ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड
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किंतु आठों भैरव, एकादश रुद्र, आठ वसु, इन्द्र आदि ये देवगण, द्वादश आदित्य, सभी दैत्यराज, देवताओंके अग्रणी स्कन्द तथा गणसहित बाण—ये सभी संग्राममें अनिरुद्धको पराजित नहीं कर सकते। अनिरुद्ध स्वयं ब्रह्मा, प्रद्युम्न कामदेव, बलदेव स्वयं शेषनाग और श्रीकृष्ण प्रकृतिसे परे
हैं। गणेश्वर ! इस प्रकार यह सारा रहस्य मैंने तुम्हें बता दिया। तुम तो स्वयं ही शुभस्वरूप और विघ्नोंका विनाश करनेवाले हो; अतः बाणकी रक्षा करो। श्रीहरि अस्त्रश्रेष्ठ सुदर्शनको, जो अमोघ और करोड़ों सूर्योंके समान कान्तिमान् है, लेकर शीघ्र ही आयेंगे।
(अध्याय ११७)
मणिभद्रका शिवजीको सेनासहित श्रीकृष्णके पधारनेकी सूचना देना, शिवजीका बाणकी रक्षाके लिये दुर्गासे कहना, दुर्गाका बाणको युद्धसे विरत होनेकी सलाह देना
श्रीनारायण कहते हैं—नारद! इस प्रकार गणेशको समझाकर शिवजी महलके भीतर गये। वहाँ दुर्गतिनाशिनी दुर्गा, भैरवी, भद्रकाली, उग्रचण्डा और कोटरी रमणीय सिंहासनोंपर विराजमान थीं। उन सबने सहसा उठकर जगदीश्वर शिवको नमस्कार किया। तत्पश्चात् गणेश, पराक्रमी कार्तिकेय, बाण, वीरभद्र, स्वयं नन्दी, सुनन्दक, महामन्त्री महाकाल, आठों भैरव, सिद्धेन्द्र, योगीन्द्र और एकादश रुद्र—ये सभी वहाँ आ गये। इसी बीच सिंहद्वारपर पहरा देनेवाला स्वयं मणिभद्र वहाँ आया और उन परमेश्वर शिवसे बोला।
मणिभद्रने कहा—महेश्वर ! बलदेव, प्रद्युम्न, साम्ब, सात्यकि, महाराज उग्रसेन, स्वयं भीम, अर्जुन, अक्रूर, उद्धव और शक्रनन्दन जयन्त तथा जो विधिके भी विधाता हैं, जिनकी कान्ति करोड़ों कामदेवोंकी शोभाको छीने लेती है, वनमाला जिनकी शोभा बढ़ा रही है, सात गोप-पार्षद श्वेत चँवरोंद्वारा जिनकी सेवा कर रहे हैं, जो करोड़ों सूर्योंके समान कान्तिमान् अनुपम चक्र धारण करते हैं; वे परमेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण बहुमूल्य रत्नोंके सारभागसे निर्मित परम रमणीय उत्तम रथमें कौमोदकी गदा, अमोघ शूल और विश्वसंहारकारी महाशङ्ख पाञ्चजन्य रखकर यादवोंकी असंख्य
सेनाओंके साथ पधार गये हैं। प्रभो! बलदेवने हलके द्वारा लाखों मल्लोंका कचूमर निकाल दिया है और उद्यानोंकी चहारदीवारीको तोड़-फोड़ डाला है। वे द्वारपालोंका वध करके महाद्वारमें घुस आये हैं। ऐसा सुनकर महादेवजी उस सुर-समाजमें पार्वती, भद्रकाली, स्कन्द, गणपति, आठों भैरवों, एकादश रुद्रों, वीरभद्र, महाकाल, नन्दी तथा सभी नवों सेनापतियोंसे बोले।
श्रीमहादेवजीने कहा—सेनाध्यक्षो ! गोलोक-नाथ भगवान् चक्रपाणि आ गये हैं। वे क्षणभरमें विश्व-समूहका विनाश कर सकते हैं; फिर इस नगरकी तो बात ही क्या है। अतः तुम सब लोग सभी उपायोंद्वारा यलपूर्वक बाणकी रक्षा करो। अब बाण लम्बोदर गणेशका स्मरण करके संग्रामभूमिको जाय। उसके दक्षिणभागमें स्कन्द, आगे-आगे गणेश्वर और वामभागमें आठों भैरव, एकादश रुद्र, स्वयं महारथी नन्दी, महाकाल, वीरभद्र तथा अन्यान्य सैनिक उसकी रक्षा करें। ऊर्ध्वभागमें दुर्गा, भद्रकाली, उग्रचण्डा और कोटरीको रहना चाहिये। दुर्गतिनाशिनी दुर्गे! बाणकी रक्षा करो। महाभागे! तुम्हीं श्रीकृष्णकी शक्ति हो; इसीलिये 'नारायणी' कही जाती हो। विष्णुमाये! तुम जगज्जननी तथा सम्पूर्ण मङ्गलोंकी भी मङ्गलस्वरूपा हो; अतः चक्रोंके साररूप