ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३९८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
सदा दाँतोंकी रक्षा करे। 'ॐ श्रीं कृष्णप्रियायै स्वाहा' सदा दाँतोंके छिद्रोंकी रक्षा करे। 'ॐ श्रीं नारायणेशायै स्वाहा' सदा मेरे कण्ठकी रक्षा करे। 'ॐ श्रीं केशवकान्तायै स्वाहा' सदा मेरे कंधोंकी रक्षा करे। 'ॐ श्रीं पद्मानिवासिन्यै स्वाहा' सदा नाभिकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं संसारमात्रे स्वाहा' सदा मेरे वक्षःस्थलकी रक्षा करे। 'ॐ श्रीं श्रीं कृष्णकान्तायै स्वाहा' सदा पीठकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं श्रियै स्वाहा' सदा मेरे हाथोंकी रक्षा करे। 'ॐ श्रीं निवासकान्तायै स्वाहा' सदा मेरे पैरोंकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं श्रियै स्वाहा' मेरे सर्वाङ्गकी रक्षा करे। पूर्व दिशामें 'महालक्ष्मी' और अग्निकोणमें 'कमलालया' मेरी रक्षा करें। दक्षिणमें 'पद्मा' और नैर्ऋत्यकोणमें 'श्रीहरिप्रिया' मेरी रक्षा करें। पश्चिममें 'पद्मालया' और वायव्यकोणमें स्वयं 'श्री' मेरी रक्षा करें। उत्तरमें 'कमला' और ईशानकोणमें 'सिन्धुकन्या' रक्षा करें। ऊर्ध्वभागमें 'नारायणेशी' रक्षा करें। अधोभागमें 'विष्णुप्रिया' रक्षा करें। 'विष्णुप्राणाधिका' सदा सब ओरसे मेरी रक्षा करें।
वत्स! इस प्रकार मैंने तुमसे इस सर्वैश्वर्यप्रद नामक परम अद्भुत कवचका वर्णन कर दिया। यह समस्त मन्त्रसमुदायका मूर्तिमान् स्वरूप है। धर्मात्मा पुरुष ब्राह्मणको मेरुके समान सुवर्णका पहाड़ दान करके जो फल पाता है, उससे कहीं अधिक फल इस कवचसे मिलता है। जो मनुष्य विधिवत् गुरुकी अर्चना करके इस कवचको गलेमें अथवा दाहिनी भुजापर धारण करता है, वह प्रत्येक जन्ममें श्रीसम्पन्न होता है और उसके घरमें लक्ष्मी सौ पीढ़ियोंतक निश्चलरूपसे निवास करती हैं। वह देवेन्द्रों तथा राक्षसराजोंद्वारा निश्चय ही अवध्य हो जाता है। जिसके गलेमें यह कवच विद्यमान रहता है, उस बुद्धिमान्ने सभी प्रकारके पुण्य कर लिये, सम्पूर्ण यज्ञोंमें दीक्षा ग्रहण कर ली और समस्त तीर्थोंमें स्नान कर लिया। लोभ, मोह और भयसे भी इसे जिस-किसीको नहीं देना चाहिये; अपितु शरणागत एवं गुरुभक्त शिष्यके सामने ही प्रकट करना चाहिये। इस कवचका ज्ञान प्राप्त किये बिना जो जगज्जननी लक्ष्मीका जप करता है, उसके लिये करोड़ोंकी संख्यामें जप करनेपर भी मन्त्र सिद्धिदायक नहीं होता।*
(अध्याय ३८)
* नारायण उवाच
सर्वसम्पत्प्रदस्यास्य कवचस्य प्रजापतिः। ऋषिश्च्छन्दश्च बृहती देवी पद्मालया स्वयम्॥
धर्मार्थकाममोक्षेषु विनियोगः प्रकीर्तितः। पुण्यबीजं च महतां कवचं परमाद्भुतम्॥
ॐ ह्रीं कमलवासिन्यै स्वाहा मे पातु मस्तकम्। श्रीं मे पातु कपालं च लोचने श्रीं श्रियै नमः॥
ॐ श्रीं श्रियै स्वाहेति च कर्णयुग्मं सदाऽवतु। ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै स्वाहा मे पातु नासिकाम्॥
ॐ श्रीं पद्मालयायै च स्वाहा दन्तं सदाऽवतु। ॐ श्रीं कृष्णप्रियायै च दन्तरन्ध्रं सदाऽवतु॥
ॐ श्रीं नारायणेशायै मम कण्ठं सदाऽवतु। ॐ श्रीं केशवकान्तायै मम स्कन्धं सदाऽवतु॥
ॐ श्रीं पद्मानिवासिन्यै स्वाहा नाभिं सदाऽवतु। ॐ ह्रीं श्रीं संसारमात्रे मम वक्षः सदाऽवतु॥
ॐ श्रीं श्रीं कृष्णकान्तायै स्वाहा पृष्ठं सदाऽवतु। ॐ ह्रीं श्रीं श्रियै स्वाहा मम हस्तौ सदाऽवतु॥
ॐ श्रीं निवासकान्तायै मम पादौ सदाऽवतु। ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं श्रियै स्वाहा सर्वाङ्गं मे सदाऽवतु॥
प्राच्यां पातु महालक्ष्मीराग्नेय्यां कमलालया। पद्मा मां दक्षिणे पातु नैर्ऋत्यां श्रीहरिप्रिया॥
पद्मालया पश्चिमे मां वायव्यां पातु श्रीः स्वयम्। उत्तरे कमला पातु ऐशान्यां सिन्धुकन्या॥
नारायणेशी पातूर्ध्वमधो विष्णुप्रियाऽवतु। सततं सर्वतः पातु विष्णुप्राणाधिका मम॥