ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अतः विलम्ब मत कीजिये।
श्रीकृष्णने कहा—मित्र! पहले तुम मुझपर प्रहार करो; तत्पश्चात् मैं युद्ध करूँगा। वत्स! मैं सारा रहस्य जानता हूँ; अतः अब तुम सुखपूर्वक वैकुण्ठको जाओ। तब शृगालने माधवपर दस बाणोंसे वार किया; किंतु वे कालरूपी बाण शीघ्र ही श्रीकृष्णको प्रणाम करके आकाशमें विलीन हो गये। फिर राजा शृगालने प्रलयकालीन अग्निकी शिखाके समान चमकीली गदा फेंकी, परंतु वह तत्काल ही श्रीकृष्णके अङ्गस्पर्शमात्रसे टूक-टूक हो गयी। तत्पश्चात् उसने परम दारुण कालरूपी खड्ग और धनुष चलाया, किंतु वह उसी क्षण श्रीकृष्णके अङ्गोंका स्पर्श होते ही छिन्न-भिन्न हो गया। इस प्रकार राजाको अस्त्रहीन देखकर कृपालु श्रीकृष्णने कहा—‘मित्र! घर जाकर खूब तीखा अस्त्र ले आओ।’
तब शृगाल बोला—प्रभो! आत्मारूपी आकाश अस्त्रद्वारा बेधा नहीं जा सकता। भला, आत्माके साथ युद्ध कैसा? पृथ्वीका उद्धार करनेमें कारणस्वरूप भगवन्! इस भवसागरसे मेरा उद्धार कीजिये। नाथ! भवसागर बड़ा भयंकर है और विषय-विषसे भी अधिक दारुण हैं; अतः मेरी स्वकर्मजनित माया-मोहरूपी साँकलको छिन्न-भिन्न कर दीजिये। आप कर्मोंके ईश्वर, ब्रह्माके भी विधाता, शुभ फलोंके दाता, समस्त सम्पत्तियोंके प्रदाता, प्राक्तन कर्मोंके कारण और उनके खण्डनमें समर्थ हैं। मैं अपने इस पाञ्चभौतिक प्राकृत नश्वर देहका त्याग करके आपके ही वैकुण्ठके सातवें द्वारपर जाऊँगा; क्योंकि वही मेरा घर है।
इस प्रकारका मित्रका स्तवन और अमृतोपम वचन सुनकर कृपानिधि श्रीकृष्ण कृपापरवश हो वहीं समरभूमिमें स्नेहवश रोने लगे। श्रीकृष्णके नेत्रोंसे गिरे हुए अश्रुबिन्दुओंसे वहाँ सहसा ‘बिन्दुसर’ नामक एक दिव्य सरोवर प्रकट हो गया; जो तीर्थोंमें परम श्रेष्ठ है। उसके जलके स्पर्शमात्रसे मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है और अपने सात जन्मोंके संचित पापोंसे छूट जाता है; इसमें जरा भी संदेह नहीं है।
इसके बाद श्रीभगवान्ने पूछा—मित्र! यदि तुम्हारा मन इतना निर्मल है तो फिर तुम्हारी ऐसी युद्ध-बुद्धि कैसे हुई और क्यों तुमने दूतके द्वारा ऐसा दारुण निष्ठुर संदेश कहलवाया?
इसपर शृगालने कहा—नाथ! मैंने तुम्हारे प्रति ऐसे निष्ठुर वाक्योंका प्रयोग किया, तभी तो तुम क्रोधपूर्वक यहाँ आये। नहीं तो, स्वप्नमें भी तुम्हारे दर्शन दुर्लभ हैं। यों कहते-कहते उसने योगावलम्बन करके प्राकृत पाञ्चभौतिक शरीरका त्याग कर दिया और वह श्रीकृष्णके देखते-देखते ही विमानपर सवार होकर दिव्य धामको चला गया। उस समय शृगालके शरीरसे सात ताड़-जितनी लंबी एक महान् ज्योति निकली और वह ब्रह्माजी तथा लक्ष्मीजीके द्वारा पूजित श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें प्रणाम करके चली गयी।
तब अपने साथियोंके सहित श्रीमान् कृष्ण इस अद्भुत चरित्रको देखकर प्रफुल्लमुख हो द्वारकाकी ओर चल दिये। द्वारका पहुँचकर उन्होंने पहले माता-पिताको प्रणाम किया। तदनन्तर रुक्मिणीके महलमें जाकर पुष्पशय्यापर शयन किया।
(अध्याय १२१)