भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 787

श्रीकृष्णजन्मखण्ड

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शृगालोपाख्यान

श्रीनारायण कहते हैं— नारद! एक समयकी बात है। श्रीकृष्ण अपने गणोंके साथ सुधर्मा-सभामें विराजमान थे। उसी समय वहाँ एक ब्राह्मणदेवता आये, जो ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित हो रहे थे। वहाँ आकर उन्होंने पुरुषोत्तम श्रीकृष्णका दर्शन किया और भक्तिपूर्वक उनकी स्तुति की। फिर वे शान्त एवं भयभीत हो विनयपूर्वक मधुर वचन बोले।

ब्राह्मणने कहा— प्रभो! वासुदेव शृगाल नामक एक मण्डलेश्वर राजाधिराज है; वह आपकी अत्यन्त निन्दा करता है और कहता है कि 'वैकुण्ठमें चतुर्भुज देवाधिदेव लक्ष्मीपति वासुदेव मैं ही हूँ। मैं ही लोकोंका विधाता और ब्रह्माका पालक हूँ। पृथ्वीका भार उतारनेके लिये ब्रह्माने मेरी प्रार्थना की थी; इसी कारण भारतवर्षमें मेरा आगमन हुआ है। मैंने महाबली दैत्यराज हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष, मधु और कैटभको मारकर सृष्टिकी रक्षा की है। मैं ही स्वयं ब्रह्मा, मैं ही स्वयं शिव तथा मैं ही लोकोंका पालक एवं दुष्टोंका संहारक विष्णु हूँ। सभी मनुगण तथा मुनिसमुदाय मेरे अंशकलासे उत्पन्न हुए हैं। मैं स्वयं प्रकृतिसे परे निर्गुण नारायण हूँ। भद्र! अबतक मैंने तुम्हें लज्जा तथा कृपाके कारण मित्र-बुद्धिसे क्षमा कर दिया था; किंतु जो बीत गया, सो बीत गया; अब तुम मेरे साथ युद्ध करो। मैंने दूतके मुखसे सुना है कि तुम्हारा अहंकार बहुत बढ़ गया है; अतः उसका दमन करना उचित है। ऊँचे सिर उठानेवालोंको कुचल डालना राजाका परम धर्म है और इस समय मैं ही पृथ्वीका शासक हूँ। मैं स्वयं चतुर्भुजरूप धारण करके शङ्ख-चक्र-गदा-पद्म लेकर सेनासहित युद्धके लिये उस द्वारकाको जाऊँगा। यदि तुम्हारी इच्छा हो तो युद्ध करो; अन्यथा मेरी शरण ग्रहण करो। यदि तुम शरणागत होकर मेरी शरणमें नहीं आ जाओगे तो मैं क्षणभरमें ही द्वारकाको भस्म कर डालूँगा। मैं अकेला ही लीलापूर्वक क्षणभरमें सेना, पुत्र, गण और बन्धु-बान्धवोंसहित तुम्हें जला डालनेमें समर्थ हूँ।'

मनु! यों कहकर वह ब्राह्मण मौन हो गया। उसे सुनकर सदस्योंसहित श्रीकृष्ण ठठाकर हँस पड़े। फिर उन्होंने ब्राह्मणका भलीभाँति आदर-सत्कार करके उन्हें चारों प्रकारके पदार्थ (भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चोष्य) भोजन कराये। शृगालके वाग्बाण उनके मनमें कसक पैदा कर रहे थे; इसलिये बड़े क्षोभसे उन्होंने वह रात बितायी। प्रातःकाल होते ही वे बड़ी उतावलीके साथ हर्षपूर्वक गणोंसहित रथपर सवार हो सहसा वहाँ जा पहुँचे, जहाँ राजा शृगाल था। उनके आनेका समाचार सुनकर राजा शृगाल कृत्रिम-रूपसे चार भुजा धारण करके गणोंसहित युद्धके लिये श्रीहरिके स्थानपर आया। श्रीकृष्णने मित्र-बुद्धिसे उसकी ओर स्नेहभरी दृष्टिसे देखकर मुस्कराते हुए मधुर वचनोंद्वारा लौकिक रीतिसे उससे वार्तालाप किया। राजा शृगालने श्रीकृष्णको निमन्त्रित किया; परंतु उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया। तब वह श्रीकृष्णसे भयभीत हो उनके दर्शनसे दम्भको त्यागकर यों कहने लगा।

शृगाल बोला— प्रभो! आप चक्रद्वारा मेरा शिरश्छेदन करके शीघ्र ही द्वारकाको लौट जाइये, जिससे मेरा यह अनित्य एवं नश्वर पापी शरीर समाप्त हो जाय। भगवन्! जय-विजयकी तरह मैं भी आपका द्वारपाल हूँ। मेरा नाम सुभद्र है। लक्ष्मीके शापसे मैं भ्रष्ट हो गया था; अब मेरा वह समय पूरा हो गया है। सौ वर्षके बाद शापके समाप्त हो जानेपर मैं पुनः आपके भवनको जाऊँगा। सर्वज्ञ! आप तो सब कुछ जानते ही हैं;