकर और माताजी अन्तःपुरमें हैं। आपको वहाँ नहीं जाना चाहिये, पर परशुरामजी हठ करते ही रहे। उन्होंने अनेकों युक्तियोंद्वारा अपना अंदर जाना निर्दोष बतलाया। यों परस्पर दोनोंमें वाद-विवाद होता रहा। गणेशजी विनयपूर्वक ही परशुरामको रोकते रहे, पर जब परशुरामने बलपूर्वक जाना चाहा तो गणेशजीने रोक दिया। तब परस्परमें वाग्युद्ध और करताड़न होने लगा। अन्तमें परशुरामने गणेशजीपर अपना फरसा उठा लिया। तब कार्तिकेयने बीचमें आकर उन्हें समझाया। परशुरामने गणेशजीको धक्का दे दिया, वे गिर पड़े। फिर उठकर उन्होंने परशुरामको फटकारा। इसपर परशुरामने पुनः कुठार उठा लिया। तब गणेशजीने अपनी सूँड़को बहुत लंबा कर लिया और उसमें परशुरामको लपेटकर वे घुमाने लगे। जैसे छोटेसे साँपको गरुड़ ऊपर उठा लेता है, वैसे ही अपने योगबलसे शिवपुत्र गणेशने उनको उठाकर स्तम्भित कर दिया और सप्तद्वीप, सप्तपर्वत, सप्तसागर, भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, जनलोक, तपोलोक, ध्रुवलोक, गौरीलोक, शम्भुलोक उनको दिखा दिये। तदनन्तर उन्हें गम्भीर समुद्रमें फेंक दिया। जब वे तैरने लगे तो पुनः पकड़कर उठा लिया और घुमाते हुए वैकुण्ठ दिखलाकर फिर