ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगणपतिखण्ड ३९७
मायासे मोहित होकर उन्होंने विष्णुको दोनों कवच दान कर दिये। भगवान् विष्णु उन कवचोंको लेकर वैकुण्ठको चले गये। नारदजीने पूछा—महामुने! भूपाल पुष्कराक्षको महालक्ष्मीका कवच किसने दिया था? तथा पुष्कराक्षके पुत्रको दुर्गाका दुर्लभ कवच किसने बताया था? आप इसे बतलानेकी कृपा करें; क्योंकि इसे सुननेकी मेरी प्रबल उत्कण्ठा है। जगद्गुरो! साथ ही मुझे यह भी बताइये कि उन दोनोंके कवच कैसे थे, उनका क्या फल है और वे दोनों मन्त्र किस तरहके थे? श्रीनारायणने कहा—नारद! बुद्धिमान् पुष्कराक्षको महालक्ष्मीका कवच और दशाक्षर- मन्त्र सनत्कुमारने दिया था। उन्होंने ही गोपनीय स्तोत्र, उसका चरित, पूजाकी विधि और सामवेदोक्त मनोहर ध्यान भी बतलाया था। दुर्गाका कवच, गुह्य स्तोत्र और दशाक्षर-मन्त्र पूर्वकालमें दुर्वासाने पुष्कराक्ष-पुत्रको प्रदान किया था। इसके पश्चात् देवीके उस परम अद्भुत सम्पूर्ण चरितको सुनोगे, जिसे उन्होंने महायुद्धके आरम्भमें प्रार्थना करनेपर बतलाया था। अब मैं तुम्हें महालक्ष्मीका मन्त्र बतलाता हूँ; उसे श्रवण करो। ‘ॐ श्रीं कमलवासिन्यै स्वाहा' यही वह परम अद्भुत मन्त्र है। मुने! सनत्कुमारने बुद्धिमान् पुष्कराक्षको जो पूजाविधि और सामवेदोक्त ध्यान बतलाया था, उसे सुनो। सहस्रदलकमल जिनका आसन है, जो भगवान् पद्मनाभकी सती-साध्वी प्रियतमा हैं, कमल जिनका घर है, जिनका मुख कमलके सदृश और नेत्र कमलपत्रकी-सी आभावाले हैं, कमलका फूल जिन्हें अधिक प्रिय है, जो कमल-पुष्पकी शय्यापर शयन करती हैं, जिनके हाथमें कमल शोभा पाता है, जो कमल-पुष्पोंकी मालासे विभूषित हैं, कमलोंके आभूषण जिनकी शोभा बढ़ाते हैं, जो स्वयं कमलोंकी शोभाकी वृद्धि करनेवाली हैं और मुस्कराती हुई जो कमल-वनकी ओर निहार रही हैं; उन पद्मिनी देवीका मैं आनन्दपूर्वक भजन करता हूँ। साधकको चाहिये कि चन्दनका अष्टदल- कमल बनाकर उसपर कमल-पुष्पोंद्वारा महालक्ष्मीकी पूजा करे। फिर 'गण'का भलीभाँति पूजन करके उन्हें षोडशोपचार समर्पित करे। तदनन्तर स्तुति करके भक्तिपूर्वक उनके सामने सिर झुकावे। ब्रह्मन् ! अब सबका साररूप कवच तुम्हें बतलाता हूँ; सुनो। श्रीनारायण आगे कहते हैं—विप्रवर! भगवान् पद्मनाभने अपने नाभिकमलपर स्थित ब्रह्माको लक्ष्मीका जो परम शुभकारक कवच प्रदान किया था, उसे सुनो। उस कवचको पाकर ब्रह्माने कमलपर बैठे-बैठे जगत्की सृष्टि की और महालक्ष्मीकी कृपासे वे लक्ष्मीवान् हो गये। फिर पद्मालयासे वरदान प्राप्त करके ब्रह्मा लोकोंके अधीश्वर हो गये। उन्हीं ब्रह्माने पद्मकल्पमें अपने प्रिय पुत्र बुद्धिमान् सनत्कुमारको यह परम अद्भुत कवच दिया था। नारद! सनत्कुमारने वह कवच पुष्कराक्षको प्रदान किया था, जिसके पढ़ने एवं धारण करनेसे ब्रह्मा समस्त सिद्धोंके स्वामी, महान् परमैश्वर्यसे सम्पन्न और सम्पूर्ण सम्पदाओंसे युक्त हो गये। सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके प्रदाता इस कवचके प्रजापति ऋषि हैं, बृहती छन्द है, स्वयं पद्मालया देवी हैं और धर्म-अर्थ-काम-मोक्षमें इसका विनियोग किया जाता है। यह परम अद्भुत कवच महापुरुषोंके पुण्यका कारण है। ‘ॐ ह्रीं कमलवासिन्यै स्वाहा' मेरे मस्तककी रक्षा करे। ‘श्रीं' मेरे कपालकी और ‘श्रीं श्रियै नमः' नेत्रोंकी रक्षा करे। ‘ॐ श्रीं श्रियै स्वाहा' सदा दोनों कानोंकी रक्षा करे। ‘ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्मै स्वाहा' मेरी नासिकाकी रक्षा करे। ‘ॐ श्रीं पद्मालयायै स्वाहा'