ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| गणपतिखण्ड | ३९९ |
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दुर्गाकवचका वर्णन
नारदजीने कहा—प्रभो! महालक्ष्मीके मनोहर कवचका वर्णन तो आपने कर दिया। ब्रह्मन्! अब दुर्गतिनाशिनी दुर्गाके उस उत्तम कवचको बतलाइये, जो पद्माक्षके प्राणतुल्य, जीवनदाता, बलका हेतु, कवचोंका सार-तत्त्व और दुर्गाकी सेवाका मूल कारण है।
श्रीनारायण बोले—नारद! प्राचीन कालमें श्रीकृष्णने गोलोकमें ब्रह्माको दुर्गाका जो शुभप्रद कवच दिया था, उसका वर्णन करता हूँ; सुनो। पूर्वकालमें त्रिपुर-संग्रामके अवसरपर ब्रह्माजीने इसे शंकरको दिया, जिसे भक्तिपूर्वक धारण करके रुद्रने त्रिपुरका संहार किया था। फिर शंकरने इसे गौतमको और गौतमने पद्माक्षको दिया, जिसके प्रभावसे विजयी पद्माक्ष सातों द्वीपोंका अधिपति हो गया। जिसके पढ़ने एवं धारण करनेसे ब्रह्मा भूतलपर ज्ञानवान् और शक्तिसम्पन्न हो गये। जिसके प्रभावसे शिव सर्वज्ञ और योगियोंके गुरु हुए और मुनिश्रेष्ठ गौतम शिव-तुल्य माने गये। इस 'ब्रह्माण्डविजय' नामक कवचके प्रजापति ऋषि हैं। गायत्री छन्द है। दुर्गतिनाशिनी दुर्गा देवी हैं और ब्रह्माण्डविजयके लिये इसका विनियोग किया जाता है। यह परम अद्भुत कवच महापुरुषोंका पुण्यतीर्थ है।
'ॐ ह्रीं दुर्गतिनाशिन्यै स्वाहा' मेरे मस्तककी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं' मेरे कपालकी और 'ॐ ह्रीं श्रीं' नेत्रोंकी रक्षा करे। 'ॐ दुर्गायै नमः' सदा मेरे दोनों कानोंकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं' सदा सब ओरसे मेरी नासिकाकी रक्षा करे। 'ह्रीं श्रीं हूं' दाँतोंकी और 'क्लीं' दोनों ओष्ठोंकी रक्षा करे। 'क्रीं क्रीं क्रीं' कण्ठकी रक्षा करे। 'दुर्गे' कपोलोंकी रक्षा करे। 'दुर्गविनाशिन्यै स्वाहा' निरन्तर कंधोंकी रक्षा करे। 'विपद्विनाशिन्यै स्वाहा' सब ओरसे मेरे वक्षःस्थलकी रक्षा करे। 'दुर्गे दुर्गे रक्षणीति स्वाहा' सदा नाभिकी रक्षा करे। 'दुर्गे दुर्गे रक्ष रक्ष' सब ओरसे मेरी पीठकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं दुर्गायै स्वाहा' सदा हाथ-पैरोंकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं दुर्गायै स्वाहा' सदा मेरे सर्वाङ्गकी रक्षा करे। पूर्वमें 'महामाया' रक्षा करे। अग्निकोणमें 'कालिका', दक्षिणमें 'दक्षकन्या' और नैर्ऋत्यकोणमें 'शिवसुन्दरी' रक्षा करे। पश्चिममें 'पार्वती', वायव्यकोणमें 'वाराही', उत्तरमें 'कुबेरमाता' और ईशानकोणमें 'ईश्वरी' सदा-सर्वदा रक्षा करें। ऊर्ध्वभागमें 'नारायणी' रक्षा करें और अधोभागमें सदा 'अम्बिका' रक्षा करें। जाग्रत्कालमें 'ज्ञानप्रदा' रक्षा करें और सोते समय 'निद्रा' सदा रक्षा करें।
इति ते कथितं वत्स सर्वमन्त्रौघविग्रहम्। सर्वैश्वर्यप्रदं नाम कवचं परमाद्भुतम्॥
सुवर्णपर्वतं दत्त्वा मेरुतुल्यं द्विजातये। यत् फलं लभते धर्मो कवचेन ततोऽधिकम्॥
गुरुमभ्यर्च्य विधिवत् कवचं धारयेत्तु यः। कण्ठे वा दक्षिणे बाहौ स श्रीमान् प्रतिजन्मनि॥
अस्ति लक्ष्मीर्गृहे तस्य निश्चला शतपूरुषम्। देवेन्द्रैश्चासुरेन्द्रैश्च सोऽवध्यो निश्चितं भवेत्॥
स सर्वपुण्यवान् धीमान् सर्वयज्ञेषु दीक्षितः। स स्नातः सर्वतीर्थेषु यस्येदं कवचं गले॥
यस्मै कस्मै न दातव्यं लोभमोहभयैरपि। गुरुभक्ताय शिष्याय शरणाय प्रकाशयेत्॥
इदं कवचमज्ञात्वा जपेल्लक्ष्मीं जगत्प्रसूम्। कोटिसंख्यप्रजप्तोऽपि न मन्त्रः सिद्धिदायकः॥
(गणपतिखण्ड ३८।६४-८२)