ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगणपतिखण्ड ४०३ और सृष्टि-रचनाके समय प्रकट हो जाती है। जैसे मिट्टीके बिना कुम्हार घड़ा नहीं बना सकता और स्वर्णके बिना सोनार कुण्डलका निर्माण करनेमें असमर्थ है (उसी तरह स्रष्टा मायाके बिना सृष्टि- रचना नहीं कर सकते)। वह शक्ति ईश्वरकी इच्छासे सृष्टिकालमें राधा, पद्मा, सावित्री, दुर्गादेवी और सरस्वती नामसे पाँच प्रकारकी हो जाती हैं। परमात्मा श्रीकृष्णकी जो प्राणाधिष्ठात्री देवी हैं, वह प्राणोंसे भी बढ़कर प्रियतमा 'राधा' कही जाती हैं। जो सम्पूर्ण मङ्गलोंको सम्पन्न करनेवाली, परमानन्दरूपा तथा ऐश्वर्यकी अधिष्ठात्री देवी हैं; वे 'पद्मा' नामसे पुकारी जाती हैं। जो वेद, शास्त्र और योगकी जननी, परम दुर्लभ और परमेश्वरकी विद्याकी अधिष्ठात्री देवी हैं; उनका नाम 'सावित्री' है। जो सर्वशक्तिस्वरूपिणी, सर्वज्ञानात्मिका, सर्वस्वरूपा और बुद्धिकी अधिष्ठात्री देवी हैं; वे दुर्गनाशिनी 'दुर्गा' कहलाती हैं। जो वाणीकी अधिष्ठात्री देवी और सदा शास्त्र-ज्ञान प्रदान करनेवाली हैं तथा जो श्रीकृष्णके कण्ठसे उत्पन्न हुई हैं; वे देवी 'सरस्वती' कही जाती हैं। आदिमें स्वयं मूलप्रकृति परमेश्वरीदेवी पाँच प्रकारकी थीं। परंतु वे ही पीछे सृष्टि-क्रमसे बहुत-सी कलाओंवाली हो गयीं। सृष्टि-कालमें मायाद्वारा स्त्रियाँ प्रकृतिके और पुरुषगण पुरुषके अंशसे उत्पन्न हुए; क्योंकि माया-शक्ति बिना सृष्टि नहीं हो सकती। ब्रह्मन् ! प्रत्येक विश्वमें सृष्टि सदा ब्रह्मासे ही प्रकट होती है। विष्णु उसके पालक और निरन्तर मङ्गल प्रदान करनेवाले शिव संहारक हैं। परशुराम ! यह ज्ञान दत्तात्रेयजीका दिया हुआ है, उन्होंने पुष्करतीर्थमें माघी पूर्णिमाके दिन दीक्षाके अवसरपर मुनिवरोंके संनिकट मुझे दिया था। इतना कहकर कार्तवीर्यने मुस्कराते हुए परशुरामको नमस्कार किया और शीघ्र ही बाणसहित धनुष हाथमें लेकर वह रथपर जा बैठा। तत्पश्चात् परशुरामने श्रीहरिका स्मरण करते हुए ब्रह्मास्त्रद्वारा राजाकी सेनाका सफाया कर दिया। फिर लीलापूर्वक पाशुपतास्त्रका प्रयोग करके राजाकी जीवनलीला समाप्त कर दी। इसी प्रकार परशुरामने शिवजीका स्मरण करते हुए खेल-ही-खेलमें क्रमशः इक्कीस बार पृथ्वीको राजाओंसे शून्य कर दिया। परशुरामने अपनी प्रतिज्ञाकी रक्षा करनेके लिये क्षत्रियोंके गर्भमें स्थित तथा माताकी गोदमें खेलनेवाले शिशुओंका, नौजवानोंका तथा वृद्धोंका संहार कर डाला। इस प्रकार कार्तवीर्य गोलोकमें श्रीकृष्णके संनिकट चला गया और परशुराम श्रीहरिका स्मरण करते हुए अपने आश्रमको लौट गये। महेश्वरने इक्कीस बार पृथ्वीको भूपालोंसे हीन देख और रामको फरसेद्वारा क्रीडा करते देखकर उनका नाम परशुराम रख दिया। नारद! तब देवता, मुनि, देवियाँ, सिद्ध, गन्धर्व, किन्नर - ये सभी लोग परशुरामके मस्तकपर पुष्पोंकी वृष्टि करने लगे। स्वर्गमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं और हरिनाम- संकीर्तन होने लगा। इस प्रकार परशुरामके उज्ज्वल यशसे सारा जगत् व्याप्त हो गया। फिर ब्रह्मा, भृगु, शुक्र, च्यवन, वाल्मीकि तथा परम प्रसन्न हुए जमदग्नि ब्रह्मलोकसे वहाँ पधारे। उनके सारे अङ्ग पुलकायमान थे और नेत्रोंमें आनन्दके आँसू छलक आये थे। वे सभी हाथमें दूब और पुष्प लेकर मङ्गलाशासन कर रहे थे। तब परशुरामने दण्डकी भाँति भूमिपर लेटकर उन सबको प्रणाम किया। तब क्रमशः 'तात' यों कहते हुए पहले ब्रह्माने उन्हें अपनी गोदमें बैठा लिया। फिर जगद्गुरु स्वयं ब्रह्मा परशुरामसे हितकारक, नीतियुक्त, वेदका सारतत्त्व और परिणाममें सुखदायक वचन बोले। ब्रह्माने कहा - राम ! जो सम्पूर्ण सम्पत्तियोंको देनेवाला परमोत्कृष्ट, सर्वसम्मत और सत्य है, वह काण्वशाखोक्त वचन कहता हूँ, सुनो। जो सभी पूजनीयोंमें इष्ट, पूज्यतम और प्रधान है, वह जन्म देनेके कारण जनक और पालन करनेके कारण पिता कहा जाता है। किंतु मुने! जो