ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| गणपतिखण्ड | ४०५ |
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क्षण कैलासपर जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने अत्यन्त रमणीय परम मनोहर नगर देखा। वह नगर ऐसी बड़ी-बड़ी सड़कोंसे सुशोभित था, जो अत्यन्त भली लगती थीं। उनकी भूमि सोनेकी भूमिकी-सी थी, जिनपर शुद्ध स्फटिकके सदृश मणियाँ जड़ी हुई थीं। उस नगरमें चारों ओर सिंदूरकी-सी रंगवाली मणियोंकी वेदिकाएँ बनी थीं। वह राशि-की-राशि मुक्ताओंसे संयुक्त और मणियोंके मण्डपोंसे परिपूर्ण था। उसमें यक्षोंके एक अरब दिव्य भवन थे, जो रत्नों और काञ्चनोंसे परिपूर्ण, यक्षेन्द्रगणोंसे परिवेष्टित और मणिनिर्मित किवाड़, खम्भे और सीढ़ियोंसे शोभायमान थे। वह नगर दिव्य सुवर्ण-कलशों, चाँदीके बने हुए श्वेत चँवरों, रत्नोंके आभूषणोंसे विभूषित था। वह उदीप्त होती हुई सुन्दरियों, हाथोंमें चित्रलिखित पुत्तलिकाएँ लिये हुए निरन्तर स्वच्छन्दतापूर्वक हँसते और खेलते हुए सुन्दर-सुन्दर बालकों एवं बालिकाओं तथा स्वर्गगङ्गाके तटपर उगे हुए पारिजातके वृक्षसमूहोंसे खचाखच भरा था। सुगन्धित एवं खिले हुए पुष्पसमूहोंसे सम्पन्न, कल्पवृक्षोंका आश्रय लेनेवाले कामधेनुसे पुरस्कृत, सिद्धविद्यामें अत्यन्त निपुण पुण्यवान् सिद्धोंद्वारा सेवित था। जो तीन लाख योजन ऊँचे और सौ योजनके विस्तारवाले थे। जिनमें सैकड़ों मोटी-मोटी डालियाँ थीं, जो असंख्य शाखासमूहों और असंख्य फलोंसे संयुक्त थे। परम मनोहर शब्द करनेवाले विभिन्न प्रकारके पक्षिसमूहोंसे व्याप्त थे। शीतल-सुगन्ध वायु जिन्हें कम्पायमान कर रही थी, ऐसे अविनाशी वटवृक्षोंसे, सहस्रों पुष्पोद्यानोंसे, सैकड़ों सरोवरोंसे तथा मणियों एवं रत्नोंसे बने हुए सिद्धेन्द्रोंके लाखों भवनोंसे वह नगर सुशोभित था। उसे देखकर परशुरामका मन अत्यन्त प्रसन्नतासे खिल उठा। फिर सामने ही उन्हें शंकरजीका शोभाशाली रमणीय आश्रम दीख पड़ा। विश्वकर्माने बहुमूल्य सुनहली मणियोंद्वारा उसकी रचना की थी। उसमें हीरे जड़े हुए थे। वह पंद्रह योजन ऊँचा और चार योजन विस्तृत था। उसके चारों ओर अत्यन्त सुन्दर सुडौल चौकोर परकोटा बना हुआ था। दरवाजोंपर नाना प्रकारकी चित्रकारियोंसे युक्त रत्नोंके किवाड़ लगे थे। वह उत्तम मणियोंकी वेदियोंसे युक्त तथा मणियोंके खंभोंसे सुशोभित था।
नारद! परशुरामने उस आश्रमके प्रधानद्वारके दाहिनी ओर वृषेन्द्रको और बायीं ओर सिंह तथा नन्दीश्वर, महाकाल, भयंकर पिंगलाक्ष, विशालाक्ष, बाण, महाबली विरूपाक्ष, विकटाक्ष, भास्कराक्ष, रक्ताक्ष, विकटोदर, संहारभैरव, भयंकर कालभैरव, रुरुभैरव, ईशकी-सी आभावाले महाभैरव, कृष्णाङ्गभैरव, दृढ़पराक्रमी क्रोधभैरव, कपालभैरव, रुद्रभैरव तथा सिद्धेन्द्रों, रुद्रगणों, विद्याधरों, गुह्यकों, भूतों, प्रेतों, पिशाचों, कूष्माण्डों, ब्रह्मराक्षसों, वेतालों, दानवों, जटाधारी योगीन्द्रों, यक्षों, किंपुरुषों और किन्नरोंको देखा। उन्हें देखकर भृगुनन्दनने उनके साथ वार्तालाप किया। फिर नन्दिकेश्वरकी आज्ञा ले वे प्रसन्न मनसे भीतर घुसे। आगे बढ़नेपर उन्हें बहुमूल्य रत्नोंके बने हुए सैकड़ों मन्दिर दीख पड़े, जो अमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित चमचमाते हुए कलशोंसे सुशोभित थे। अमूल्य रत्नोंके बने हुए किवाड़, जिनमें हीरे जड़े हुए थे और मोतियाँ एवं निर्मल शीशे लगे हुए थे, उन मन्दिरोंकी शोभा बढ़ा रहे थे। उनमें गोरोचना नामक मणियोंके हजारों खंभे लगे थे और वे मणियोंकी सीढ़ियोंसे सम्पन्न थे। परशुरामने उनके भीतरी द्वारको देखा, जो नाना प्रकारकी चित्रकारीसे चित्रित तथा हीरे-मोतियोंकी गुँथी हुई मालाओंसे सुशोभित था। उसकी बायीं ओर कार्तिकेय और दाहिनी ओर गणेश तथा शिव-तुल्य पराक्रमी विशालकाय वीरभद्र दीख पड़े। नारद! वहाँ प्रधान-प्रधान पार्षद और क्षेत्रपाल भी रत्नाभरणोंसे विभूषित हो रत्ननिर्मित सिंहासनोंपर बैठे हुए थे। महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न भृगुवंशी