भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

११६- बाणासुरका हजारों बाण चलाना

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७६७

अतः उन्होंने सीतासे कहा—'प्रिये! इस समय अत्यन्त स्वादिष्ट निर्मल जल, अन्न, मनोहर व्यञ्जन तथा सारी वस्तुएँ अत्यन्त शीतल हैं।' यों कहकर उन्होंने फल-संग्रह किया और हर्षपूर्वक उन्हें सीताको प्रदान किया। तत्पश्चात् लक्ष्मणको देकर पीछे स्वयं प्रभुने भोग लगाया। लक्ष्मणने वह फल और जल ले तो लिया, परंतु खाया नहीं; क्योंकि वे सीताका उद्धार करनेके लिये मेघनादका वध करना चाहते थे। (उनको यह पता था कि) जो चौदह वर्षतक न तो नींद लेगा और न भोजन करेगा; वही योगी पुरुष उस रावणकुमार मेघनादको मार सकेगा। इसी बीच कमललोचन रामका दर्शन करनेके लिये कृपानिधि अग्नि ब्राह्मणका वेष धारण करके वहाँ आये और कर्णकटु भविष्य-वचन कहने लगे।

अग्निदेव बोले—महाभाग राम! मेरी बात सुनो और सीताकी भलीभाँति रक्षा करो; क्योंकि प्राक्तन कर्मवश दुर्निवार्य एवं दुष्ट राक्षस रावण सात दिनके भीतर ही जानकीको हर ले जायगा। भला, विधाताने जिस प्राक्तन कर्मको लिख दिया है; उसे कौन मिटा सकता है? चारों देवताओंने भी यही कहा है कि दैवसे बढ़कर श्रेष्ठ दूसरा कोई नहीं है।

तब श्रीरामजीने कहा—अग्निदेव! तब तो सीताको आप अपने साथ लेते जाइये और उसकी छाया यहीं रहेगी; क्योंकि पत्नीके बिना किया हुआ कर्म सभीके लिये निन्दित होता है। तब अग्निदेव रोती हुई सीताको साथ लेकर चले गये और सीताके सदृश जो छाया थी; वह रामके संनिकट रहने लगी। पूर्वकालमें रावणने खेल-ही-खेलमें उसी छायाका हरण किया था और श्रीरामने भाई-बन्धुओंसहित उस रावणका वध करके उस छायाका ही उद्धार किया था। अग्नि-परीक्षाके अवसरपर जो छाया अग्निमें प्रविष्ट हुई थी; उस छायाको अपने संरक्षणमें रखकर अग्निने रामको असली जानकी लौटा दी। तब श्रीराम जानकीको लेकर हर्षपूर्वक अपने आश्रमको चले गये और छाया दुःखित हृदयसे अग्निके पास रहने लगी। वही छाया नारायण-सरोवरमें जाकर तप करने लगी। उसने सौ दिव्य वर्षोंतक शंकरजीके लिये घोर तपस्या की; तब शंकरजी प्रकट होकर उससे बोले—'भद्रे! वर माँगो।' वह पतिके दुःखसे दुःखी थी; अतः व्यग्रतापूर्वक शिवजीसे बोली। उसने उस व्यग्रतामें ही त्रिनेत्रधारी शिवजीसे 'पतिं देहि'—पति दीजिये यों पाँच बार वर माँगा। तब सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके प्रदाता शिव प्रसन्न होकर उसे वर देते हुए बोले।

श्रीमहादेवजीने कहा—साध्वि! तुमने व्याकुल होकर 'पतिं देहि'—पति दीजिये यों पाँच बार कहा है; अतः श्रीहरिके अंशभूत पाँच इन्द्र तुम्हारे पति होंगे। वे ही सभी पाँचों इन्द्र इस समय पाँच पाण्डव हुए हैं और वह छाया द्रौपदीरूपमें यज्ञकुण्डसे उत्पन्न हुई है। यही छाया कृतयुगमें वेदवती, त्रेतामें जनकनन्दिनी और द्वापरमें द्रौपदी हुई है; इसी कारण यह त्रिहायणी कृष्णा कहलाती है। यह वैष्णवी तथा श्रीकृष्णकी भक्त है; इसलिये भी कृष्णा कही जाती है। वही पीछे चलकर महेन्द्रोंकी स्वर्गलक्ष्मी होगी। राजा द्रुपदने कन्याके स्वयंवरमें उसे अर्जुनको दिया। वीरवर अर्जुनने मातासे पूछा—'माँ! इस समय मुझे एक वस्तु मिली है।' तब माताने अर्जुनसे कहा—'उसे सभी भाइयोंके साथ बाँटकर ग्रहण करो।' इस प्रकार पहले शम्भुका वरदान था ही, पीछे माता कुन्तीकी भी आज्ञा हो गयी—इसी कारण पाँचों पाण्डव द्रौपदीके पति हुए। ये पाँचों पाण्डव चौदह इन्द्रोंमेंसे पाँच इन्द्र हैं।

माताद्वारा भर्त्सना किये जानेपर शंकरजीने मेरी माता रतिको शाप देते हुए कहा—'रति! तुम्हारा पति शंकरकी क्रोधाग्निसे जलकर भस्म हो जायगा। इस समय तुम शापित होकर दैत्यके

११८- शिवजीद्वारा बाणासुरको श्रीकृष्णके चरणमें समर्पित करना

७६८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

अधीन होओगी। शम्बरासुर इन्द्रसहित देवताओंको जीतकर तुम्हें हर ले जायगा।' यों कहकर उन्होंने पुनः वरदान भी दिया—'तुम्हारा सतीत्व नष्ट नहीं होगा। जबतक तुम्हारा पति जीवित नहीं हो जाता, तबतक तुम शम्बरासुरको अपनी छाया देकर उसके घरमें वास करो।' दैत्येन्द्र! इस प्रकार मैंने तुमसे वह सारा पुरातन इतिहास कह सुनाया; अब देवोंके गुप्त चरित्रको श्रवण करो।

इसी समय बाणका प्रधान सेनापति महाबली सुभद्रने, जो कुम्भाण्डका भाई, बलसम्पन्न और महारथी था, शस्त्रोंसे लैस होकर समरभूमिमें बाणकी निर्भर्त्सना करके श्रीकृष्णपौत्र अनिरुद्धपर प्रलयाग्निकी भाँति चमकीला त्रिशूल चलाया; परंतु प्रद्युम्नकुमारने एक अर्धचन्द्रद्वारा उस शूलके टुकड़े-टुकड़े कर दिये। तब सुभद्रने सैकड़ों सूर्योंके समान प्रभावाली शक्ति फेंकी। अनिरुद्धने वैष्णवास्त्रद्वारा उस शक्तिको भी काट गिराया। फिर तो घोर संग्राम आरम्भ हो गया। अनिरुद्धने सुभद्रको मार गिराया। तदनन्तर बाणके साथ भयंकर युद्ध हुआ। जब अनिरुद्ध बाणासुरका वध करनेको उद्यत हुए, तब कार्तिकेयने उसे बचा लिया। फिर कार्तिकेयके साथ उनका महान् संग्राम हुआ।

(अध्याय ११६)


गणेश-शिव-संवाद

**श्रीनारायण कहते हैं—**नारद! इसी समय गणेशने शिवजीके स्थानपर जाकर उन महेश्वरको नमस्कार किया और बाण-अनिरुद्धका युद्ध, सुभद्राका वध, स्कन्द और अनिरुद्धका युद्ध तथा अनिरुद्धका प्रबल पराक्रम—यह सारा वृत्तान्त क्रमशः पृथक्-पृथक् कह सुनाया। गणेशका कथन सुनकर भगवान् शंकर हँस पड़े और कोमल वाणीद्वारा परम गुप्त एवं वेदसम्मत वचन बोले।

**श्रीमहादेवजीने कहा—**महाभाग गणेश्वर! मेरा वचन, जो हितकारक, तथ्य, नीतिका साररूप तथा परिणाममें सुखदायक है, उसे श्रवण करो। असंख्य विश्वोंका समुदाय, कृष्णकुमार प्रद्युम्न, अनिरुद्ध तथा जो कार्य और कारणोंका कारण है, वह सब कुछ श्रीकृष्णको ही जानो। गणेश्वर! ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त सारा जगत् सनातन भगवान् श्रीकृष्णका स्वरूप है—इसे सत्य समझो। जो गोलोकमें दो भुजाधारी, शान्त, राधाके प्रियतम, मनोहर रूपवाले, शिशुरूप, गोप-वेषधारी, परिपूर्णतम प्रभु हैं; गोपियों, गोपसमुदायों तथा कामधेनुओंसे घिरे रहते हैं; पवित्र रमणीय वृन्दावनके रासमण्डलमें जो हाथमें मुरली लिये विचरते रहते हैं; ब्रह्मा, शिव, शेष जिनकी वन्दना करते हैं; जो शैलराज शतशृङ्गपर वटकी शान्त छायामें तथा भाण्डीरके निकट विरजा नदीके निर्मल तटपर स्थित गोष्ठमें विहार करते हैं; जिनके शरीरका वर्ण नूतन जलधरके समान श्याम है, पीताम्बरद्वारा जिनकी उसी प्रकार शोभा होती है, जैसे मेघोंकी नयी घटा बिजलीसे सुशोभित होती है। उस सबका गोलोकस्थित रासमण्डलमें आविर्भाव होता है। रमणीय गोकुल तथा पुण्य वृन्दावनमें जितने जीव हैं, वे सभी उस परम पुरुषकी अंशकलाएँ हैं; किंतु श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं। परिपूर्णतम काम ब्रह्मशापके कारण अपनेको भूल गया है। अनिरुद्ध उसी कामके पुत्र हैं, जो महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न हैं। इस अत्यन्त भयंकर महायुद्धमें मैंने ही स्कन्दको भेजा है। इस संग्राममें बाण मर चुका था; परंतु उस स्कन्दने ही उसे बचा लिया है। गणेश्वर! युद्धमें स्कन्द और अनिरुद्धकी समानता तो है,

९२- शृगालोपाख्यान

श्रीकृष्णजन्मखण्ड

७६९

किंतु आठों भैरव, एकादश रुद्र, आठ वसु, इन्द्र आदि ये देवगण, द्वादश आदित्य, सभी दैत्यराज, देवताओंके अग्रणी स्कन्द तथा गणसहित बाण—ये सभी संग्राममें अनिरुद्धको पराजित नहीं कर सकते। अनिरुद्ध स्वयं ब्रह्मा, प्रद्युम्न कामदेव, बलदेव स्वयं शेषनाग और श्रीकृष्ण प्रकृतिसे परे

हैं। गणेश्वर ! इस प्रकार यह सारा रहस्य मैंने तुम्हें बता दिया। तुम तो स्वयं ही शुभस्वरूप और विघ्नोंका विनाश करनेवाले हो; अतः बाणकी रक्षा करो। श्रीहरि अस्त्रश्रेष्ठ सुदर्शनको, जो अमोघ और करोड़ों सूर्योंके समान कान्तिमान् है, लेकर शीघ्र ही आयेंगे।

(अध्याय ११७)


मणिभद्रका शिवजीको सेनासहित श्रीकृष्णके पधारनेकी सूचना देना, शिवजीका बाणकी रक्षाके लिये दुर्गासे कहना, दुर्गाका बाणको युद्धसे विरत होनेकी सलाह देना

श्रीनारायण कहते हैं—नारद! इस प्रकार गणेशको समझाकर शिवजी महलके भीतर गये। वहाँ दुर्गतिनाशिनी दुर्गा, भैरवी, भद्रकाली, उग्रचण्डा और कोटरी रमणीय सिंहासनोंपर विराजमान थीं। उन सबने सहसा उठकर जगदीश्वर शिवको नमस्कार किया। तत्पश्चात् गणेश, पराक्रमी कार्तिकेय, बाण, वीरभद्र, स्वयं नन्दी, सुनन्दक, महामन्त्री महाकाल, आठों भैरव, सिद्धेन्द्र, योगीन्द्र और एकादश रुद्र—ये सभी वहाँ आ गये। इसी बीच सिंहद्वारपर पहरा देनेवाला स्वयं मणिभद्र वहाँ आया और उन परमेश्वर शिवसे बोला।

मणिभद्रने कहा—महेश्वर ! बलदेव, प्रद्युम्न, साम्ब, सात्यकि, महाराज उग्रसेन, स्वयं भीम, अर्जुन, अक्रूर, उद्धव और शक्रनन्दन जयन्त तथा जो विधिके भी विधाता हैं, जिनकी कान्ति करोड़ों कामदेवोंकी शोभाको छीने लेती है, वनमाला जिनकी शोभा बढ़ा रही है, सात गोप-पार्षद श्वेत चँवरोंद्वारा जिनकी सेवा कर रहे हैं, जो करोड़ों सूर्योंके समान कान्तिमान् अनुपम चक्र धारण करते हैं; वे परमेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण बहुमूल्य रत्नोंके सारभागसे निर्मित परम रमणीय उत्तम रथमें कौमोदकी गदा, अमोघ शूल और विश्वसंहारकारी महाशङ्ख पाञ्चजन्य रखकर यादवोंकी असंख्य

सेनाओंके साथ पधार गये हैं। प्रभो! बलदेवने हलके द्वारा लाखों मल्लोंका कचूमर निकाल दिया है और उद्यानोंकी चहारदीवारीको तोड़-फोड़ डाला है। वे द्वारपालोंका वध करके महाद्वारमें घुस आये हैं। ऐसा सुनकर महादेवजी उस सुर-समाजमें पार्वती, भद्रकाली, स्कन्द, गणपति, आठों भैरवों, एकादश रुद्रों, वीरभद्र, महाकाल, नन्दी तथा सभी नवों सेनापतियोंसे बोले।

श्रीमहादेवजीने कहा—सेनाध्यक्षो ! गोलोक-नाथ भगवान् चक्रपाणि आ गये हैं। वे क्षणभरमें विश्व-समूहका विनाश कर सकते हैं; फिर इस नगरकी तो बात ही क्या है। अतः तुम सब लोग सभी उपायोंद्वारा यलपूर्वक बाणकी रक्षा करो। अब बाण लम्बोदर गणेशका स्मरण करके संग्रामभूमिको जाय। उसके दक्षिणभागमें स्कन्द, आगे-आगे गणेश्वर और वामभागमें आठों भैरव, एकादश रुद्र, स्वयं महारथी नन्दी, महाकाल, वीरभद्र तथा अन्यान्य सैनिक उसकी रक्षा करें। ऊर्ध्वभागमें दुर्गा, भद्रकाली, उग्रचण्डा और कोटरीको रहना चाहिये। दुर्गतिनाशिनी दुर्गे! बाणकी रक्षा करो। महाभागे! तुम्हीं श्रीकृष्णकी शक्ति हो; इसीलिये 'नारायणी' कही जाती हो। विष्णुमाये! तुम जगज्जननी तथा सम्पूर्ण मङ्गलोंकी भी मङ्गलस्वरूपा हो; अतः चक्रोंके साररूप

७७०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

अमोघ सुदर्शनचक्रसे बाणको बचाओ; क्योंकि बाण मुझे गणेश, कार्तिकेय आदि सभीसे भी बढ़कर प्रिय है। अतः बाणके मस्तकपर तुम अपने चरणकमलकी रजके साथ-साथ अपना वरद हस्त स्थापित करो। शिवजीका कथन सुनकर दुर्गतिनाशिनी दुर्गा मुस्करायीं और समयोचित यथार्थ मधुर वचन बोलीं।

पार्वतीजीने कहा—बाण! तुम्हारे पास जो-जो उत्तम मणि, रत्न, मोती, माणिक्य और हीरे आदि हैं, उस सारे धनको तथा रत्नाभरणोंसे विभूषित अपनी कन्या उषाको रत्ननिर्मित आभूषणोंसे विभूषित परम श्रेष्ठ अनिरुद्धको आगे करके परमात्मा श्रीकृष्णको सौंप दो और इस प्रकार अपने राज्यको निष्कण्टक बना लो। भला, जिसके निकल जानेपर इन्द्रियोंसहित सभी प्राण विलीन हो जाते हैं, उस जीवका आत्माके साथ युद्ध कैसा? मैं ही शक्ति हूँ, ब्रह्मा मन हैं और स्वयं शिव ज्ञानस्वरूप हैं। शिवका त्याग करके देह तुरंत ही गिर जाता है और शवरूप हो जाता है। शिवजी! भला, संग्राममें सुदर्शनचक्रके तेजके सामने कौन ठहर सकता है? श्रीकृष्ण सबके परमात्मा, भक्तानुग्रहमूर्ति, नित्य, सत्य, परिपूर्णतम प्रभु हैं। गणेश और कार्तिकेय तथा उन दोनोंसे भी परे आप मेरे लिये प्रिय हैं और किंकरोंमें बाण प्रिय है; किंतु श्रीकृष्णसे बढ़कर प्यारा दूसरा कोई नहीं है। मैं ही वैकुण्ठमें महालक्ष्मी, गोलोकमें स्वयं राधिका, शिवलोकमें शिवा और ब्रह्मलोकमें सरस्वती हूँ। पूर्वकालमें मैं ही दैत्योंका संहार करके दक्षकन्या सती हुई, फिर वही मैं आपकी निन्दाके कारण शरीरका त्याग करके शैलकन्या पार्वती बनी। रक्तबीजके युद्धमें मैंने ही मूर्तिभेदसे कालीका रूप धारण किया था। मैं ही वेदमाता सावित्री, जनकनन्दिनी सीता और भारतभूमिपर द्वारकामें भीष्मक-पुत्री रुक्मिणी हूँ। इस समय दैववश सुदामाके शापसे मैं वृषभानुकी कन्या होकर प्रकट हुई हूँ और पुण्यमय वृन्दावनमें श्रीकृष्णकी धर्मपत्नी हूँ। आप तो स्वयं सर्वज्ञ सनातन भगवान् शिव हैं। भला, मैं आपको क्या समयोचित कर्तव्य बतला सकती हूँ।

(अध्याय ११८)


शिवजीका कन्या देनेके लिये बाणको समझाना, बाणका उसे अस्वीकार करना, बलिका आगमन और सत्कार, बलिका महादेवजीका चरणवन्दन करके श्रीभगवान्‌का स्तवन करना, श्रीभगवान्‌द्वारा बलिको बाणके न मारनेका आश्वासन

श्रीनारायण कहते हैं—नारद! पार्वतीकी बात सुनकर गणेश, कार्तिकेय, काली तथा स्वयं शिव उनकी प्रशंसा करने लगे। तदनन्तर जो परात्परा, ज्योतिःस्वरूपा, परमा, मूलप्रकृति और ईश्वरी हैं; उन जगज्जननी पार्वतीसे भगवान् शम्भु बोले।

श्रीमहादेवजीने कहा—देवेशि! तुमने जो यह कहा है कि परमात्माके साथ युद्ध करना अयुक्त तथा उपहासास्पद है; अतः बाण अपनी कन्या उषाको स्वर्णनिर्मित आभूषणोंसे विभूषित करके श्रीकृष्णको दे दे। यही समस्त कर्मोंमें सामञ्जस्य, यशस्कर और शुभदायक है। तुम्हारा यह सारा कथन वेदसम्मत है; परंतु बाण हिरण्यकशिपुका वंशज है; अतः यदि वह कन्या दे देता है और भयभीत होकर युद्धसे पराङ्मुख हो जाता है तो यह तुम्हारे लिये ही अकीर्तिकर है। इसलिये शिवे! रणशास्त्रविशारद बाण कवच धारण करके आगे चले; तत्पश्चात् हमलोग भी कवचसे सुसज्जित हो उसका अनुगमन करेंगे। पार्वतीसे यों कहकर शंकरजीने बाणसे कन्या

९३- गणेशके अग्रपूज्यत्व-वर्णनके प्रसङ्गमें राधाद्वारा गणेशकी अग्रपूजाका कथन

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७७१

देनेके लिये कहा; किंतु उसने स्वीकार नहीं किया। तब दुर्गा उसे समझाने लगीं; परंतु उनकी उत्तम बात उसकी समझमें न आयी। इसी समय महाबली बलि—जो महान् धर्मात्मा, वैष्णवोंमें अग्रगण्य और परमार्थके ज्ञाता हैं—रत्ननिर्मित रथपर आरूढ़ हो उस मनोरम सभामें आये। उस समय सात प्रयत्नशील दैत्य श्वेत चँवरोंद्वारा उनकी सेवा कर रहे थे और सात लाख दैत्येन्द्र उन्हें घेरे हुए थे। वे तुरंत ही रथसे उतरकर शिव, पार्वती, गणेश और कार्तिकेयको प्रणाम करके उस सभामें अवस्थित हुए। उन्हें निकट आया देखकर शंकरजीके अतिरिक्त अन्य सभी सभासद् उठ खड़े हुए। तब महादेवजी कुशल-प्रश्नके बाद उनसे मधुर वचन बोले।

श्रीमहादेवजीने कहा—भगवन्! तुम बड़े चतुर तथा सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके प्रदाता हो। ऐसे वैष्णवोंके साथ समागम होना ही परम लाभ है; क्योंकि वैष्णवके स्पर्शमात्रसे तीर्थ भी पवित्र हो जाते हैं। पवित्र ब्राह्मण सभी आश्रमोंके लिये पूजनीय होता है। उसमें भी यदि ब्राह्मण वैष्णव हो तो उससे भी अधिक पूज्य माना जाता है। मैं वैष्णव ब्राह्मणसे बढ़कर पवित्र किसीको नहीं देखता। वह पवन, अग्नि और समस्त तीर्थोंसे भी अधिक पावन है। उससे देवता भी डरते हैं। उसके शरीरमें पाप उसी प्रकार नहीं ठहरते; जैसे अग्निमें पड़ा हुआ सूखा घास-फूस।

तब बलि बोले—जगन्नाथ! आप मेरी प्रशंसा क्यों कर रहे हैं? महेश्वर! मैं तो आपका भृत्य हूँ न? नाथ! आपने ही तो मुझे अत्यन्त दुर्लभ परम ऐश्वर्य प्रदान किया है। सुरेश्वर! आप सर्वरूप तथा सर्वत्र वर्तमान हैं। इस समय दैववश आपने वामनरूप धारण करके मुझ भक्तसे ऐश्वर्य छीनकर इन्द्रको दे दिया है और मुझे सृष्टिके अधोभागमें स्थित सुतललोकमें स्थापित कर रखा है। अब मेरे औरस पुत्र बाणको, जिस प्रकार उसका कल्याण हो, शिक्षा दीजिये; क्योंकि आत्माके साथ युद्ध करना देवताओंमें भी निन्दित है। यों कहकर उन्होंने शिवजीको नमस्कार करके उनके चरणोंमें सिर रख दिया। उस समय उनका सारा शरीर पुलकित हो उठा। नेत्रोंमें आँसू छलक आये और वे अत्यन्त व्याकुल हो गये। तदनन्तर शुक्रद्वारा दिये गये एकादशाक्षरमन्त्रका जप करके वे सामवेदोक्त स्तोत्रद्वारा परमेश्वरकी स्तुति करने लगे।

बलिने कहा—प्रभो! पूर्वकालमें माता अदितिदेवीकी प्रार्थना तथा व्रतके फलस्वरूप आपने वामनरूप धारण करके मेरी वञ्चना की थी और सम्पत्तिरूपिणी महालक्ष्मीको मुझसे छीनकर मेरे पुण्यवान् भाई इन्द्रको, जो आपके भक्त हैं, दिया था। इस समय मेरा यह पुत्र बाण, जो शंकरजीका किङ्कर है; जिसकी भक्तोंके बन्धु उन शंकरजीने अपने पास रखकर रक्षा की है; माता पार्वतीने जिसका उसी भाँति पालन-पोषण किया है, जैसे माता अपने पुत्रका पालन करती है; उसी बाणकी सती-साध्वी युवती कन्याको (अनिरुद्धने) बलपूर्वक ग्रहण कर लिया

९४- गणेशकृत राधा-प्रशंसा, पार्वती-राधा-सम्भाषण, पार्वतीके आदेशसे सखियोंद्वारा राधाका शृङ्गार और उनकी विचित्र झाँकी; ब्रह्मा, शिव, अनन्त आदिके द्वारा राधाकी स्तुति

७७२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

है और वे बाणको भी मारनेके लिये उद्यत थे; परंतु कार्तिकेयने उसे बचा लिया है। फिर आप भी अपने पौत्रका दमन करनेमें समर्थ बाणको मारनेके लिये पधारे हैं। जगदीश्वर! श्रुतिमें तो ऐसा सुना गया है कि आप सर्वात्माका सर्वत्र समभाव रहता है; फिर ऐसा व्यतिक्रम आप क्यों कर रहे हैं? भला, जिसका वध आप करना चाहते हैं, उसकी इस भूतलपर कौन रक्षा कर सकता है? सुदर्शनका तेज करोड़ों सूर्योंके समान परमोत्कृष्ट है। भला, किन देवताओंके अस्त्रसे उसका निवारण हो सकता है? जैसे सुदर्शन अस्त्रोंमें सर्वश्रेष्ठ है; उसी प्रकार आप भी समस्त देवताओंके परमेश्वर हैं। जैसे आप हैं; उसी तरह श्रीकृष्ण भी ब्रह्माके विधाता हैं। विष्णु सत्त्वगुणके आधार, शिव सत्त्वके आश्रयस्थान और स्वयं सृष्टिकर्ता पितामह रजोगुणके विधाता हैं। जो तमोगुणके आश्रय, एकादश रुद्रोंमें सर्वश्रेष्ठ, विश्वके संहार-कर्ता एवं महान् हैं; वे भगवान् कालाग्निरुद्र शंकरके अंश हैं। इनके अतिरिक्त अन्य रुद्रगण शंकरजीकी कलाएँ हैं। उन सबमें आप गुणरहित तथा प्रकृतिसे परे हैं। आप सबके परमात्मा हैं। सभी प्राणधारियोंके प्राण विष्णुके स्वरूप हैं; स्वयं ब्रह्मा मनरूप हैं और स्वयं शिव ज्ञानात्मक हैं। समस्त शक्तियोंमें श्रेष्ठ ईश्वरी प्रकृति बुद्धि है। समस्त देहधारियोंमें जो जीव है, वह आपके ही आत्माका प्रतिबिम्ब है। जीव अपने कर्मोंका भोक्ता है और स्वयं आप उसके साक्षी हैं। आपके चले जानेपर सभी उसी प्रकार आपका अनुगमन करते हैं, जैसे राजाके चलनेपर उसके अनुगामी। आपके निकल जानेपर शरीर तुरंत धराशायी हो जाता है और शवरूप होकर अस्पृश्य बन जाता है; परंतु आपकी मायासे वञ्चित होनेके कारण बुद्धिमान् संतलोग इसे नहीं जान पाते। जो संत आपका भजन करते हैं; वे ही इस मायासे तर पाते हैं। त्रिगुणा प्रकृति, दुर्गा, वैष्णवी, सनातनी परा नारायणी और ईशानी—ये सब आपकी मायाके स्वरूप हैं। इनसे पार पाना अत्यन्त कठिन है। प्रत्येक विश्वमें होनेवाले ब्रह्मा, विष्णु और शिव आपके ही अंश हैं। जैसे विश्वेश्वर श्रीकृष्ण गोकुलमें वास करते हैं; उसी तरह जो समस्त लोकोंके आश्रय हैं, वे महान् विराट् योगबलसे जलमें शयन करते हैं। वे ही भगवान् वासु हैं, जिनके परम देवता आप हैं; इसीसे ‘वासुदेव’ नामसे विख्यात हैं—ऐसा पुरातत्त्ववेत्ता कहते हैं। आप ही अपनी कलासे सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, पवन, वरुण, कुबेर, यम, महेन्द्र, धर्म, शेष, ईशान तथ निर्ऋतिके रूपमें विराजमान हैं। मुनिसमुदाय, मनुगण, फलदायक ग्रह और समस्त चराचर जीव आपकी कलाके कलांशसे उत्पन्न हुए हैं। आप ही परम ज्योतिः-स्वरूप ब्रह्म हैं। योगीलोग आपका ही ध्यान करते हैं। आपके भक्तगण अपने अन्तःकरणमें आपका ही आदर करते तथा ध्यान लगाते हैं। (ध्यानका प्रकार यों है—)

जिनके शरीरका वर्ण नूतन जलधरके समान श्याम है, पीताम्बर ही जिनका परिधान है, जिनके प्रसन्नमुखपर मन्द मुस्कानकी छटा छायी हुई है, जो भक्तोंके स्वामी तथा भक्तवत्सल हैं, जिनका सर्वाङ्ग चन्दनसे अनुलिप्त है, जिनकी दो भुजाएँ हैं, जो मुरली धारण किये हुए हैं, जिनकी चूड़ामें मयूरपिच्छ शोभा दे रहा है; जो मालतीकी माला, अमूल्य रत्ननिर्मित बाजूबंद और कंकणसे विभूषित हैं, मणियोंके बने हुए दोनों कुण्डलोंसे जिनका गण्डस्थल उद्भासित हो रहा है, जो रत्नोंके सारभागसे बनी हुई अँगूठी और बजती हुई करधनीसे सुसज्जित हैं, जिनकी आभा करोड़ों कामदेवोंका उपहास कर रही है, जिनके नेत्र शारदीय कमलकी शोभाको पराजित कर रहे हैं, जिनकी मुख-छबि शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाकी निन्दा कर रही है और प्रभा करोड़ों चन्द्रमाओंके समान

· श्रीकृष्णजन्मखण्ड · ७७३

समुज्ज्वल है; करोड़ों-करोड़ों गोपियाँ मुसकराती हुई जिनकी ओर निहार रही हैं, समवयस्क गोप-पार्षद श्वेत चँवर डुलाकर जिनकी सेवा कर रहे हैं, जिनका वेष गोपालकके सदृश है; जो राधाके वक्षःस्थलपर स्थित एवं ध्यानद्वारा असाध्य और दुराराध्य हैं; ब्रह्मा, शिव और शेष जिनकी वन्दना करते हैं और सिद्धेन्द्र, मुनीन्द्र तथा योगीन्द्र प्रणत होकर जिनका स्तवन करते हैं; जो वेदोंद्वारा अनिर्वचनीय, परस्वेच्छामय और सर्वव्यापक हैं एवं जिनका स्वरूप स्थूलसे स्थूलतम और सूक्ष्मसे सूक्ष्मतम है; जो सत्य, नित्य, प्रशस्त, प्रकृतिसे परे, ईश्वर, निर्लिप्त और निरीह हैं; उन सनातन भगवान्‌का इस प्रकार ध्यान करके वे पवित्र हो जाते हैं और पद्माद्वारा समर्चित चरणकमलोंमें कोमल दूर्वाङ्कुर, अक्षत तथा जल निवेदित करनेके लिये उत्सुक हो उठते हैं। भगवन् ! वेद, सरस्वती, शेषनाग, ब्रह्मा, शम्भू, गणेश, सूर्य, चन्द्रमा, महेन्द्र और कुबेर—ये सभी आप परमेश्वरका स्तवन करनेमें समर्थ नहीं हैं; फिर अन्य जडबुद्धि जीवोंकी तो गणना ही क्या है। ऐसी दशामें मैं आप गुणातीत, निरीह, निर्गुण परमेश्वरकी क्या स्तुति कर सकता हूँ? नाथ ! यह एक मूर्ख असुर है, सुर नहीं है; अतः आप इसे क्षमा करें। बलिक कथन सुनकर जगदीश्वर परिपूर्णतम भक्तवत्सल भगवान् श्रीहरि अपने उस भक्तसे बोले।

श्रीभगवान्‌ने कहा— वत्स! डरो मत। तुम मेरे द्वारा सुरक्षित अपने गृह सुतललोकको जाओ। मेरे वर-प्रसादसे तुम्हारा यह पुत्र भी अजर-अमर होगा। मैं इस मूर्ख अभिमानीके दर्पका ही विनाश करूँगा; क्योंकि मैंने प्रसन्नचित्तसे अपने तपस्वी भक्त प्रह्लादको ऐसा वर दे रखा है कि 'तुम्हारा वंश मेरे द्वारा अवध्य होगा।' मैं तुम्हारे पुत्रको मृत्युञ्जय नामक परम ज्ञान प्रदान करूँगा। तुमने जिस सामवेदोक्त अभीष्ट स्तोत्रद्वारा मेरा स्तवन किया है; इसे पूर्वकालमें ब्रह्माने सूर्य-ग्रहणके अवसरपर प्रशस्त पुण्यतम सिद्धाश्रममें सनत्कुमारको प्रदान किया था। गौरीने मन्दाकिनीके तटपर इसे गौतमको बतलाया था। दयालु शंकरने अपने भक्त शिष्य ब्रह्माको इसका उपदेश किया था। विरजाके तटपर मैंने इसे शिवको प्रदान किया था। पूर्वकालमें बुद्धिमान् सनत्कुमारने इसे महर्षि भृगुको बतलाया था। इस समय तुम इसे बाणको दोगे और बाण इसके द्वारा मेरा स्तवन करेगा। यह स्तोत्र महान् पुण्यदायक है। जो मनुष्य भलीभाँति स्नानसे शुद्ध हो वस्त्र, भूषण और चन्दन आदिसे गुरुका वरण और पूजन करके उनके मुखसे इस स्तोत्रका उपदेश ग्रहणकर नित्य पूजाके समय भक्तिपूर्वक इसका पाठ करेगा, वह अपने करोड़ों जन्मोंके संचित पापसे मुक्त हो जायगा—इसमें तनिक भी संशय नहीं है। यह स्तोत्र विपत्तियोंका विनाशक, समस्त सम्पत्तियोंका कारण, दुःख-शोकका निवारक, भयंकर भवसागरसे उद्धार करनेवाला, गर्भवासका उच्छेदक, जरा-मृत्युका हरण करनेवाला, बन्धनों और रोगोंका खण्डन करनेवाला तथा भक्तोंके लिये शृङ्गार-स्वरूप है। जो इस स्तोत्रका पाठ करता है, उसने मानो समस्त तीर्थोंमें स्नान कर लिया, सभी यज्ञोंमें दीक्षा ग्रहण कर ली, सभी व्रतोंका अनुष्ठान कर लिया और सभी तपस्याएँ पूर्ण कर लीं। उसे निश्चय ही सम्पूर्ण दानोंका सत्य फल प्राप्त हो जाता है। इस स्तोत्रका एक लाख पाठ करनेसे मनुष्योंको स्तोत्रसिद्धि मिल जाती है। यदि स्तोत्र सिद्ध हो जाय तो उसे सारी सिद्धियाँ सुलभ हो जाती हैं। वह इस लोकमें देवतुल्य होकर अन्तमें श्रीहरिके पदको प्राप्त हो जाता है। (अध्याय ११९)

७७४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

बाणका यादवी सेनाके साथ युद्ध, बाणका धराशायी होना, शंकरजीका बाणको उठाकर श्रीकृष्णके चरणोंमें डाल देना, श्रीकृष्णद्वारा बाणको जीवन-दान, बाणका श्रीकृष्णको बहुत-से दहेजके साथ अपनी कन्या समर्पित करना, श्रीकृष्णका पौत्र और पौत्रवधूके साथ द्वारकाको लौट जाना और द्वारकामें महोत्सव

श्रीनारायण कहते हैं— नारद! तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णने उद्धव और बलदेवके साथ शुभ मन्त्रणा करके बाणके पास दूत भेजा। तब उस दूतने—जहाँ शिव, गणपति, दुर्गतिनाशिनी दुर्गा, कार्तिकेय, भद्रकाली, उग्रचण्डा और कोटरी—ये सब विद्यमान थे, वहाँ आकर शिव, शिवा, गणेश और पूजनीय मानवोंको नमस्कार किया और यथोचित वचन कहा।

दूत बोला— महेश्वर! भगवान् श्रीकृष्ण बाणको युद्धके लिये ललकार रहे हैं; अतः वह या तो युद्ध करे अथवा अनिरुद्ध और उषाको लेकर उनके शरणापन्न हो जाय; क्योंकि रणके लिये बुलाये जानेपर जो पुरुष भयभीत होकर सम्मुख युद्धार्थ नहीं जाता है, वह परलोकमें अपने सात पूर्वजोंके साथ नरकगामी होता है। दूतकी बात सुनकर स्वयं पार्वतीदेवी सभाके मध्यमें शंकरजीके संनिकट ही यथोचित वचन बोलीं।

पार्वतीने कहा— महाभाग बाण! तुम अपनी कन्याको लेकर उनके पास जाओ और प्रार्थना करो। फिर अपना सर्वस्व दहेजमें देकर श्रीकृष्णकी शरण ग्रहण करो; क्योंकि वे सबके ईश्वर तथा कारण, समस्त सम्पत्तियोंके दाता, श्रेष्ठ, वरेण्य, आश्रयस्थान, कृपालु और भक्तवत्सल हैं। पार्वतीका वचन सुनकर सभामें उपस्थित सभी सुरेश्वरोंने धन्य-धन्य कहते हुए उनकी प्रशंसा की और बाणसे वैसा करनेके लिये कहा; परंतु बाण क्रोधसे आगबबूला हो उठा, उसका शरीर काँपने लगा और नेत्र लाल हो गये। फिर तो वह असुर सहसा उठ खड़ा हुआ और सबके मना करनेपर भी कवचसे सुसज्जित हो हाथमें धनुष ले शंकरजीको प्रणाम करके करोड़ों कवचधारी महाबली दैत्योंके साथ चल पड़ा। तब कुम्भाण्ड, कूपकर्ण, निकुम्भ और कुम्भ—इन प्रधान सेनापतियोंने भी कवच धारण करके उसका अनुगमन किया। फिर उन्मत्तभैरव, संहारभैरव, असिताङ्गभैरव, रुरुभैरव, महाभैरव, कालभैरव, प्रचण्डभैरव और क्रोधभैरव—ये सभी भी कवच धारण करके शक्तियोंके साथ गये। कवचधारी भगवान् कालाग्निरुद्रने भी रुद्रोंके साथ गमन किया। उग्रचण्डा, प्रचण्डा, चण्डिका, चण्डनायिका, चण्डेश्वरी, चामुण्डा, चण्डी और चण्डक पालिका—ये सभी आठों नायिकाएँ हाथमें खप्पर ले उसके पीछे-पीछे चलीं। शोणितपुरकी ग्रामदेवता कोटरीने भी रत्ननिर्मित रथपर सवार हो प्रस्थान किया। उस समय उसका मुख प्रफुल्लित था और वह खड्ग तथा खप्पर लिये हुए थी। चन्द्राणी, शान्तस्वरूपा वैष्णवी, ब्रह्मवादिनी ब्रह्माणी, कौमारी, नारसिंही, विकट आकारवाली वाराही, महामाया माहेश्वरी और भीमरूपिणी भैरवी—ये सभी आठों शक्तियाँ हर्षपूर्वक रथपर सवार हो नगरसे बाहर निकलीं। जो रक्तवर्णवाली और त्रिनेत्रधारिणी हैं तथा जीभ लपलपानेके कारण जो भयंकर प्रतीत होती हैं, वे भद्रकालिका हाथोंमें शूल, शक्ति, गदा, खड्ग और खप्पर धारण करके बहुमूल्य रत्नोंके सारभागसे बने हुए रथपर सवार होकर चलीं। फिर महेश्वर हाथमें त्रिशूल ले नन्दीश्वरपर चढ़कर तथा धनुर्धर स्कन्द हाथमें शस्त्र ले अपने वाहन मयूरपर सवार होकर चले। इस प्रकार गणेश और पार्वतीको छोड़कर शेष

• श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७७५

सभी लोगोंने बाणका अनुगमन किया। इन सबसे युक्त महादेव और भद्रकालिकाको देखकर चक्रपाणि श्रीकृष्णने यथोचितरूपसे सम्भाषण किया। तदनन्तर बाणने शङ्खध्वनि करके पार्वतीश्वर शिवको प्रणाम किया और धनुषकी प्रत्यञ्चा चढ़ाकर उसपर दिव्यास्त्रका संधान किया।

इस प्रकार बाणको युद्धके लिये उद्यत देखकर शत्रु-वीरोंका संहार करनेवाले सात्यकि उपस्थित सभी लोगोंके द्वारा मना किये जानेपर भी कवच धारण करके हर्षपूर्वक आगे बढ़े। नारद! तब बाणने उनपर मञ्छन नामक दिव्यास्त्रका प्रयोग किया। वह अस्त्र अमोघ, ग्रीष्म-ऋतुके मध्याह्नकालिक सूर्यके समान प्रकाशमान तथा अत्यन्त तीखा था। फिर तो घोर युद्ध होने लगा। परस्पर बड़े-बड़े घोर दिव्यास्त्रोंका प्रयोग किया गया। भयानक समर होते-होते जब भगवान् कालाग्नि नामक रुद्रके महाबली हलधर बलदेवजीको बाणासुरका वध करनेके लिये तैयार देखा, तब उन्होंने उनको रोक दिया। इसपर बलदेवजीने क्रुद्ध होकर कालाग्निरुद्रके रथ, घोड़े और सारथिका नाश कर दिया। तब कालाग्निरुद्रने कोपमें भरकर भयंकर ज्वर छोड़ा। इससे श्रीहरिके अतिरिक्त अन्य सभी यादव ज्वरसे आक्रान्त हो गये। उस ज्वरको देखकर भगवान् श्रीकृष्णने वैष्णव-ज्वरकी सृष्टि की और उस रणके मुहानेपर माहेश्वर-ज्वरका विनाश करनेके लिये उसे चला दिया। फिर तो दो घड़ीतक उन दोनों ज्वरोंमें बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। अन्तमें उस रणाङ्गणमें वैष्णव-ज्वरसे आक्रान्त होकर माहेश्वर-ज्वर धराशायी हो गया, उसकी सारी चेष्टाएँ शान्त हो गयीं। पुनः चेतनामें आकर वह माधवकी स्तुति करने लगा।

ज्वर बोला— भक्तानुग्रहमूर्तिधारी भगवन्! आप सबके आत्मा और पूर्णपुरुष हैं; सबपर आपका समान प्रेम है, अतः जगन्नाथ! मेरे प्राणोंकी रक्षा कीजिये।

उस ज्वरके विनीत वचनको सुनकर श्रीकृष्णने अपने वैष्णव-ज्वरको लौटा लिया। तब माहेश्वर-ज्वर भयभीत होकर रणभूमिसे भाग खड़ा हुआ।

तत्पश्चात् बाणने पुनः आकर ऐसे हजारों बाण चलाये, जो प्रलयकालीन अग्निकी ज्वालाके समान प्रकाशमान तथा मन्त्रोंद्वारा पावन किये गये थे; परंतु अर्जुनने खेल-ही-खेलमें अपने बाणसमूहोंद्वारा उन्हें रोक दिया। तब बाणने

७७६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

ग्रीष्मकालीन सूर्यके समान चमकीली शक्ति चलायी, किंतु महाबली अर्जुनने उसे भी अनायास ही काट गिराया। यह देखकर बाणने पाशुपतास्त्रको, जिसकी प्रभा सैकड़ों सूर्योंके समान थी और जो अत्यन्त भयंकर, अमोघ तथा विश्वका संहार करनेवाला था, हाथमें लिया। उसे देखकर चक्रपाणिने अपने भयंकर सुदर्शनचक्रको चला दिया। उस चक्रने रणभूमिमें बाणके हजारों हाथोंको काट डाला और वह भयंकर पाशुपतास्त्र पहाड़ी सिंहकी तरह भूमिपर गिर पड़ा। तदनन्तर जो प्रलयकालीन अग्निकी शिखाके समान प्रकाशमान, लोकमें दारुण तथा अमोघ है; वह पाशुपतास्त्र पशुपति शिवके हाथमें लौट गया। बाणके शरीर-रक्तसे वहाँ भयंकर नदी बह चली और बाण चेष्टारहित होकर भूमिपर गिर पड़ा। उस समय व्यथाके कारण उसकी चेतना नष्ट हो गयी थी। तब जगद्गुरु भगवान् महादेव वहाँ आये और बाणको उठाकर उन्होंने अपनी छातीसे लगा लिया। फिर बाणको लेकर वे वहाँ चले, जहाँ भगवान् जनार्दन विराजमान थे। वहाँ पहुँचकर

उन्होंने पद्माद्वारा समर्चित श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें बाणको समर्पित कर दिया। तत्पश्चात् बलिने जिस वेदोक्त स्तोत्रद्वारा उनकी स्तुति की थी, उसी स्तोत्रद्वारा चन्द्रशेखरने शक्तियोंके स्वामी जगदीश्वर श्रीकृष्णका स्तवन किया। तब श्रीहरिने बुद्धिमान् बाणको 'मृत्युञ्जय' नामक ज्ञान प्रदान किया और उसके शरीरपर अपना कर-कमल फिराकर उसे अजर-अमर बना दिया।

तदनन्तर बाणने बलिकृत स्तोत्रद्वारा भक्तिपूर्वक श्रीहरिका स्तवन किया और उसी देवसमाजमें रत्ननिर्मित आभूषणोंसे विभूषित अपनी श्रेष्ठ कन्या उषाको लाकर भक्तिसहित श्रीकृष्णको प्रदान कर दिया। फिर उसने भक्तिपूर्वक कंधे झुकाकर पाँच लाख गजराज, बीस लाख घोड़े, रत्नाभरणोंसे विभूषित एक हजार दासियाँ, सब कुछ प्रदान करनेवाली बछड़ोंसहित एक सहस्र गौएँ, करोड़ों-करोड़ों मनोहर माणिक्य, मोती, रत्न, श्रेष्ठ मणियाँ और हीरे तथा हजारों सुवर्णनिर्मित जलपात्र एवं भोजनपात्र श्रीकृष्णको दहेजमें दिये। नारद! फिर बाणने शंकरजीकी आज्ञासे सभी तरहके अग्निशुद्ध श्रेष्ठ महीन वस्त्र तथा ताम्बूल और उसकी सामग्रियोंके विविध प्रकारके हजारों श्रेष्ठ पूर्णपात्र भक्तिपूर्ण हृदयसे दहेजमें दिये। तत्पश्चात् कन्याको भी श्रीहरिके चरणकमलोंमें समर्पित करके वह ढाह मारकर रो पड़ा। इस प्रकार उसने वह कार्य सम्पन्न किया। तब श्रीकृष्ण बाणको वेदोक्त मधुर वचनोंद्वारा वरदान देकर शंकरजीकी अनुमतिसे द्वारकापुरीको प्रस्थित हुए। वहाँ पहुँचकर स्वयं श्रीहरिने महात्मा बाणकी उस कन्याको नवोढ़ा (नवविवाहिता वधू) समझकर शीघ्र ही देवकी और रुक्मिणीके हाथों सौंप दिया; फिर यत्नपूर्वक मङ्गल-महोत्सव कराया, ब्राह्मणोंको भोजन कराया और उन्हें बहुत-सा धन-दान किया।

(अध्याय १२०)

९५- वसुदेवजीका शंकरजीसे भव-तरणका उपाय पूछना, शंकरजीका उन्हें ज्ञानोपदेश देकर राजसूय-यज्ञ करनेका आदेश देना, वसुदेवजीद्वारा राजसूय-यज्ञका अनुष्ठान और यज्ञान्तमें सर्वस्व दक्षिणामें देकर उनका द्वारकाको लौटना

श्रीकृष्णजन्मखण्ड

७७७


शृगालोपाख्यान

श्रीनारायण कहते हैं— नारद! एक समयकी बात है। श्रीकृष्ण अपने गणोंके साथ सुधर्मा-सभामें विराजमान थे। उसी समय वहाँ एक ब्राह्मणदेवता आये, जो ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित हो रहे थे। वहाँ आकर उन्होंने पुरुषोत्तम श्रीकृष्णका दर्शन किया और भक्तिपूर्वक उनकी स्तुति की। फिर वे शान्त एवं भयभीत हो विनयपूर्वक मधुर वचन बोले।

ब्राह्मणने कहा— प्रभो! वासुदेव शृगाल नामक एक मण्डलेश्वर राजाधिराज है; वह आपकी अत्यन्त निन्दा करता है और कहता है कि 'वैकुण्ठमें चतुर्भुज देवाधिदेव लक्ष्मीपति वासुदेव मैं ही हूँ। मैं ही लोकोंका विधाता और ब्रह्माका पालक हूँ। पृथ्वीका भार उतारनेके लिये ब्रह्माने मेरी प्रार्थना की थी; इसी कारण भारतवर्षमें मेरा आगमन हुआ है। मैंने महाबली दैत्यराज हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष, मधु और कैटभको मारकर सृष्टिकी रक्षा की है। मैं ही स्वयं ब्रह्मा, मैं ही स्वयं शिव तथा मैं ही लोकोंका पालक एवं दुष्टोंका संहारक विष्णु हूँ। सभी मनुगण तथा मुनिसमुदाय मेरे अंशकलासे उत्पन्न हुए हैं। मैं स्वयं प्रकृतिसे परे निर्गुण नारायण हूँ। भद्र! अबतक मैंने तुम्हें लज्जा तथा कृपाके कारण मित्र-बुद्धिसे क्षमा कर दिया था; किंतु जो बीत गया, सो बीत गया; अब तुम मेरे साथ युद्ध करो। मैंने दूतके मुखसे सुना है कि तुम्हारा अहंकार बहुत बढ़ गया है; अतः उसका दमन करना उचित है। ऊँचे सिर उठानेवालोंको कुचल डालना राजाका परम धर्म है और इस समय मैं ही पृथ्वीका शासक हूँ। मैं स्वयं चतुर्भुजरूप धारण करके शङ्ख-चक्र-गदा-पद्म लेकर सेनासहित युद्धके लिये उस द्वारकाको जाऊँगा। यदि तुम्हारी इच्छा हो तो युद्ध करो; अन्यथा मेरी शरण ग्रहण करो। यदि तुम शरणागत होकर मेरी शरणमें नहीं आ जाओगे तो मैं क्षणभरमें ही द्वारकाको भस्म कर डालूँगा। मैं अकेला ही लीलापूर्वक क्षणभरमें सेना, पुत्र, गण और बन्धु-बान्धवोंसहित तुम्हें जला डालनेमें समर्थ हूँ।'

मनु! यों कहकर वह ब्राह्मण मौन हो गया। उसे सुनकर सदस्योंसहित श्रीकृष्ण ठठाकर हँस पड़े। फिर उन्होंने ब्राह्मणका भलीभाँति आदर-सत्कार करके उन्हें चारों प्रकारके पदार्थ (भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चोष्य) भोजन कराये। शृगालके वाग्बाण उनके मनमें कसक पैदा कर रहे थे; इसलिये बड़े क्षोभसे उन्होंने वह रात बितायी। प्रातःकाल होते ही वे बड़ी उतावलीके साथ हर्षपूर्वक गणोंसहित रथपर सवार हो सहसा वहाँ जा पहुँचे, जहाँ राजा शृगाल था। उनके आनेका समाचार सुनकर राजा शृगाल कृत्रिम-रूपसे चार भुजा धारण करके गणोंसहित युद्धके लिये श्रीहरिके स्थानपर आया। श्रीकृष्णने मित्र-बुद्धिसे उसकी ओर स्नेहभरी दृष्टिसे देखकर मुस्कराते हुए मधुर वचनोंद्वारा लौकिक रीतिसे उससे वार्तालाप किया। राजा शृगालने श्रीकृष्णको निमन्त्रित किया; परंतु उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया। तब वह श्रीकृष्णसे भयभीत हो उनके दर्शनसे दम्भको त्यागकर यों कहने लगा।

शृगाल बोला— प्रभो! आप चक्रद्वारा मेरा शिरश्छेदन करके शीघ्र ही द्वारकाको लौट जाइये, जिससे मेरा यह अनित्य एवं नश्वर पापी शरीर समाप्त हो जाय। भगवन्! जय-विजयकी तरह मैं भी आपका द्वारपाल हूँ। मेरा नाम सुभद्र है। लक्ष्मीके शापसे मैं भ्रष्ट हो गया था; अब मेरा वह समय पूरा हो गया है। सौ वर्षके बाद शापके समाप्त हो जानेपर मैं पुनः आपके भवनको जाऊँगा। सर्वज्ञ! आप तो सब कुछ जानते ही हैं;

पूछनेपर श्रीकृष्णद्वारा अपना तथा राधाका रहस्योद्घाटन

७७८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

अतः विलम्ब मत कीजिये।

श्रीकृष्णने कहा—मित्र! पहले तुम मुझपर प्रहार करो; तत्पश्चात् मैं युद्ध करूँगा। वत्स! मैं सारा रहस्य जानता हूँ; अतः अब तुम सुखपूर्वक वैकुण्ठको जाओ। तब शृगालने माधवपर दस बाणोंसे वार किया; किंतु वे कालरूपी बाण शीघ्र ही श्रीकृष्णको प्रणाम करके आकाशमें विलीन हो गये। फिर राजा शृगालने प्रलयकालीन अग्निकी शिखाके समान चमकीली गदा फेंकी, परंतु वह तत्काल ही श्रीकृष्णके अङ्गस्पर्शमात्रसे टूक-टूक हो गयी। तत्पश्चात् उसने परम दारुण कालरूपी खड्ग और धनुष चलाया, किंतु वह उसी क्षण श्रीकृष्णके अङ्गोंका स्पर्श होते ही छिन्न-भिन्न हो गया। इस प्रकार राजाको अस्त्रहीन देखकर कृपालु श्रीकृष्णने कहा—‘मित्र! घर जाकर खूब तीखा अस्त्र ले आओ।’

तब शृगाल बोला—प्रभो! आत्मारूपी आकाश अस्त्रद्वारा बेधा नहीं जा सकता। भला, आत्माके साथ युद्ध कैसा? पृथ्वीका उद्धार करनेमें कारणस्वरूप भगवन्! इस भवसागरसे मेरा उद्धार कीजिये। नाथ! भवसागर बड़ा भयंकर है और विषय-विषसे भी अधिक दारुण हैं; अतः मेरी स्वकर्मजनित माया-मोहरूपी साँकलको छिन्न-भिन्न कर दीजिये। आप कर्मोंके ईश्वर, ब्रह्माके भी विधाता, शुभ फलोंके दाता, समस्त सम्पत्तियोंके प्रदाता, प्राक्तन कर्मोंके कारण और उनके खण्डनमें समर्थ हैं। मैं अपने इस पाञ्चभौतिक प्राकृत नश्वर देहका त्याग करके आपके ही वैकुण्ठके सातवें द्वारपर जाऊँगा; क्योंकि वही मेरा घर है।

इस प्रकारका मित्रका स्तवन और अमृतोपम वचन सुनकर कृपानिधि श्रीकृष्ण कृपापरवश हो वहीं समरभूमिमें स्नेहवश रोने लगे। श्रीकृष्णके नेत्रोंसे गिरे हुए अश्रुबिन्दुओंसे वहाँ सहसा ‘बिन्दुसर’ नामक एक दिव्य सरोवर प्रकट हो गया; जो तीर्थोंमें परम श्रेष्ठ है। उसके जलके स्पर्शमात्रसे मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है और अपने सात जन्मोंके संचित पापोंसे छूट जाता है; इसमें जरा भी संदेह नहीं है।

इसके बाद श्रीभगवान्ने पूछा—मित्र! यदि तुम्हारा मन इतना निर्मल है तो फिर तुम्हारी ऐसी युद्ध-बुद्धि कैसे हुई और क्यों तुमने दूतके द्वारा ऐसा दारुण निष्ठुर संदेश कहलवाया?

इसपर शृगालने कहा—नाथ! मैंने तुम्हारे प्रति ऐसे निष्ठुर वाक्योंका प्रयोग किया, तभी तो तुम क्रोधपूर्वक यहाँ आये। नहीं तो, स्वप्नमें भी तुम्हारे दर्शन दुर्लभ हैं। यों कहते-कहते उसने योगावलम्बन करके प्राकृत पाञ्चभौतिक शरीरका त्याग कर दिया और वह श्रीकृष्णके देखते-देखते ही विमानपर सवार होकर दिव्य धामको चला गया। उस समय शृगालके शरीरसे सात ताड़-जितनी लंबी एक महान् ज्योति निकली और वह ब्रह्माजी तथा लक्ष्मीजीके द्वारा पूजित श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें प्रणाम करके चली गयी।

तब अपने साथियोंके सहित श्रीमान् कृष्ण इस अद्भुत चरित्रको देखकर प्रफुल्लमुख हो द्वारकाकी ओर चल दिये। द्वारका पहुँचकर उन्होंने पहले माता-पिताको प्रणाम किया। तदनन्तर रुक्मिणीके महलमें जाकर पुष्पशय्यापर शयन किया।

(अध्याय १२१)

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७७९

गणेशके अग्रपूज्यत्व-वर्णनके प्रसङ्गमें राधाद्वारा गणेशकी अग्रपूजाका कथन

नारदजीने पूछा— मुने! पुराणोंमें जो गणेश-पूजनका दुर्लभ आख्यान वर्णित है, उसे मैंने सामान्यतया ब्रह्माके मुखसे संक्षेपमें सुना है। अब आपसे समस्त पूजनीयोंमें प्रधान गणपतिकी महिमा विस्तारपूर्वक सुननेकी मेरी अभिलाषा है; क्योंकि आप योगीन्द्रोंके गुरुके भी गुरु हैं। पूर्वकालमें स्वर्गवासियोंने सिद्धाश्रममें राधा-माधवकी महापूजा की थी; उसी राधाने सौ वर्षके बीतनेपर जब श्रीदामाका शाप निवृत्त हुआ; तब ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि सुरेन्द्रों, नागराज शेष और अन्यान्य बड़े-बड़े नागों, भूतलपर बहुत-से बलशाली नरेशों और असुरों, अन्यान्य महाबली गन्धर्वों तथा राक्षसोंके रहते हुए सर्वप्रथम गणेशकी पूजा कैसे की? महाभाग! यह वृत्तान्त मुझसे विस्तारपूर्वक वर्णन करनेकी कृपा करें।

श्रीनारायण बोले— नारद! तीनों लोकोंमें पुण्यवती होनेके कारण पृथ्वी धन्य एवं मान्य है। उस पृथ्वीपर भारतवर्ष कर्मोंका शुभ फल देनेवाला है। उस पुण्यक्षेत्र भारतमें सिद्धाश्रम नामक एक महान् पुण्यमय शुभ क्षेत्र है; जो धन्य, यशस्य, पूज्य और मोक्ष-प्रदाता है। भगवान् सनत्कुमार वहीं सिद्ध हुए थे। स्वयं ब्रह्माने भी वहीं तपस्या करके सिद्धि प्राप्त की थी। योगीन्द्र, मुनीन्द्र, कपिल आदि सिद्धेन्द्र और शतक्रतु महेन्द्र वहीं तप करके सिद्धिके भागी हुए हैं। इसी कारण उसे सिद्धाश्रम कहते हैं। वह सभीके लिये दुर्लभ है। मुने! वहाँ गणेश नित्य निवास करते हैं। वहाँ गणेशकी अमूल्य रत्नोंकी बनी हुई एक सुन्दर प्रतिमा है; जिसकी वैशाखी पूर्णिमाके दिन सभी देवता, नाग, मनुष्य, दैत्य, गन्धर्व, राक्षस, सिद्धेन्द्र, मुनीन्द्र, योगीन्द्र और सनकादि महर्षि पूजा करते हैं। उस अवसरपर वहाँ पार्वतीके साथ कल्याणकारी शम्भु, गणोंसहित कार्तिकेय और स्वयं प्रजापति ब्रह्मा पधारे। प्रधान-प्रधान नागोंके साथ शेषनाग भी तुरंत ही वहाँ आ पहुँचे। फिर सभी देवता, मनु और मुनिगण भी वहाँ आये। सभी नरेश प्रसन्नमनसे गणेशकी पूजा करनेके लिये वहाँ उपस्थित हुए। द्वारकावासियोंके साथ भगवान् श्रीकृष्णका भी वहाँ शुभागमन हुआ तथा गोकुलवासियोंके साथ नन्द भी पधारे। तदनन्तर सुरसिका, रासेश्वरी और श्रीकृष्णके प्राणोंकी अधिदेवता सुन्दरी राधा भी सौ वर्ष व्यतीत हो जानेपर गोलोकवासिनी गोपी-सखियोंके साथ पधारीं। वहाँ सुन्दर दाँतोंवाली राधाने भलीभाँति स्नान करके शुद्ध हो धुली हुई साड़ी और कंचुकी धारण की। फिर भुवनपावनी कान्ता राधाने अपने चरणकमलोंका अच्छी तरह प्रक्षालन किया। तत्पश्चात् वे निराहार रहकर इन्द्रियोंको काबूमें करके मणिमण्डपमें गयीं। वहाँ उन्होंने श्रीकृष्ण-प्राप्तिकी कामनासे उत्तम संकल्पका विधान करके भक्तिपूर्वक गङ्गाजलसे गणेशको स्नान कराया। इसके बाद जो चारों वेदों, वसु और लोकोंकी माता, ज्ञानियोंकी परा जननी एवं बुद्धिरूपा हैं; वे भगवती राधा श्वेत पुष्प लेकर सामवेदोक्त प्रकारसे अपने पुत्रभूत गणेशका यों ध्यान करने लगीं।

‘जो खर्व (छोटे कदवाले), लम्बोदर (तोंदवाले), स्थूलकाय, ब्रह्मतेजसे उद्भासित, हाथीके-से मुखवाले, अग्निसरीखे कान्तिमान्, एकदन्त और असीम हैं; जो सिद्धों, योगियों और ज्ञानियोंके गुरु-के-गुरु हैं; ब्रह्मा, शिव और शेष आदि देवेन्द्र, मुनीन्द्र, सिद्धेन्द्र, मुनिगण तथा संतलोग जिनका ध्यान करते हैं; जो ऐश्वर्यशाली, सनातन, ब्रह्मस्वरूप, परम मङ्गल, मङ्गलके स्थान, सम्पूर्ण विघ्नोंको हरनेवाले, शान्त, सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके दाता, कर्मयोगियोंके लिये भवसागरमें मायारूपी जहाजके कर्णधारस्वरूप शरणागत-दीन-दुःखीकी रक्षामें तत्पर, ध्यानरूप साधना

७८०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

करनेयोग्य, भक्तोंके स्वामी और भक्तवत्सल हैं; उन गणेशका ध्यान करना चाहिये।'

इस प्रकार ध्यान करके सती राधाने उस पुष्पको अपने मस्तकपर रखकर पुनः सर्वाङ्गोंको शुद्ध करनेवाला वेदोक्त न्यास किया। तत्पश्चात् उसी शुभदायक ध्यानद्वारा पुनः ध्यान करके राधाने उन लम्बोदरके चरणकमलमें पुष्पाञ्जलि समर्पित की। फिर गोलोकवासिनी स्वयं श्रीराधिकाजीने सुगन्धित सुशीतल तीर्थजल, दूर्वा, चावल, श्वेत पुष्प, सुगन्धित चन्दनयुक्त अर्घ्य, पारिजात-पुष्पोंकी माला, कस्तूरी-केसरयुक्त चन्दन, सुगन्धित शुक्ल पुष्प, सुगन्धयुक्त उत्तम धूप,घृत-दीपक, सुस्वादु रमणीय नैवेद्य, चतुर्विध अन्न, सुपक्व, फल, भाँति-भाँतिके लड्डू, रमणीय सुस्वादु पिष्टक, विविध प्रकारके व्यञ्जन, अमूल्य रत्ननिर्मित सिंहासन, सुन्दर दो वस्त्र, मधुपर्क, सुवासित सुशीतल पवित्र तीर्थजल, ताम्बूल, अमूल्य श्वेत चँवर, मणि-मुक्ता-हीरासे सुसज्जित सुन्दर सूक्ष्मवस्त्रद्वारा सुशोभित शय्या, सवत्सा कामधेनु गौ और पुष्पाञ्जलि अर्पण करके अत्यन्त श्रद्धाके साथ षोडशोपचार समर्पित किया। फिर कालिन्दीकुलवासिनी राधाने 'ॐ गं गौं गणपतये विघ्नविनाशिने स्वाहा' गणेशके इस षोडशाक्षर-मन्त्रका, जो श्रेष्ठ कल्पतरुके समान है, एक हजार जप किया। इसके बाद वे भक्तिवश कंधा नीचा करके नेत्रोंमें आँसू भरकर पुलकित शरीरसे परम भक्तिके साथ इस स्तोत्रद्वारा स्तवन करने लगीं।

श्रीराधिकाने कहा—जो परम धाम, परब्रह्म, परेश, परमेश्वर, विघ्नोंके विनाशक, शान्त, पुष्ट, मनोहर और अनन्त हैं; प्रधान-प्रधान सुर और असुर जिनका स्तवन करते हैं; जो देवरूपी कमलके लिये सूर्य और मङ्गलोंके आश्रय-स्थान हैं; उन परात्पर गणेशकी मैं स्तुति करती हूँ। यह उत्तम स्तोत्र महान् पुण्यमय तथा विघ्न और शोकको हरनेवाला है। जो प्रातःकाल उठकर इसका पाठ करता है, वह सम्पूर्ण विघ्नोंसे विमुक्त हो जाता है। (अध्याय १२२)


गणेशकृत राधा-प्रशंसा, पार्वती-राधा-सम्भाषण, पार्वतीके आदेशसे सखियोंद्वारा राधाका श्रृङ्गार और उनकी विचित्र झाँकी; ब्रह्मा, शिव, अनन्त आदिके द्वारा राधाकी स्तुति

श्रीनारायण कहते हैं—नारद! सती राधाने गणेशकी विधिपूर्वक भलीभाँति पूजा करके स्तुति की और सर्वाङ्गोंमें पहनने योग्य बहुमूल्य रत्नोंके बने हुए आभूषण प्रदान किये। राधाद्वारा किये गये पूजन और पूजा-सामग्रीको देखकर तथा स्तवन सुनकर शान्तस्वरूप गणेश शान्तस्वभाववाली त्रिलोकजननी राधासे मधुर वचन बोले।

श्रीगणेशने कहा—जगन्मातः! तुम्हारी यह

९७- श्रीकृष्णका राधाके साथ विभिन्न स्थलोंमें विहार करके पुनः गोकुलमें जाना, वहाँ उनका स्वागत-सत्कार, यशोदाका राधासहित श्रीकृष्णको महलमें ले जाना और मङ्गल-महोत्सव करना

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७८१

पूजा लोगोंको शिक्षा देनेके लिये है। शुभे! तुम तो स्वयं ब्रह्मस्वरूपा और श्रीकृष्णके वक्षः-स्थलपर वास करनेवाली हो। ब्रह्मा, शिव और शेष आदि देवगण, सनकादि मुनिवर, जीवन्मुक्त भक्त और कपिल आदि सिद्धशिरोमणि, जिनके अनुपम एवं परम दुर्लभ चरणकमलका निरन्तर ध्यान करते हैं, उन श्रीकृष्णके प्राणोंकी तुम अधिदेवी तथा उनके लिये प्राणोंसे भी बढ़कर परम प्रियतमा हो। श्रीकृष्णके दक्षिणाङ्गसे माधव हैं और वामाङ्गसे राधा प्रादुर्भूत हुई हैं। जगज्जननी महालक्ष्मी तुम्हारे वामाङ्गसे प्रकट हुई हैं। तुम सबके निवासभूत वसुको जन्म देनेवाली, परमेश्वरी, वेदों और लोकोंकी ईश्वरी मूलप्रकृति हो। मातः! इस सृष्टिमें जितनी प्राकृतिक नारियाँ हैं; वे सभी तुम्हारी विभूतियाँ हैं। सारे विश्व कार्यरूप हैं और तुम उनकी कारणरूपा हो। प्रलयकालमें जब ब्रह्माका तिरोभाव हो जाता है; वह श्रीहरिका एक निमेष कहलाता है। उस समय जो बुद्धिमान् योगी पहले राधा, फिर परात्पर कृष्ण अर्थात् राधा-कृष्णका सम्यक् उच्चारण करता है; वह अनायास ही गोलोकमें चला जाता है। इससे व्यतिक्रम करनेपर वह महापापी निश्चय ही ब्रह्महत्याके पापका भागी होता है। तुम लोकोंकी माता और परमात्मा श्रीहरि पिता हैं; परंतु माता पितासे भी बढ़कर श्रेष्ठ, पूज्य, वन्दनीय और परात्पर होती है। इस पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें यदि कोई मन्दमति पुरुष सबके कारणस्वरूप श्रीकृष्ण अथवा किसी अन्य देवताका भजन करता है और राधिकाकी निन्दा करता है तो वह इस लोकमें दुःख-शोकका भागी होता है और उसका वंशच्छेद हो जाता है तथा परलोकमें सूर्य और चन्द्रमाकी स्थितिपर्यन्त वह घोर नरकमें पचता रहता है। ज्ञानका उद्गीरण करने अर्थात् उगलनेके कारण गुरु कहा जाता है; वह ज्ञान मन्त्र-तन्त्रसे प्राप्त होता है; वह मन्त्र और वह तन्त्र तुम दोनोंकी भक्ति है। जब जीव प्रत्येक जन्ममें देवोंके मन्त्रका सेवन करता है तो उसे दुर्गाके परम दुर्लभ चरणकमलमें भक्ति प्राप्त हो जाती है। जब वह लोकोंके कारणस्वरूप शम्भुके मन्त्रका आश्रय ग्रहण करता है, तब तुम दोनों (राधा-कृष्ण)-के अत्यन्त दुर्लभ चरणकमलको प्राप्त कर लेता है। जिस पुण्यवान् पुरुषको तुम दोनोंके दुष्प्राप्य चरणकमलकी प्राप्ति हो जाती है, वह दैववश क्षणार्थ अथवा उसके षोडशांश कालके लिये भी उसका त्याग नहीं करता। जो मानव इस पुण्यक्षेत्र भारतमें किसी वैष्णवसे तुम दोनोंके मन्त्र, स्तोत्र अथवा कर्ममूलका उच्छेद करनेवाले कवचको ग्रहण करके परमभक्तिके साथ उसका जप करता है; वह अपने साथ-साथ अपनी सहस्रों पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। जो मनुष्य विधिपूर्वक वस्त्र, अलंकार और चन्दनद्वारा गुरुका भलीभाँति पूजन करके तुम्हारे कवचको धारण करता है, वह निश्चय ही विष्णु-तुल्य हो जाता है। मात्रः! तुमने जो कुछ वस्तु मुझे समर्पित की है, उस सबको सार्थक कर डालो अर्थात् अब मेरी प्रसन्नताके लिये उसे ब्राह्मणको दे दो। तब मैं उसका भोग लगाऊँगा; क्योंकि देवताको देने योग्य जो दान अथवा दक्षिणा होती है, वह सब यदि ब्राह्मणको दे दी जाय तो वह अनन्त हो जाती है। राधे! ब्राह्मणोंका मुख ही देवताओंका प्रधान मुख है; क्योंकि ब्राह्मण जिस पदार्थको खाते हैं, वही देवताओंको मिलता है*। मुने! तब सती राधिकाने वह सारा पदार्थ ब्राह्मणोंको खिला दिया; इससे गणेश तत्काल ही प्रसन्न हो गये।


* ब्राह्मणानां मुखं राधे देवानां मुखमुख्यकम्। विप्रभुक्तं च यद् द्रव्यं प्राप्नुवन्त्येव देवताः॥
(१२२।२३)

९८- श्रीकृष्णद्वारा नन्दको ज्ञानोपदेश और राधा-कलावती आदि गोपियोंका गोलोक-गमन

७८२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

इसी समय ब्रह्मा, शिव और शेषनाग आदि देवता देवश्रेष्ठ गणेशका पूजन करनेके लिये उस वट-वृक्षके नीचे आये। तब एक शिवदूत वहाँ जाकर उन देवताओं तथा देवियोंसे यों कहने लगा।

रक्षक (शिवदूत)-ने कहा— देवगण! वृषभानुसुता राधाने मुझे हटाकर शुभ मुहूर्तमें स्वस्तिवाचन करके सर्वप्रथम गणेशकी पूजा की है। पूजनमें ऐसा कहा जाता है कि जो सर्वप्रथम पूजन करता है, वह अनन्त फलका भागी होता है और मध्यमें पूजा करनेवालेको मध्यम तथा अन्तमें पूजनेवालेको स्वल्प पुण्य प्राप्त होता है। ऐसा दशामें बहुत-से देवशिरोमणियों, मुनिवरों और देवाङ्गनाओंके रहते हुए उस राधाने गोपियोंके साथ देवश्रेष्ठ गणेशकी पूजा की है।

दूतकी बात सुनकर सभी देवताओं, मुनियों मनुओं और राजाओंका समुदाय तथा देवाङ्गनाएँ हँसने लगीं। वहाँ जो रुक्मिणी आदि महिलाएँ तथा देवियाँ थीं, उन्हें महान् विस्मय हुआ। तत्पश्चात् सावित्री, सरस्वती, परमेश्वरी पार्वती, रोहिणी, सती-संज्ञक स्वाहा आदि देवाङ्गनाएँ तथा सभी पतिव्रता मुनिपत्नियां वहाँ आयीं। फिर सभी देवताओं, मुनियों, मनुओं तथा मनुष्योंका दल, गणसहित श्रीकृष्ण तथा अन्याय जो वहाँ उपस्थित थे, उन सभी लोगोंने हर्षपूर्वक पदार्पण किया। तत्पश्चात् उन सबने शुभ मुहूर्तमें बलवान् और दुर्बलके क्रमसे पृथक्-पृथक् विविध द्रव्योंद्वारा गणेशकी पूजा की। इस प्रकार पूजन करके वे सभी सुखासनपर विराजमान हुए। इसी समय पार्वती परम हर्षके साथ राधाके स्थानपर गयीं। पार्वतीको आयी हुई देखकर राधा उतावलीके साथ अपने आसनसे उठ खड़ी हुईं और हर्षमग्न हो उनसे सादर यथायोग्य कुशल-समाचार पूछने लगीं। तत्पश्चात् परस्पर आलिङ्गन और स्नेह-प्रदर्शन किया गया। तब दुर्गा राधाको अपनी छातीसे लगाकर मधुर वचन बोलीं।

पार्वतीने कहा— राधे! मैं तुमसे क्या कुशल-प्रश्न करूँ; क्योंकि तुम तो स्वयं ही मङ्गलोंकी आश्रय-स्थान हो। श्रीदामाके शापसे मुक्त हो जानेपर अब तुम्हारी विरहज्वाला भी शान्त ही हो गयी। जैसे मेरे मन-प्राण तुममें वास करते हैं; वैसे ही तुम्हारे मुझमें लगे रहते हैं। इस प्रकार शक्ति और पुरुषकी भाँति हम दोनोंमें कोई भेद नहीं है। जो मेरे भक्त होकर तुम्हारी और तुम्हारे भक्त होकर मेरी निन्दा करते हैं; वे चन्द्रमा और सूर्यके स्थितिकालपर्यन्त कुम्भीपाकमें पचते रहते हैं। जो नराधम राधा और माधवमें भेद-भाव करते हैं, उनका वंश नष्ट हो जाता है और वे चिरकालतक नरकमें यातना भोगते हैं*। इसके बाद साठ हजार वर्षोंतक वे विष्ठाके कीड़े होते हैं, फिर अपनी सौ पीढ़ियोंसहित सूकरकी योनिमें उत्पन्न होते हैं। सर्वपूज्य पुत्र गणेश्वरकी तुमने ही सर्वप्रथम पूजा की है; मैं वैसा नहीं कर पायी हूँ। यह गणेश जैसे तुम्हारा है, वैसे ही मेरा भी है। देवि! दुग्ध और उसकी धवलताके समान राधा और माधवमें जीवनपर्यन्त कभी विच्छेद नहीं होगा। पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें स्थित इस महातीर्थ सिद्धाश्रममें विघ्नविनाशक गणेशकी भलीभाँति पूजा करके तुम बिना किसी विघ्न-बाधाके गोविन्दको प्राप्त करो। तुम रसिका-रासेश्वरी हो और श्रीकृष्ण रसिकशिरोमणि हैं; अतः तुम नायिकाका रसिक नायकके साथ समागम गुणकारी होगा। सती राधे! सौ वर्षके बाद तुम श्रीदामाके शापसे मुक्त


* ये त्वां निन्दन्ति मद्भक्तास्त्वद्भक्ताश्चापि मामपि। कुम्भीपाके च पच्यन्ते यावच्चन्द्रदिवाकरौ॥
राधामधवयोर्भेदं ये कुर्वन्ति नराधमाः। वंशहानिर्भवेत्तेषां पच्यन्ते नरके चिरम्॥
(१२२। ४४-४५)

९९- श्रीकृष्णके गोलोक-गमनका वर्णन

श्रीकृष्णजन्मखण्ड

७८३

हुई हो; अतः आज मेरे वरदानसे तुम श्रीकृष्णके साथ मिलो! सुन्दरि! मेरी दुर्लभ आज्ञा मानकर तुम अपना उत्तम शृङ्गार करो।

तब पार्वतीकी आज्ञासे प्यारी सखियाँ राधाका शृङ्गार करनेमें जुट गयीं। उन्होंने ईश्वरी राधाको रमणीय रत्नसिंहासनपर बैठाया। फिर तो सखी रत्नमालाने सामनेसे आकर राधाके गलेमें रत्नोंकी माला पहना दी और उनके दाहिने हाथमें मनोहर क्रीड़ा-कमल रख दिया। पद्ममुखीने उनके दोनों चरणकमलोंको महावरसे सुशोभित किया। सुन्दरी गोपीने चन्दनयुक्त सिन्दूरकी परम रुचिर बेंदीसे सीमन्तके अधोभाग—ललाटको सुशोभित किया। सती मालतीने मालतीकी मालाओंसे विभूषित करके ऐसी मनभावनी रमणीय कबरी गूँथकर तैयार की जो मुनियोंके भी मनको मोहे लेती थी। फिर कपोलोंपर कस्तूरी और कुंकुममिश्रित चन्दनसे सुन्दर पत्रभङ्गीकी रचना की। मालावतीने राधाको सुन्दर चम्पाके पुष्पोंकी मनोहर गन्धवाली माला और खिली हुई नवमल्लिका प्रदान की। रति-कार्योंमें रसका ज्ञान रखनेवाली गोपीने परम श्रेष्ठ नायिका राधाको रत्नाभरणोंसे विभूषित करके रति-रसके लिये उत्सुक बनाया। सती ललिताने उनके शरत्कालीन कमल-दलके समान विशाल नेत्रोंको काजलसे आँजकर सुहावनी साड़ी पहननेको दी और महेन्द्रद्वारा दिये गये पारिजातके सुगन्धित पुष्पको उनके हाथमें दिया। सती गोपिका सुशीलाने पतिके पास जाकर किस प्रकार सुशील एवं मधुर यथोचित वचन कहना चाहिये—ऐसी नीतियुक्त शिक्षा दी। राधाकी माता कलावतीने विपत्तिकालमें विस्मृत हुई स्त्रियोंकी षोडश कलाओंका स्मरण कराया। बहिन सुधामूखीने शृङ्गार-विषयसम्बन्धी अमृतोपम वचनकी ओर ध्यान आकर्षित किया। कमलाने शीघ्र ही कमल और चम्पाके चन्दनचर्चित पत्तेपर कोमल रति-शय्या सजायी। स्वयं सती चम्पावतीने चम्पाके सुन्दर पुष्पको चन्दनसे अनुलिप्त करके श्रीकृष्णके लिये दोनेमें सजाकर रखा। फिर उसने श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये केलि-कदम्बोंका पुष्प, मनोहर स्तवक (गुलदस्ता) और कदम्ब-पुष्पोंकी माला तैयार की। कृष्णप्रियाने श्रीकृष्णके लिये कपूर आदिसे सुवासित श्रेष्ठ एवं रुचिर पान तथा सुगन्धित जल उपस्थित किया। इसी समय देवताओं तथा मुनियोंने देखा कि जल-स्थलसहित सारा आश्रम गोरोचनके समान उद्भासित हो रहा है। उस समय तीनों लोकोंमें वास करनेवाले सभी लोगोंने राधिकाके दर्शन किये।

जिनके शरीरकी कान्ति श्वेत चम्पकके समान परम मनोहर एवं अनुपम है; जो ऊर्ध्वरेता मुनियोंके भी मनोंको मोहमें डाल देती हैं; जो सुन्दर केशोंवाली, सुन्दरी, षोडशवर्षीया और वटवृक्षके नीचे मण्डलमें वास करनेवाली हैं; जिनका मुख करोड़ों चन्द्रमाओंकी छबिको छीने लेता है; जो सदा मुस्कराती रहती हैं, जिनके दाँत बड़े सुन्दर हैं; जिनके शरत्कालीन कमलके समान विशाल नेत्र कज्जलसे सुशोभित रहते हैं; जो महालक्ष्मी, बीजरूपा, परमाद्या, सनातनी और परमात्मस्वरूप श्रीकृष्णके प्राणोंकी अधिष्ठातृदेवता हैं; परमात्माकी प्राप्तिके लिये जिनकी स्तुति-पूजा की जाती है; जो परा, ब्रह्मस्वरूपा निर्लिप्ता, नित्यरूपा, निर्गुणा, विश्वके अनुरोधसे प्रकृति, भक्तानुग्रहमूर्ति, सत्यस्वरूपा, शुद्ध, पवित्र, पतित-पावनी, उत्तम तीर्थोंको पावन करनेवाली, सत्कीर्तिसम्पन्ना, ब्रह्माकी भी विधाती, महाप्रिया, महती, महाविष्णुकी माता, रासेश्वरकी स्वामिनी, सुन्दरी नायिका, रसिकेश्वरी, अग्निशुद्ध वस्त्र धारण करनेवाली, स्वेच्छारूपा और मङ्गलकी आलय हैं; सात गोपियाँ श्वेत चँवर डुलाकर जिनकी निरन्तर सेवा करती रहती हैं, चार प्यारी सखियाँ जिनके चरणकमलकी सेवामें तत्पर रहती हैं, अमूल्य रत्नोंके बने हुए आभूषण जिनकी

७८४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

शोभा बढ़ा रहे हैं, दोनों मनोहर कुण्डलोंसे जिनके कर्ण और कपोल उद्भासित हो रहे हैं और जिनकी सुन्दर नासिकामें गजमुक्ता लटक रही है, जो गरुड़की चोंचका उपहास करनेवाली है; जिनका शरीर कुंकुम-कस्तूरीमिश्रित सुस्निग्ध चन्दनसे चर्चित है, जिनके कपोल सुन्दर और अङ्ग कोमल हैं; जो कामुकी, गजराजकी-सी चालवाली, कमनीया एवं सुन्दरी नायिका, कामदेवके अस्त्रकी विजयस्वरूपा, कामकी कामनाका लय करनेवाली तथा श्रेष्ठ हैं; जिनके हाथमें प्रफुल्ल क्रीड़ा-कमल, पारिजातका पुष्प और अमूल्य रत्नजटित स्वच्छ दर्पण शोभा पाते हैं; जो नाना प्रकारके रत्नोंकी विचित्रतासे युक्त रत्नसिंहासनपर विराजमान होती हैं, जो परमात्मा श्रीकृष्णके पद्माद्वारा समर्चित मङ्गलस्वरूप चरणकमलका अपने हृदयकमलमें ध्यान करती रहती हैं तथा मन-वचन-कर्मसे स्वप्न अथवा जाग्रत् कालमें श्रीकृष्णकी प्रीति और प्रेम-सौभाग्यका नित्य नूतन रूपमें स्मरण करती रहती हैं; जो प्रगाढ़भावानुरक्त, शुद्धभक्त, पतिव्रता, धन्या, मान्या, गौरवार्णा, निरन्तर श्रीकृष्णके वक्षःस्थलपर वास करनेवाली, प्रियाओं तथा प्रिय भक्तोंमें परम प्रिय, प्रियवादिनी, श्रीकृष्णके वामाङ्गसे आविर्भूत, गुण और रूपमें अभिन्न, गोलोकमें वास करनेवाली, देवाधिदेवी, सबके ऊपर विराजमान, गोपीश्वरी, गुप्तिरूपा, सिद्धिदा, सिद्धिरूपिणी, ध्यानद्वारा असाध्य, दुराराध्य, सद्‍भक्तोंद्वारा वन्दित और पुण्यक्षेत्र भारतमें वृषभानु-नन्दिनीके रूपमें प्रकट हुई हैं; उन राधाकी मैं वन्दना करता हूँ। जो ध्यानपरायण मानव समाधि-अवस्थामें ध्याननिष्ठ हो राधाका ध्यान करते हैं; वे इस लोकमें तो जीवन्मुक्त हैं ही, परलोकमें श्रीकृष्णके पार्षद होते हैं। तदनन्तर लोकोंके विधाता स्वयं ब्रह्माने ब्रह्माओंकी जननी परमेश्वरी राधाको देखकर सर्वप्रथम स्तुति करना आरम्भ किया।

ब्रह्मा बोले—परमेश्वरि! मेरा चित्त तुम्हारे पादपद्मके मधुर मधुमें लुब्ध हो गया था; अतः उस मधुव्रतके लोभसे प्रेरित होकर मैंने पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें स्थित पुष्करतीर्थमें जाकर साठ हजार दिव्य वर्षोंतक तपस्या की; तथापि तुम्हारा अभीष्ट चरणकमल मुझे प्राप्त नहीं हुआ। यहाँतक कि मुझे स्वप्नमें भी उसका दर्शन नहीं हुआ। तब उस समय यों आकाशवाणी हुई—'ब्रह्मन्! वाराहकल्पमें भारतवर्षमें वृन्दावन नामक पुण्यवनमें स्थित 'सिद्धाश्रम' में तुम्हें गणेशके चरणकमलका दर्शन होगा। तुम तो विषयी हो, अतः तुम्हें राधा-माधवकी दासता कहाँसे प्राप्त होगी? इसलिये महाभाग! तुम उससे निवृत्त हो जाओ; क्योंकि वह परम दुर्लभ है।' यों सुनकर मेरा मन टूट गया और मैं उस तपस्यासे विरत हो गया। पर उस तपस्याके फलस्वरूप मेरा वह मनोरथ आज परिपूर्ण हो गया।

श्रीमहादेवजीने कहा—देवि! ब्रह्मा आदि देवता, मुनिगण, मनु, सिद्ध, संत और योगीलोग ध्याननिष्ठ हो जिनके चरणकमलका, जो पद्माद्वारा कमल-पुष्पोंसे समर्चित एवं अत्यन्त दुर्लभ है, निरन्तर ध्यान करते रहते हैं; परंतु स्वप्नमें भी उसका दर्शन नहीं कर पाते, तुम उन्हींके वक्षः-स्थलपर वास करनेवाली हो।

अनन्त बोले—सुव्रते! वेद, वेदमाता, पुराण, मैं (शेषनाग), सरस्वती और संतगण तुम्हारी स्तुति करनेमें समर्थ नहीं हैं।

नारद! इस प्रकार वहाँ जितने देव, देवी तथा अन्यान्य मुनि,मनु आदि आये थे, उन सबने विनम्रभावसे राधाका स्तवन किया। यह देखकर रुक्मिणी आदि महिलाओंका मुख लज्जासे झुक गया। उन्होंने अपने शोकोच्छ्वाससे रत्नदर्पणको मलिन कर दिया। निराहारा कृशोदरी सत्यभामा तो मृतक-तुल्य हो गयी, उसके मनका सारा गर्व गल गया।

(अध्याय १२३)


श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७८५

वसुदेवजीका शंकरजीसे भव-तरणका उपाय पूछना, शंकरजीका उन्हें ज्ञानोपदेश देकर राजसूय-यज्ञ करनेका आदेश देना, वसुदेवजीद्वारा राजसूय-यज्ञका अनुष्ठान और यज्ञान्तमें सर्वस्व दक्षिणामें देकर उनका द्वारकाको लौटना

नारदजीने पूछा—विभो! गणेशपूजन और राधास्तोत्रसे बढ़कर वहाँ कौन-सी रहस्यमयी घटना घटित हुई; उसका मुझसे विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये।

श्रीभगवान् बोले—नारद! गणेशपूजन-तीर्थमें जितने देवता, मुनि और योगीन्द्र पधारे हुए थे; वे सभी वटवृक्षके नीचे समासीन थे। उनमेंसे शम्भु, ब्रह्मा, शेषनाग और श्रेष्ठ मुनियोंसे वसुदेव और देवकीने परमादरपूर्वक यों प्रश्न किया—'हे महाभाग! आपलोग दीनोंके बन्धु हैं; अतः शीघ्र ही बताइये कि हम दीनोंके लिये इस भवसागरसे पार करनेवाला कौन-सा उत्तम साधन है? आपलोग भवसागरसे पार करनेवाली नौकाके नाविक हैं; क्योंकि न तो तीर्थ ही केवल जलमय हैं और न देवगण ही केवल मिट्टी और पत्थरकी मूर्तिमात्र होते हैं। जितने यज्ञ, पुण्य, व्रत-उपवास, तप, अनेकविध दान, विप्रों और देवताओंकी अर्चनाएँ हैं; ये सभी चिरकालमें कर्ताको पावन बनाती हैं; परंतु वैष्णवजन दर्शनसे ही पवित्र कर देते हैं। विष्णुभक्त संतोंके पावन चरणकमलोंकी रजके स्पर्शमात्रसे वसुन्धरा तत्काल ही पावन हो जाती है और तीर्थ, समुद्र तथा पर्वत भी पवित्र हो जाते हैं। देवगण भी उन वैष्णवोंके पातकरूपी ईंधनका विनाश कर देनेवाले दर्शनकी अभिलाषा करते हैं। जैसे दूध, दही और रस परम स्वादिष्ट होते हैं; उसी प्रकार ज्ञान परमानन्ददायक होता है। उस ज्ञानको जो ज्ञानीके साहचर्यसे नहीं समझ पाता, वह अज्ञानी है। ज्ञानियोंके गुरुके भी गुरु भगवन्! जैसे मैं श्रीकृष्णका पिता और चिरकालका सङ्गी हूँ; उसी तरह देवकी भी उनकी माता है। वसुदेवजीकी बात सुनकर स्वयं भगवान् शंकर, जो चारों वेदोंके भी जनक एवं गुरु हैं, हँस पड़े और इस प्रकार बोले।'

श्रीमहादेवजीने कहा—अहो! ज्ञानियोंके संनिकट रहना भी उनके अनादरका ही कारण होता है; जैसे गङ्गाके जलसे पवित्र हुए लोग भी (गङ्गाका अनादर करके) सिद्धिके लिये अन्य तीर्थोंमें जाते हैं। वासुदेवके पिता ये वसुदेव स्वयं पण्डित हैं और अपने पिता वसुस्वरूप ज्ञानी कश्यपके अंशसे उत्पन्न हुए हैं। इनकी श्रीकृष्णमें पुत्र-बुद्धि है; इसीलिये ये श्रीकृष्णके अङ्गभूत हमलोगोंसे ज्ञान पूछ रहे हैं।

तदनन्तर श्रीमहादेवजीने सर्वकारणकारण भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन करके कहा—'यदुवंशी वसुदेव! सर्वेश्वर श्रीकृष्ण ही सबके मूलरूप हैं; अतः राजसूय-यज्ञका अनुष्ठान करके उसमें अपने पुत्र श्रीकृष्णकी, जो यज्ञके कारण एवं यज्ञेश हैं, समर्चन करो; फिर विधिपूर्वक दक्षिणा देकर भवसागरसे पार हो जाओ।'

मुने! शिवजीका कथन सुनकर जितेन्द्रिय वसुदेवजीने सामग्री जुटाकर शुभ मुहूर्तमें राजसूय-यज्ञका अनुष्ठान किया। उस यज्ञमें साक्षात् यज्ञेश और दक्षिणासहित ये यज्ञ वर्तमान थे; अतः देवताओंने साक्षात् प्रकट होकर वसुदेवजीके हव्यको ग्रहण किया। तदनन्तर जब वसुदेवजी पूर्णाहूति दे चुके; तब श्रीकृष्णकी आज्ञासे भगवान् सनत्कुमारने उनसे सर्वस्व दक्षिणामें देनेके लिये कहा। तब जिनके नेत्र और मुख प्रफुल्लित थे; उन वसुदेवजीने श्रीसनत्कुमारजीके आदेशानुसार ब्राह्मणोंको सर्वस्व दक्षिणारूपमें प्रदान कर दिया और ब्राह्मणोंके शुभ मुखोंद्वारा देवताओंको तृप्त

७८६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

किया। तत्पश्चात् देवगण और मुनिसमुदाय उस रातमें अपनी पत्नियोंके साथ वहाँ सुखपूर्वक रहे और प्रातःकाल होनेपर वे सभी श्रीकृष्णकी अनुमतिसे अपने-अपने स्थानको चले गये। तब सभी यदुवंशी भी रुक्मिणीकी दृष्टि पड़नेसे अमूल्य रत्नोंसे परिपूर्ण एवं श्रीकृष्णद्वारा सुरक्षित द्वारकाको प्रस्थान कर गये।

(अध्याय १२४)


राधा और श्रीकृष्णका पुनः मिलाप, राधाके पूछनेपर श्रीकृष्णद्वारा अपना तथा राधाका रहस्योद्घाटन

**श्रीनारायण कहते हैं—**नारद! इस प्रकार माधवने यादवों, देवों, मुनियों तथा अन्यान्य व्यक्तियों और देवियोंके साथ गणेश-पूजनका कार्य सम्पन्न किया। तत्पश्चात् वे अपने एक अंशसे रुक्मिणी आदि देवियोंके साथ रमणीय द्वारकापुरीको चले गये; किंतु स्वयं साक्षात्रूपसे सिद्धाश्रममें ही ठहर गये। वहाँ वे गोलोकवासी गोप-सखाओं, नन्द तथा माता यशोदा-गोपीके साथ प्रेमपूर्वक वार्तालाप करके पुनः माता, पिता, गोकुलवासी गोपों तथा बन्धुवर्गोंसे नीतियुक्त यथोचित वचन बोले।

**श्रीभगवान्ने कहा—**पिताजी! अब अपने व्रजको लौट जाओ। परम श्रेष्ठ यशस्विनी माता यशोदे! तुम भी उत्तम गोकुलको जाओ और वहाँ आयुके शेष कालपर्यन्त भोगोंका उपभोग करो। इतना कहकर भगवान् श्रीकृष्ण माता-पिताकी आज्ञा ले राधिकाके स्थानको चले गये तथा नन्दजी गोकुलको प्रस्थित हुए। वहाँ पहुँचकर श्रीकृष्णने मुस्कराती हुई सुन्दरी राधाको देखा। उनकी तरुणता नित्य स्थिर रहनेवाली थी, जिससे उनकी अवस्था द्वादश वर्षकी थी। मोतियोंका हार उनकी शोभा बढ़ा रहा था; वे रत्ननिर्मित ऊँचे आसनपर विराजमान थीं। उस समय मुस्कराती हुई असंख्य गोपियाँ हाथोंमें बेंत लिये उन्हें घेरे हुए थीं।

उधर प्राणवल्लभा राधाने भी दूरसे ही श्रीकृष्णको आते देखा। उनका परम सौन्दर्यशाली सुन्दर बालक-वेष था। वे मन्द-मन्द मुस्करा रहे थे। उनके शरीरकी कान्ति नवीन मेघके समान श्याम थी; वे रेशमी पीताम्बर धारण किये हुए थे; उनका सर्वाङ्ग चन्दनसे अनुलिप्त था; रत्नोंके आभूषण उन्हें सुशोभित कर रहे थे; उनकी शिखामें मयूर-पिच्छ शोभा दे रहा था; वे मालतीकी मालासे विभूषित थे; उनका प्रसन्नमुख मन्द हास्यकी छटा बिखेर रहा था; वे साक्षात् भक्तानुग्रहमूर्ति थे तथा मनोहर प्रफुल्ल क्रीड़ाकमल लिये हुए थे; उनके एक हाथमें मुरली और दूसरे हाथमें सुप्रशस्त दर्पण शोभा पा रहा था। उन्हें देखकर राधा तुरंत ही गोपियोंके साथ उठ खड़ी हुईं और परम भक्तिपूर्वक उन परमेश्वरको सादर प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगीं।

**राधिका बोलीं—**नाथ! तुम्हारे मुखचन्द्रको देखकर आज मेरा जन्म लेना सार्थक और जीवन धन्य हो गया तथा मेरे नेत्र और मन परम प्रसन्न हो गये। पाँचों प्राण स्नेहार्द्र और आत्मा हर्षविभोर हो गया; दुर्लभ बन्धुदर्शन दोनों (द्रष्टा और दृश्य)-के हर्षका कारण होता है। विरहाग्निसे जली हुई मैं शोकसागरमें डूब रही थी। तुमने अपनी पीयूषवर्षिणी दृष्टिसे मेरी ओर निहारकर मुझे भलीभाँति अभिषिक्त कर दिया; जिससे मेरा ताप जाता रहा। तुम्हारे साथ रहनेपर मैं शिवा, शिवप्रदा, शिवबीजा और