भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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७८०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

करनेयोग्य, भक्तोंके स्वामी और भक्तवत्सल हैं; उन गणेशका ध्यान करना चाहिये।'

इस प्रकार ध्यान करके सती राधाने उस पुष्पको अपने मस्तकपर रखकर पुनः सर्वाङ्गोंको शुद्ध करनेवाला वेदोक्त न्यास किया। तत्पश्चात् उसी शुभदायक ध्यानद्वारा पुनः ध्यान करके राधाने उन लम्बोदरके चरणकमलमें पुष्पाञ्जलि समर्पित की। फिर गोलोकवासिनी स्वयं श्रीराधिकाजीने सुगन्धित सुशीतल तीर्थजल, दूर्वा, चावल, श्वेत पुष्प, सुगन्धित चन्दनयुक्त अर्घ्य, पारिजात-पुष्पोंकी माला, कस्तूरी-केसरयुक्त चन्दन, सुगन्धित शुक्ल पुष्प, सुगन्धयुक्त उत्तम धूप,घृत-दीपक, सुस्वादु रमणीय नैवेद्य, चतुर्विध अन्न, सुपक्व, फल, भाँति-भाँतिके लड्डू, रमणीय सुस्वादु पिष्टक, विविध प्रकारके व्यञ्जन, अमूल्य रत्ननिर्मित सिंहासन, सुन्दर दो वस्त्र, मधुपर्क, सुवासित सुशीतल पवित्र तीर्थजल, ताम्बूल, अमूल्य श्वेत चँवर, मणि-मुक्ता-हीरासे सुसज्जित सुन्दर सूक्ष्मवस्त्रद्वारा सुशोभित शय्या, सवत्सा कामधेनु गौ और पुष्पाञ्जलि अर्पण करके अत्यन्त श्रद्धाके साथ षोडशोपचार समर्पित किया। फिर कालिन्दीकुलवासिनी राधाने 'ॐ गं गौं गणपतये विघ्नविनाशिने स्वाहा' गणेशके इस षोडशाक्षर-मन्त्रका, जो श्रेष्ठ कल्पतरुके समान है, एक हजार जप किया। इसके बाद वे भक्तिवश कंधा नीचा करके नेत्रोंमें आँसू भरकर पुलकित शरीरसे परम भक्तिके साथ इस स्तोत्रद्वारा स्तवन करने लगीं।

श्रीराधिकाने कहा—जो परम धाम, परब्रह्म, परेश, परमेश्वर, विघ्नोंके विनाशक, शान्त, पुष्ट, मनोहर और अनन्त हैं; प्रधान-प्रधान सुर और असुर जिनका स्तवन करते हैं; जो देवरूपी कमलके लिये सूर्य और मङ्गलोंके आश्रय-स्थान हैं; उन परात्पर गणेशकी मैं स्तुति करती हूँ। यह उत्तम स्तोत्र महान् पुण्यमय तथा विघ्न और शोकको हरनेवाला है। जो प्रातःकाल उठकर इसका पाठ करता है, वह सम्पूर्ण विघ्नोंसे विमुक्त हो जाता है। (अध्याय १२२)


गणेशकृत राधा-प्रशंसा, पार्वती-राधा-सम्भाषण, पार्वतीके आदेशसे सखियोंद्वारा राधाका श्रृङ्गार और उनकी विचित्र झाँकी; ब्रह्मा, शिव, अनन्त आदिके द्वारा राधाकी स्तुति

श्रीनारायण कहते हैं—नारद! सती राधाने गणेशकी विधिपूर्वक भलीभाँति पूजा करके स्तुति की और सर्वाङ्गोंमें पहनने योग्य बहुमूल्य रत्नोंके बने हुए आभूषण प्रदान किये। राधाद्वारा किये गये पूजन और पूजा-सामग्रीको देखकर तथा स्तवन सुनकर शान्तस्वरूप गणेश शान्तस्वभाववाली त्रिलोकजननी राधासे मधुर वचन बोले।

श्रीगणेशने कहा—जगन्मातः! तुम्हारी यह