ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ७७१
देनेके लिये कहा; किंतु उसने स्वीकार नहीं किया। तब दुर्गा उसे समझाने लगीं; परंतु उनकी उत्तम बात उसकी समझमें न आयी। इसी समय महाबली बलि—जो महान् धर्मात्मा, वैष्णवोंमें अग्रगण्य और परमार्थके ज्ञाता हैं—रत्ननिर्मित रथपर आरूढ़ हो उस मनोरम सभामें आये। उस समय सात प्रयत्नशील दैत्य श्वेत चँवरोंद्वारा उनकी सेवा कर रहे थे और सात लाख दैत्येन्द्र उन्हें घेरे हुए थे। वे तुरंत ही रथसे उतरकर शिव, पार्वती, गणेश और कार्तिकेयको प्रणाम करके उस सभामें अवस्थित हुए। उन्हें निकट आया देखकर शंकरजीके अतिरिक्त अन्य सभी सभासद् उठ खड़े हुए। तब महादेवजी कुशल-प्रश्नके बाद उनसे मधुर वचन बोले।
श्रीमहादेवजीने कहा—भगवन्! तुम बड़े चतुर तथा सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके प्रदाता हो। ऐसे वैष्णवोंके साथ समागम होना ही परम लाभ है; क्योंकि वैष्णवके स्पर्शमात्रसे तीर्थ भी पवित्र हो जाते हैं। पवित्र ब्राह्मण सभी आश्रमोंके लिये पूजनीय होता है। उसमें भी यदि ब्राह्मण वैष्णव हो तो उससे भी अधिक पूज्य माना जाता है। मैं वैष्णव ब्राह्मणसे बढ़कर पवित्र किसीको नहीं देखता। वह पवन, अग्नि और समस्त तीर्थोंसे भी अधिक पावन है। उससे देवता भी डरते हैं। उसके शरीरमें पाप उसी प्रकार नहीं ठहरते; जैसे अग्निमें पड़ा हुआ सूखा घास-फूस।
तब बलि बोले—जगन्नाथ! आप मेरी प्रशंसा क्यों कर रहे हैं? महेश्वर! मैं तो आपका भृत्य हूँ न? नाथ! आपने ही तो मुझे अत्यन्त दुर्लभ परम ऐश्वर्य प्रदान किया है। सुरेश्वर! आप सर्वरूप तथा सर्वत्र वर्तमान हैं। इस समय दैववश आपने वामनरूप धारण करके मुझ भक्तसे ऐश्वर्य छीनकर इन्द्रको दे दिया है और मुझे सृष्टिके अधोभागमें स्थित सुतललोकमें स्थापित कर रखा है। अब मेरे औरस पुत्र बाणको, जिस प्रकार उसका कल्याण हो, शिक्षा दीजिये; क्योंकि आत्माके साथ युद्ध करना देवताओंमें भी निन्दित है। यों कहकर उन्होंने शिवजीको नमस्कार करके उनके चरणोंमें सिर रख दिया। उस समय उनका सारा शरीर पुलकित हो उठा। नेत्रोंमें आँसू छलक आये और वे अत्यन्त व्याकुल हो गये। तदनन्तर शुक्रद्वारा दिये गये एकादशाक्षरमन्त्रका जप करके वे सामवेदोक्त स्तोत्रद्वारा परमेश्वरकी स्तुति करने लगे।
बलिने कहा—प्रभो! पूर्वकालमें माता अदितिदेवीकी प्रार्थना तथा व्रतके फलस्वरूप आपने वामनरूप धारण करके मेरी वञ्चना की थी और सम्पत्तिरूपिणी महालक्ष्मीको मुझसे छीनकर मेरे पुण्यवान् भाई इन्द्रको, जो आपके भक्त हैं, दिया था। इस समय मेरा यह पुत्र बाण, जो शंकरजीका किङ्कर है; जिसकी भक्तोंके बन्धु उन शंकरजीने अपने पास रखकर रक्षा की है; माता पार्वतीने जिसका उसी भाँति पालन-पोषण किया है, जैसे माता अपने पुत्रका पालन करती है; उसी बाणकी सती-साध्वी युवती कन्याको (अनिरुद्धने) बलपूर्वक ग्रहण कर लिया