ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३९६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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सुचन्द्र-पुत्र पुष्कराक्षके साथ परशुरामका युद्ध, पाशुपतास्त्र छोड़नेके लिये उद्यत परशुरामके पास विष्णुका आना और उन्हें समझाना, विष्णुका विप्रवेषसे पुत्रसहित पुष्कराक्षसे लक्ष्मीकवच तथा दुर्गाकवचको माँग लेना, लक्ष्मीकवचका वर्णन
श्रीनारायण कहते हैं—ब्रह्मन्! रणक्षेत्रमें राजाधिराजोंके शिरोमणि सुचन्द्रके गिर जानेपर तीन अक्षौहिणी सेनाके साथ पुष्कराक्ष आ धमका। महान् पराक्रमी राजा पुष्कराक्ष सूर्यवंशमें उत्पन्न, महालक्ष्मीका सेवक, लक्ष्मीवान् और सूर्यके समान प्रभावशाली था। वह सुचन्द्रका पुत्र था। उसके गलेमें महालक्ष्मीका मनोहर कवच बँधा था, जिसके प्रभावसे वह परमैश्वर्यसम्पन्न और त्रिलोकविजयी हो गया था। उसे देखकर बुद्धिमान् परशुरामके सभी भाई हाथोंमें नाना प्रकारके शस्त्रास्त्र धारण करके युद्ध करनेके लिये आ डटे। राजाने लीलापूर्वक बाणसमूहकी वर्षा करके उन्हें छेद डाला। तब उन वीरोंने भी हँसते-हँसते उन बाणोंके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। फिर तो पुष्कराक्षके साथ घोर युद्ध आरम्भ हुआ। परशुरामने पाशुपतास्त्रके सिवा सभी अस्त्र-शस्त्रोंका प्रयोग किया, पर पुष्कराक्षने सबको काट गिराया। तब अपने समस्त शस्त्रास्त्रोंको विफल देखकर परशुरामने स्नान करके शिवजीको प्रणाम किया और पाशुपतास्त्रका प्रयोग करना चाहा; इतनेमें भगवान् नारायण ब्राह्मणका वेष धारण करके वहाँ प्रकट हो गये और बोले।
[ ब्राह्मणवेषधारी ] नारायणने कहा—वत्स भार्गव! यह क्या कर रहे हो? तुम तो ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ हो; फिर भ्रमवश क्रोधावेशमें आकर मनुष्यका वध करनेके लिये पाशुपतका प्रयोग क्यों कर रहे हो? इस पाशुपतसे तो तत्काल ही सारा विश्व भस्म हो सकता है; क्योंकि यह शस्त्र परमेश्वर श्रीकृष्णके अतिरिक्त और सबका विनाशक है। अहो! पाशुपतको जीतनेकी शक्ति तो सुदर्शनमें ही है; क्योंकि श्रीहरिका सुदर्शनचक्र समस्त अस्त्रोंका मान मर्दन करनेवाला है। शिवजीका पाशुपतास्त्र और श्रीहरिका सुदर्शनचक्र—ये ही दोनों तीनों लोकोंमें समस्त अस्त्रोंमें प्रधान हैं। इसलिये ब्रह्मन्! तुम पाशुपतास्त्रको रख दो और मेरी बात सुनो। इस समय तुम जिस प्रकार महाबली राजा पुष्कराक्षको जीत सकोगे तथा जिस प्रकार अजेय कार्तवीर्यपर विजय पा सकोगे, वह सारा उपाय तुम्हें बतलाता हूँ; सावधानतया श्रवण करो। महालक्ष्मीका कवच, जो तीनों लोकोंमें दुर्लभ है, पुष्कराक्षने भक्तिपूर्वक विधि-विधानके साथ अपने गलेमें धारण कर रखा है और पुष्कराक्षका पुत्र दुर्गतिनाशिनी दुर्गाका परम अद्भुत एवं उत्तम कवच अपनी दाहिनी भुजापर बाँधे हुए है। इन कवचोंकी कृपासे वे दोनों विश्वपर विजय पा लेनेमें समर्थ हैं। उनके शरीरपर कवचोंके वर्तमान रहते त्रिभुवनमें उन्हें कौन जीत सकता है। मुने! मैं तुम्हारी प्रतिज्ञा सफल करनेके निमित्त उन दोनोंके संनिकट माँगनेके लिये जाऊँगा और उनसे कवचकी याचना करूँगा। ब्राह्मणकी बात सुनकर परशुरामका मन भयभीत हो गया, तब वे दुःखी हृदयसे उस वृद्ध ब्राह्मणसे बोले।
परशुरामने कहा—‘महाप्राज्ञ! ब्राह्मणरूपधारी आप कौन हैं, मैं यह नहीं जान पा रहा हूँ; अतः मुझ अनजानको शीघ्र ही अपना परिचय दीजिये, तत्पश्चात् राजाके पास जाइये।’ परशुरामका वचन सुनकर ब्राह्मणको हँसी आ गयी, वे ‘मैं विष्णु हूँ’ यों कहकर राजाके पास याचना करनेके लिये चले गये। उन दोनोंके संनिकट जाकर विष्णुने उनसे कवचकी याचना की। तब विष्णुकी