भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 418, कुल 810 में से

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पृष्ठ 418

४०८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण पार्वतीकी शिवसे प्रार्थना, परशुरामको देखकर उन्हें मारनेके लिये उद्यत होना, परशुरामद्वारा इष्टदेवका ध्यान, भगवान्का वामनरूपसे पधारना, शिव-पार्वतीको समझाना और गणेशस्तोत्रको प्रकट करना पार्वतीने कहा- प्रभो! जगत्में सभी लोग शंकरकी किंकरी मुझ दुर्गाको जानते हैं कि यह अपेक्षारहित दासी है, उसका जीवन व्यर्थ है। परंतु ईश्वरके लिये तृणसे लेकर पर्वतपर्यन्त सभी जातियाँ समान हैं; अतः दासीपुत्र गणेश और आपके शिष्य परशुराम-इन दोनोंमें किसका दोष है, इसपर विचार करना उचित है; क्योंकि आप धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ हैं। वीरभद्र, कार्तिकेय और पार्षदगण इसके साक्षी हैं। भला, गवाहीके काममें झूठ कौन कहेगा। साथ ही ये दोनों भाई इन लोगोंके लिये समान हैं। यों तो धर्म-निर्णयके अवसरपर गवाही देते समय सत्पुरुषोंके लिये शत्रु और मित्र समान हो जाते हैं (अर्थात् उनकी पक्षपातकी भावना नहीं रहती); क्योंकि जो गवाह गवाहीके विषयको ठीक-ठीक जानते हुए भी सभामें काम, क्रोध, लोभ अथवा भयके कारण झूठी गवाही देता है, वह अपनी सौ पीढ़ियोंको नरकमें गिराकर स्वयं भी कुम्भीपाक नरकमें जाता है। यद्यपि मैं इन दोनोंको समझाने तथा इसका निर्णय करनेमें समर्थ हूँ, तथापि आपके समक्ष मेरा आज्ञा देना श्रुतिमें निन्दित कहा गया है। प्रभो! सभामें राजाके वर्तमान रहते भृत्योंकी प्रभाका उसी प्रकार मूल्य नहीं होता, जैसे सूर्यके उदय होनेपर पृथ्वीपर जुगनूकी कोई गणना नहीं होती। सदा परित्यागके भयसे डरी हुई मैंने चिरकालतक तपस्या करके आपके चरणकमलोंको पाया है; अतः जगन्नाथ ! दारुण पुत्र-स्नेहके कारण क्रोध, शोक और मोहके वशीभूत होकर मैंने जो कुछ कहा है, उसे क्षमा कीजिये। यदि आपने मेरा परित्याग कर दिया तो उस पुत्रसे क्या लाभ ? क्योंकि उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई पतिव्रता नारीके लिये पति सौ पुत्रोंसे बढ़कर है। जो नारी नीच कुलमें उत्पन्न, दुष्टस्वभाववाली, ज्ञानहीन और माता-पिताके दोषसे निन्दित होती है, वह अपने पतिको नहीं मानती। उत्तम कुलमें पैदा हुई स्त्री अपने निन्दित, पतित, मूर्ख, दरिद्र, रोगी और जड पतिको भी सदा विष्णुके समान समझती है। समस्त तेजस्वियोंमें श्रेष्ठ अग्नि अथवा सूर्य पतिव्रताके तेजकी सोलहवीं कलाकी समानता नहीं कर सकते। महादान, पुण्यप्रद व्रतोपवास और तप- ये सभी पति-सेवाके सोलहवें अंशकी समता करनेके योग्य नहीं हैं। * उत्तम कुलमें जन्म लेनेवाली स्त्रियोंके लिये चाहे पुत्र हो, पिता हो अथवा सहोदर भाई हो, कोई भी पतिके समान नहीं होता। स्वामीसे इतना कहकर दुर्गाने अपने सामने परशुरामको देखा, जो निर्भय होकर शम्भुके चरणकमलोंकी सेवा कर रहे थे। तब पार्वती उनसे बोलीं। पार्वतीने कहा- हे महाभाग राम! तुम ब्रह्मवंशमें उत्पन्न हुए हो। तुम्हारी बुद्धि सदसत्का विवेचन करनेवाली है। तुम जमदग्निके पुत्र और योगियोंके गुरु इन महादेवके शिष्य हो। सती- साध्वी रेणुका, जो लक्ष्मीके अंशसे उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई हैं, तुम्हारी माता हैं। तुम्हारे नाना विष्णुभक्त और मामा उनसे भी बढ़कर वैष्णव हैं। तुम मनुके वंशमें उत्पन्न हुए राजा रेणुकके दौहित्र

  • कुत्सितं पतितं मूढं दरिद्रं रोगिणं जडम्। कुलजा विष्णुतुल्यं च कान्तं पश्यति संततम् ॥ हुताशनो वा सूर्यो वा सर्वतेजस्विनां परः। पतिव्रतातेजसश्च कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ महादानानि पुण्यानि व्रतान्यनशनानि च। तपांसि पतिसेवायां कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ (गणपतिखण्ड ४४ । १३-१५)
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