ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगणपतिखण्ड ४०९ हो। साधुस्वभाववाले शूरवीर राजा विष्णुयशा तुम्हारे मामा हैं। तुम किसके दोषसे ऐसे दुर्धर्ष हो गये हो ? इस अशुद्धिका कारण मुझे ज्ञात नहीं हो रहा है; क्योंकि जिनके दोषसे मनुष्य दूषित हो जाता है, तुम्हारे वे सभी सम्बन्धी शुद्ध मनवाले हैं। तुमने करुणासागर गुरु और अमोघ फरसा पाकर पहले क्षत्रिय-जातिपर परीक्षा करके पुनः गुरु-पुत्रपर परीक्षा की है। कहाँ तो श्रुतिमें 'गुरुको दक्षिणा देना उचित है' - यों सुना जाता है और कहाँ तुमने गुरुपुत्रके दाँतको ही तोड़ दिया, अब उसका मस्तक भी काट डालो। शंकरके वरदान तथा अमोघवीर्य फरसेसे तो चूहोंको खानेवाला सियार सिंह और शार्दूलको भी मार सकता है। जितेन्द्रिय पुरुषोंमें श्रेष्ठ गणेश तुम्हारे-जैसे लाखों- करोड़ों जन्तुओंको मार डालनेकी शक्ति रखता है, परंतु वह मक्खीपर हाथ नहीं उठाता। श्रीकृष्णके अंशसे उत्पन्न हुआ यह गणेश तेजमें श्रीकृष्णके ही समान है। अन्य देवता श्रीकृष्णकी कलाएँ हैं। इसीसे इसकी अग्रपूजा होती है। यों कहकर पार्वती क्रोधवश उन परशुरामको मारनेके लिये उद्यत हो गयीं। तब परशुरामने मन-ही-मन गुरुको प्रणाम करके अपने इष्टदेव श्रीकृष्णका स्मरण किया। इतनेमें ही दुर्गाने अपने सामने एक अत्यन्त बौने ब्राह्मण-बालकको उपस्थित देखा। उसकी कान्ति करोड़ों सूर्योंके समान थी। उसके दाँत स्वच्छ थे। वह शुक्ल वस्त्र, शुक्ल यज्ञोपवीत, दण्ड, छत्र और ललाटपर उज्ज्वल तिलक धारण किये हुए था। उसके गलेमें तुलसीकी माला पड़ी थी। उसका रूप परम मनोहर था, मुखपर मन्द मुसकान थी और वह रत्नोंके बाजूबंद, कङ्कण और रत्नमालासे विभूषित था। पैरोंमें रत्नोंके नूपुर थे। मस्तकपर बहुमूल्य रत्नोंके मुकुटकी उज्ज्वल छटा थी और कपोलोंपर रत्ननिर्मित दो कुण्डल झलमला रहे थे, जिससे उसकी विशेष शोभा हो रही थी। वह भक्तोंका ईश और भक्तवत्सल था तथा भक्तोंको बायें हाथसे स्थिरमुद्रा और दाहिने हाथसे अभयमुद्रा दिखा रहा था। उसके साथ नगरके हँसते हुए बालक और बालिकाओंका समूह था और कैलासवासी आबालवृद्ध सभी उसकी ओर हर्षपूर्वक देख रहे थे। उस बालकको देखकर पुत्रों तथा भृत्योंसहित शम्भुने घबराकर भक्तिपूर्वक सिर झुकाकर प्रणाम किया। तत्पश्चात् दुर्गाने भी दण्डकी भाँति भूमिपर लेटकर नमस्कार किया। तब बालकने सबको अभीष्टप्रद आशीर्वाद दिया। उसे देखकर सभी बालक भयके कारण महान् आश्चर्यमें पड़ गये। तदनन्तर शिवजीने भक्तिपूर्वक उसे षोडशोपचार समर्पित करके उस परिपूर्णतमकी वेदोक्त-विधिसे पूजा की और फिर सिर झुकाकर काण्वशाखामें कहे हुए स्तोत्रद्वारा उन सनातन भगवान्की स्तुति की। उस समय उनके सर्वाङ्गमें रोमाञ्च हो आया था। पुनः जो रत्नसिंहासनपर आसीन थे और अपने उत्कृष्ट तेजसे जिन्होंने सबको आच्छादित कर रखा था, उन वामन- भगवान्से स्वयं शंकरजी कहने लगे। शंकरजीने कहा - ब्रह्मन् ! जो आत्माराम हैं, उनके विषयमें कुशलप्रश्न करना अत्यन्त विडम्बनाकी बात है; क्योंकि वे स्वयं कुशलके आधार और कुशल-अकुशलके प्रदाता हैं। श्रीकृष्णकी सेवाके फलोदयसे आज आप जो मुझे अतिथिरूपसे प्राप्त हुए हैं, इससे मेरा जन्म सफल और जीवन धन्य हो गया। कृपासागर परिपूर्णतम श्रीकृष्ण लोगोंके उद्धारके लिये पुण्यक्षेत्र भारतमें अपनी कलासे अवतीर्ण हुए हैं। जिसने अतिथिका आदर-सत्कार किया है, उसने मानो सम्पूर्ण देवताओंकी पूजा कर ली; क्योंकि जिसपर अतिथि प्रसन्न हो जाता है, उसपर स्वयं श्रीहरि प्रसन्न हो जाते हैं। समस्त तीर्थोंमें स्नान करनेसे, सर्वस्व दान करनेसे, सभी प्रकारके व्रतोपवाससे, सम्पूर्ण यज्ञोंमें दीक्षा ग्रहण करनेसे, सभी प्रकारकी