भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 780
७७०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

अमोघ सुदर्शनचक्रसे बाणको बचाओ; क्योंकि बाण मुझे गणेश, कार्तिकेय आदि सभीसे भी बढ़कर प्रिय है। अतः बाणके मस्तकपर तुम अपने चरणकमलकी रजके साथ-साथ अपना वरद हस्त स्थापित करो। शिवजीका कथन सुनकर दुर्गतिनाशिनी दुर्गा मुस्करायीं और समयोचित यथार्थ मधुर वचन बोलीं।

पार्वतीजीने कहा—बाण! तुम्हारे पास जो-जो उत्तम मणि, रत्न, मोती, माणिक्य और हीरे आदि हैं, उस सारे धनको तथा रत्नाभरणोंसे विभूषित अपनी कन्या उषाको रत्ननिर्मित आभूषणोंसे विभूषित परम श्रेष्ठ अनिरुद्धको आगे करके परमात्मा श्रीकृष्णको सौंप दो और इस प्रकार अपने राज्यको निष्कण्टक बना लो। भला, जिसके निकल जानेपर इन्द्रियोंसहित सभी प्राण विलीन हो जाते हैं, उस जीवका आत्माके साथ युद्ध कैसा? मैं ही शक्ति हूँ, ब्रह्मा मन हैं और स्वयं शिव ज्ञानस्वरूप हैं। शिवका त्याग करके देह तुरंत ही गिर जाता है और शवरूप हो जाता है। शिवजी! भला, संग्राममें सुदर्शनचक्रके तेजके सामने कौन ठहर सकता है? श्रीकृष्ण सबके परमात्मा, भक्तानुग्रहमूर्ति, नित्य, सत्य, परिपूर्णतम प्रभु हैं। गणेश और कार्तिकेय तथा उन दोनोंसे भी परे आप मेरे लिये प्रिय हैं और किंकरोंमें बाण प्रिय है; किंतु श्रीकृष्णसे बढ़कर प्यारा दूसरा कोई नहीं है। मैं ही वैकुण्ठमें महालक्ष्मी, गोलोकमें स्वयं राधिका, शिवलोकमें शिवा और ब्रह्मलोकमें सरस्वती हूँ। पूर्वकालमें मैं ही दैत्योंका संहार करके दक्षकन्या सती हुई, फिर वही मैं आपकी निन्दाके कारण शरीरका त्याग करके शैलकन्या पार्वती बनी। रक्तबीजके युद्धमें मैंने ही मूर्तिभेदसे कालीका रूप धारण किया था। मैं ही वेदमाता सावित्री, जनकनन्दिनी सीता और भारतभूमिपर द्वारकामें भीष्मक-पुत्री रुक्मिणी हूँ। इस समय दैववश सुदामाके शापसे मैं वृषभानुकी कन्या होकर प्रकट हुई हूँ और पुण्यमय वृन्दावनमें श्रीकृष्णकी धर्मपत्नी हूँ। आप तो स्वयं सर्वज्ञ सनातन भगवान् शिव हैं। भला, मैं आपको क्या समयोचित कर्तव्य बतला सकती हूँ।

(अध्याय ११८)


शिवजीका कन्या देनेके लिये बाणको समझाना, बाणका उसे अस्वीकार करना, बलिका आगमन और सत्कार, बलिका महादेवजीका चरणवन्दन करके श्रीभगवान्‌का स्तवन करना, श्रीभगवान्‌द्वारा बलिको बाणके न मारनेका आश्वासन

श्रीनारायण कहते हैं—नारद! पार्वतीकी बात सुनकर गणेश, कार्तिकेय, काली तथा स्वयं शिव उनकी प्रशंसा करने लगे। तदनन्तर जो परात्परा, ज्योतिःस्वरूपा, परमा, मूलप्रकृति और ईश्वरी हैं; उन जगज्जननी पार्वतीसे भगवान् शम्भु बोले।

श्रीमहादेवजीने कहा—देवेशि! तुमने जो यह कहा है कि परमात्माके साथ युद्ध करना अयुक्त तथा उपहासास्पद है; अतः बाण अपनी कन्या उषाको स्वर्णनिर्मित आभूषणोंसे विभूषित करके श्रीकृष्णको दे दे। यही समस्त कर्मोंमें सामञ्जस्य, यशस्कर और शुभदायक है। तुम्हारा यह सारा कथन वेदसम्मत है; परंतु बाण हिरण्यकशिपुका वंशज है; अतः यदि वह कन्या दे देता है और भयभीत होकर युद्धसे पराङ्मुख हो जाता है तो यह तुम्हारे लिये ही अकीर्तिकर है। इसलिये शिवे! रणशास्त्रविशारद बाण कवच धारण करके आगे चले; तत्पश्चात् हमलोग भी कवचसे सुसज्जित हो उसका अनुगमन करेंगे। पार्वतीसे यों कहकर शंकरजीने बाणसे कन्या

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