भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 784
७७४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

बाणका यादवी सेनाके साथ युद्ध, बाणका धराशायी होना, शंकरजीका बाणको उठाकर श्रीकृष्णके चरणोंमें डाल देना, श्रीकृष्णद्वारा बाणको जीवन-दान, बाणका श्रीकृष्णको बहुत-से दहेजके साथ अपनी कन्या समर्पित करना, श्रीकृष्णका पौत्र और पौत्रवधूके साथ द्वारकाको लौट जाना और द्वारकामें महोत्सव

श्रीनारायण कहते हैं— नारद! तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णने उद्धव और बलदेवके साथ शुभ मन्त्रणा करके बाणके पास दूत भेजा। तब उस दूतने—जहाँ शिव, गणपति, दुर्गतिनाशिनी दुर्गा, कार्तिकेय, भद्रकाली, उग्रचण्डा और कोटरी—ये सब विद्यमान थे, वहाँ आकर शिव, शिवा, गणेश और पूजनीय मानवोंको नमस्कार किया और यथोचित वचन कहा।

दूत बोला— महेश्वर! भगवान् श्रीकृष्ण बाणको युद्धके लिये ललकार रहे हैं; अतः वह या तो युद्ध करे अथवा अनिरुद्ध और उषाको लेकर उनके शरणापन्न हो जाय; क्योंकि रणके लिये बुलाये जानेपर जो पुरुष भयभीत होकर सम्मुख युद्धार्थ नहीं जाता है, वह परलोकमें अपने सात पूर्वजोंके साथ नरकगामी होता है। दूतकी बात सुनकर स्वयं पार्वतीदेवी सभाके मध्यमें शंकरजीके संनिकट ही यथोचित वचन बोलीं।

पार्वतीने कहा— महाभाग बाण! तुम अपनी कन्याको लेकर उनके पास जाओ और प्रार्थना करो। फिर अपना सर्वस्व दहेजमें देकर श्रीकृष्णकी शरण ग्रहण करो; क्योंकि वे सबके ईश्वर तथा कारण, समस्त सम्पत्तियोंके दाता, श्रेष्ठ, वरेण्य, आश्रयस्थान, कृपालु और भक्तवत्सल हैं। पार्वतीका वचन सुनकर सभामें उपस्थित सभी सुरेश्वरोंने धन्य-धन्य कहते हुए उनकी प्रशंसा की और बाणसे वैसा करनेके लिये कहा; परंतु बाण क्रोधसे आगबबूला हो उठा, उसका शरीर काँपने लगा और नेत्र लाल हो गये। फिर तो वह असुर सहसा उठ खड़ा हुआ और सबके मना करनेपर भी कवचसे सुसज्जित हो हाथमें धनुष ले शंकरजीको प्रणाम करके करोड़ों कवचधारी महाबली दैत्योंके साथ चल पड़ा। तब कुम्भाण्ड, कूपकर्ण, निकुम्भ और कुम्भ—इन प्रधान सेनापतियोंने भी कवच धारण करके उसका अनुगमन किया। फिर उन्मत्तभैरव, संहारभैरव, असिताङ्गभैरव, रुरुभैरव, महाभैरव, कालभैरव, प्रचण्डभैरव और क्रोधभैरव—ये सभी भी कवच धारण करके शक्तियोंके साथ गये। कवचधारी भगवान् कालाग्निरुद्रने भी रुद्रोंके साथ गमन किया। उग्रचण्डा, प्रचण्डा, चण्डिका, चण्डनायिका, चण्डेश्वरी, चामुण्डा, चण्डी और चण्डक पालिका—ये सभी आठों नायिकाएँ हाथमें खप्पर ले उसके पीछे-पीछे चलीं। शोणितपुरकी ग्रामदेवता कोटरीने भी रत्ननिर्मित रथपर सवार हो प्रस्थान किया। उस समय उसका मुख प्रफुल्लित था और वह खड्ग तथा खप्पर लिये हुए थी। चन्द्राणी, शान्तस्वरूपा वैष्णवी, ब्रह्मवादिनी ब्रह्माणी, कौमारी, नारसिंही, विकट आकारवाली वाराही, महामाया माहेश्वरी और भीमरूपिणी भैरवी—ये सभी आठों शक्तियाँ हर्षपूर्वक रथपर सवार हो नगरसे बाहर निकलीं। जो रक्तवर्णवाली और त्रिनेत्रधारिणी हैं तथा जीभ लपलपानेके कारण जो भयंकर प्रतीत होती हैं, वे भद्रकालिका हाथोंमें शूल, शक्ति, गदा, खड्ग और खप्पर धारण करके बहुमूल्य रत्नोंके सारभागसे बने हुए रथपर सवार होकर चलीं। फिर महेश्वर हाथमें त्रिशूल ले नन्दीश्वरपर चढ़कर तथा धनुर्धर स्कन्द हाथमें शस्त्र ले अपने वाहन मयूरपर सवार होकर चले। इस प्रकार गणेश और पार्वतीको छोड़कर शेष