भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 782

७७२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

है और वे बाणको भी मारनेके लिये उद्यत थे; परंतु कार्तिकेयने उसे बचा लिया है। फिर आप भी अपने पौत्रका दमन करनेमें समर्थ बाणको मारनेके लिये पधारे हैं। जगदीश्वर! श्रुतिमें तो ऐसा सुना गया है कि आप सर्वात्माका सर्वत्र समभाव रहता है; फिर ऐसा व्यतिक्रम आप क्यों कर रहे हैं? भला, जिसका वध आप करना चाहते हैं, उसकी इस भूतलपर कौन रक्षा कर सकता है? सुदर्शनका तेज करोड़ों सूर्योंके समान परमोत्कृष्ट है। भला, किन देवताओंके अस्त्रसे उसका निवारण हो सकता है? जैसे सुदर्शन अस्त्रोंमें सर्वश्रेष्ठ है; उसी प्रकार आप भी समस्त देवताओंके परमेश्वर हैं। जैसे आप हैं; उसी तरह श्रीकृष्ण भी ब्रह्माके विधाता हैं। विष्णु सत्त्वगुणके आधार, शिव सत्त्वके आश्रयस्थान और स्वयं सृष्टिकर्ता पितामह रजोगुणके विधाता हैं। जो तमोगुणके आश्रय, एकादश रुद्रोंमें सर्वश्रेष्ठ, विश्वके संहार-कर्ता एवं महान् हैं; वे भगवान् कालाग्निरुद्र शंकरके अंश हैं। इनके अतिरिक्त अन्य रुद्रगण शंकरजीकी कलाएँ हैं। उन सबमें आप गुणरहित तथा प्रकृतिसे परे हैं। आप सबके परमात्मा हैं। सभी प्राणधारियोंके प्राण विष्णुके स्वरूप हैं; स्वयं ब्रह्मा मनरूप हैं और स्वयं शिव ज्ञानात्मक हैं। समस्त शक्तियोंमें श्रेष्ठ ईश्वरी प्रकृति बुद्धि है। समस्त देहधारियोंमें जो जीव है, वह आपके ही आत्माका प्रतिबिम्ब है। जीव अपने कर्मोंका भोक्ता है और स्वयं आप उसके साक्षी हैं। आपके चले जानेपर सभी उसी प्रकार आपका अनुगमन करते हैं, जैसे राजाके चलनेपर उसके अनुगामी। आपके निकल जानेपर शरीर तुरंत धराशायी हो जाता है और शवरूप होकर अस्पृश्य बन जाता है; परंतु आपकी मायासे वञ्चित होनेके कारण बुद्धिमान् संतलोग इसे नहीं जान पाते। जो संत आपका भजन करते हैं; वे ही इस मायासे तर पाते हैं। त्रिगुणा प्रकृति, दुर्गा, वैष्णवी, सनातनी परा नारायणी और ईशानी—ये सब आपकी मायाके स्वरूप हैं। इनसे पार पाना अत्यन्त कठिन है। प्रत्येक विश्वमें होनेवाले ब्रह्मा, विष्णु और शिव आपके ही अंश हैं। जैसे विश्वेश्वर श्रीकृष्ण गोकुलमें वास करते हैं; उसी तरह जो समस्त लोकोंके आश्रय हैं, वे महान् विराट् योगबलसे जलमें शयन करते हैं। वे ही भगवान् वासु हैं, जिनके परम देवता आप हैं; इसीसे ‘वासुदेव’ नामसे विख्यात हैं—ऐसा पुरातत्त्ववेत्ता कहते हैं। आप ही अपनी कलासे सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, पवन, वरुण, कुबेर, यम, महेन्द्र, धर्म, शेष, ईशान तथ निर्ऋतिके रूपमें विराजमान हैं। मुनिसमुदाय, मनुगण, फलदायक ग्रह और समस्त चराचर जीव आपकी कलाके कलांशसे उत्पन्न हुए हैं। आप ही परम ज्योतिः-स्वरूप ब्रह्म हैं। योगीलोग आपका ही ध्यान करते हैं। आपके भक्तगण अपने अन्तःकरणमें आपका ही आदर करते तथा ध्यान लगाते हैं। (ध्यानका प्रकार यों है—)

जिनके शरीरका वर्ण नूतन जलधरके समान श्याम है, पीताम्बर ही जिनका परिधान है, जिनके प्रसन्नमुखपर मन्द मुस्कानकी छटा छायी हुई है, जो भक्तोंके स्वामी तथा भक्तवत्सल हैं, जिनका सर्वाङ्ग चन्दनसे अनुलिप्त है, जिनकी दो भुजाएँ हैं, जो मुरली धारण किये हुए हैं, जिनकी चूड़ामें मयूरपिच्छ शोभा दे रहा है; जो मालतीकी माला, अमूल्य रत्ननिर्मित बाजूबंद और कंकणसे विभूषित हैं, मणियोंके बने हुए दोनों कुण्डलोंसे जिनका गण्डस्थल उद्भासित हो रहा है, जो रत्नोंके सारभागसे बनी हुई अँगूठी और बजती हुई करधनीसे सुसज्जित हैं, जिनकी आभा करोड़ों कामदेवोंका उपहास कर रही है, जिनके नेत्र शारदीय कमलकी शोभाको पराजित कर रहे हैं, जिनकी मुख-छबि शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाकी निन्दा कर रही है और प्रभा करोड़ों चन्द्रमाओंके समान