भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 783, कुल 810 में से

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पृष्ठ 783

· श्रीकृष्णजन्मखण्ड · ७७३

समुज्ज्वल है; करोड़ों-करोड़ों गोपियाँ मुसकराती हुई जिनकी ओर निहार रही हैं, समवयस्क गोप-पार्षद श्वेत चँवर डुलाकर जिनकी सेवा कर रहे हैं, जिनका वेष गोपालकके सदृश है; जो राधाके वक्षःस्थलपर स्थित एवं ध्यानद्वारा असाध्य और दुराराध्य हैं; ब्रह्मा, शिव और शेष जिनकी वन्दना करते हैं और सिद्धेन्द्र, मुनीन्द्र तथा योगीन्द्र प्रणत होकर जिनका स्तवन करते हैं; जो वेदोंद्वारा अनिर्वचनीय, परस्वेच्छामय और सर्वव्यापक हैं एवं जिनका स्वरूप स्थूलसे स्थूलतम और सूक्ष्मसे सूक्ष्मतम है; जो सत्य, नित्य, प्रशस्त, प्रकृतिसे परे, ईश्वर, निर्लिप्त और निरीह हैं; उन सनातन भगवान्‌का इस प्रकार ध्यान करके वे पवित्र हो जाते हैं और पद्माद्वारा समर्चित चरणकमलोंमें कोमल दूर्वाङ्कुर, अक्षत तथा जल निवेदित करनेके लिये उत्सुक हो उठते हैं। भगवन् ! वेद, सरस्वती, शेषनाग, ब्रह्मा, शम्भू, गणेश, सूर्य, चन्द्रमा, महेन्द्र और कुबेर—ये सभी आप परमेश्वरका स्तवन करनेमें समर्थ नहीं हैं; फिर अन्य जडबुद्धि जीवोंकी तो गणना ही क्या है। ऐसी दशामें मैं आप गुणातीत, निरीह, निर्गुण परमेश्वरकी क्या स्तुति कर सकता हूँ? नाथ ! यह एक मूर्ख असुर है, सुर नहीं है; अतः आप इसे क्षमा करें। बलिक कथन सुनकर जगदीश्वर परिपूर्णतम भक्तवत्सल भगवान् श्रीहरि अपने उस भक्तसे बोले।

श्रीभगवान्‌ने कहा— वत्स! डरो मत। तुम मेरे द्वारा सुरक्षित अपने गृह सुतललोकको जाओ। मेरे वर-प्रसादसे तुम्हारा यह पुत्र भी अजर-अमर होगा। मैं इस मूर्ख अभिमानीके दर्पका ही विनाश करूँगा; क्योंकि मैंने प्रसन्नचित्तसे अपने तपस्वी भक्त प्रह्लादको ऐसा वर दे रखा है कि 'तुम्हारा वंश मेरे द्वारा अवध्य होगा।' मैं तुम्हारे पुत्रको मृत्युञ्जय नामक परम ज्ञान प्रदान करूँगा। तुमने जिस सामवेदोक्त अभीष्ट स्तोत्रद्वारा मेरा स्तवन किया है; इसे पूर्वकालमें ब्रह्माने सूर्य-ग्रहणके अवसरपर प्रशस्त पुण्यतम सिद्धाश्रममें सनत्कुमारको प्रदान किया था। गौरीने मन्दाकिनीके तटपर इसे गौतमको बतलाया था। दयालु शंकरने अपने भक्त शिष्य ब्रह्माको इसका उपदेश किया था। विरजाके तटपर मैंने इसे शिवको प्रदान किया था। पूर्वकालमें बुद्धिमान् सनत्कुमारने इसे महर्षि भृगुको बतलाया था। इस समय तुम इसे बाणको दोगे और बाण इसके द्वारा मेरा स्तवन करेगा। यह स्तोत्र महान् पुण्यदायक है। जो मनुष्य भलीभाँति स्नानसे शुद्ध हो वस्त्र, भूषण और चन्दन आदिसे गुरुका वरण और पूजन करके उनके मुखसे इस स्तोत्रका उपदेश ग्रहणकर नित्य पूजाके समय भक्तिपूर्वक इसका पाठ करेगा, वह अपने करोड़ों जन्मोंके संचित पापसे मुक्त हो जायगा—इसमें तनिक भी संशय नहीं है। यह स्तोत्र विपत्तियोंका विनाशक, समस्त सम्पत्तियोंका कारण, दुःख-शोकका निवारक, भयंकर भवसागरसे उद्धार करनेवाला, गर्भवासका उच्छेदक, जरा-मृत्युका हरण करनेवाला, बन्धनों और रोगोंका खण्डन करनेवाला तथा भक्तोंके लिये शृङ्गार-स्वरूप है। जो इस स्तोत्रका पाठ करता है, उसने मानो समस्त तीर्थोंमें स्नान कर लिया, सभी यज्ञोंमें दीक्षा ग्रहण कर ली, सभी व्रतोंका अनुष्ठान कर लिया और सभी तपस्याएँ पूर्ण कर लीं। उसे निश्चय ही सम्पूर्ण दानोंका सत्य फल प्राप्त हो जाता है। इस स्तोत्रका एक लाख पाठ करनेसे मनुष्योंको स्तोत्रसिद्धि मिल जाती है। यदि स्तोत्र सिद्ध हो जाय तो उसे सारी सिद्धियाँ सुलभ हो जाती हैं। वह इस लोकमें देवतुल्य होकर अन्तमें श्रीहरिके पदको प्राप्त हो जाता है। (अध्याय ११९)

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