भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 789, कुल 810 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 789

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७७९

गणेशके अग्रपूज्यत्व-वर्णनके प्रसङ्गमें राधाद्वारा गणेशकी अग्रपूजाका कथन

नारदजीने पूछा— मुने! पुराणोंमें जो गणेश-पूजनका दुर्लभ आख्यान वर्णित है, उसे मैंने सामान्यतया ब्रह्माके मुखसे संक्षेपमें सुना है। अब आपसे समस्त पूजनीयोंमें प्रधान गणपतिकी महिमा विस्तारपूर्वक सुननेकी मेरी अभिलाषा है; क्योंकि आप योगीन्द्रोंके गुरुके भी गुरु हैं। पूर्वकालमें स्वर्गवासियोंने सिद्धाश्रममें राधा-माधवकी महापूजा की थी; उसी राधाने सौ वर्षके बीतनेपर जब श्रीदामाका शाप निवृत्त हुआ; तब ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि सुरेन्द्रों, नागराज शेष और अन्यान्य बड़े-बड़े नागों, भूतलपर बहुत-से बलशाली नरेशों और असुरों, अन्यान्य महाबली गन्धर्वों तथा राक्षसोंके रहते हुए सर्वप्रथम गणेशकी पूजा कैसे की? महाभाग! यह वृत्तान्त मुझसे विस्तारपूर्वक वर्णन करनेकी कृपा करें।

श्रीनारायण बोले— नारद! तीनों लोकोंमें पुण्यवती होनेके कारण पृथ्वी धन्य एवं मान्य है। उस पृथ्वीपर भारतवर्ष कर्मोंका शुभ फल देनेवाला है। उस पुण्यक्षेत्र भारतमें सिद्धाश्रम नामक एक महान् पुण्यमय शुभ क्षेत्र है; जो धन्य, यशस्य, पूज्य और मोक्ष-प्रदाता है। भगवान् सनत्कुमार वहीं सिद्ध हुए थे। स्वयं ब्रह्माने भी वहीं तपस्या करके सिद्धि प्राप्त की थी। योगीन्द्र, मुनीन्द्र, कपिल आदि सिद्धेन्द्र और शतक्रतु महेन्द्र वहीं तप करके सिद्धिके भागी हुए हैं। इसी कारण उसे सिद्धाश्रम कहते हैं। वह सभीके लिये दुर्लभ है। मुने! वहाँ गणेश नित्य निवास करते हैं। वहाँ गणेशकी अमूल्य रत्नोंकी बनी हुई एक सुन्दर प्रतिमा है; जिसकी वैशाखी पूर्णिमाके दिन सभी देवता, नाग, मनुष्य, दैत्य, गन्धर्व, राक्षस, सिद्धेन्द्र, मुनीन्द्र, योगीन्द्र और सनकादि महर्षि पूजा करते हैं। उस अवसरपर वहाँ पार्वतीके साथ कल्याणकारी शम्भु, गणोंसहित कार्तिकेय और स्वयं प्रजापति ब्रह्मा पधारे। प्रधान-प्रधान नागोंके साथ शेषनाग भी तुरंत ही वहाँ आ पहुँचे। फिर सभी देवता, मनु और मुनिगण भी वहाँ आये। सभी नरेश प्रसन्नमनसे गणेशकी पूजा करनेके लिये वहाँ उपस्थित हुए। द्वारकावासियोंके साथ भगवान् श्रीकृष्णका भी वहाँ शुभागमन हुआ तथा गोकुलवासियोंके साथ नन्द भी पधारे। तदनन्तर सुरसिका, रासेश्वरी और श्रीकृष्णके प्राणोंकी अधिदेवता सुन्दरी राधा भी सौ वर्ष व्यतीत हो जानेपर गोलोकवासिनी गोपी-सखियोंके साथ पधारीं। वहाँ सुन्दर दाँतोंवाली राधाने भलीभाँति स्नान करके शुद्ध हो धुली हुई साड़ी और कंचुकी धारण की। फिर भुवनपावनी कान्ता राधाने अपने चरणकमलोंका अच्छी तरह प्रक्षालन किया। तत्पश्चात् वे निराहार रहकर इन्द्रियोंको काबूमें करके मणिमण्डपमें गयीं। वहाँ उन्होंने श्रीकृष्ण-प्राप्तिकी कामनासे उत्तम संकल्पका विधान करके भक्तिपूर्वक गङ्गाजलसे गणेशको स्नान कराया। इसके बाद जो चारों वेदों, वसु और लोकोंकी माता, ज्ञानियोंकी परा जननी एवं बुद्धिरूपा हैं; वे भगवती राधा श्वेत पुष्प लेकर सामवेदोक्त प्रकारसे अपने पुत्रभूत गणेशका यों ध्यान करने लगीं।

‘जो खर्व (छोटे कदवाले), लम्बोदर (तोंदवाले), स्थूलकाय, ब्रह्मतेजसे उद्भासित, हाथीके-से मुखवाले, अग्निसरीखे कान्तिमान्, एकदन्त और असीम हैं; जो सिद्धों, योगियों और ज्ञानियोंके गुरु-के-गुरु हैं; ब्रह्मा, शिव और शेष आदि देवेन्द्र, मुनीन्द्र, सिद्धेन्द्र, मुनिगण तथा संतलोग जिनका ध्यान करते हैं; जो ऐश्वर्यशाली, सनातन, ब्रह्मस्वरूप, परम मङ्गल, मङ्गलके स्थान, सम्पूर्ण विघ्नोंको हरनेवाले, शान्त, सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके दाता, कर्मयोगियोंके लिये भवसागरमें मायारूपी जहाजके कर्णधारस्वरूप शरणागत-दीन-दुःखीकी रक्षामें तत्पर, ध्यानरूप साधना