ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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ग्रीष्मकालीन सूर्यके समान चमकीली शक्ति चलायी, किंतु महाबली अर्जुनने उसे भी अनायास ही काट गिराया। यह देखकर बाणने पाशुपतास्त्रको, जिसकी प्रभा सैकड़ों सूर्योंके समान थी और जो अत्यन्त भयंकर, अमोघ तथा विश्वका संहार करनेवाला था, हाथमें लिया। उसे देखकर चक्रपाणिने अपने भयंकर सुदर्शनचक्रको चला दिया। उस चक्रने रणभूमिमें बाणके हजारों हाथोंको काट डाला और वह भयंकर पाशुपतास्त्र पहाड़ी सिंहकी तरह भूमिपर गिर पड़ा। तदनन्तर जो प्रलयकालीन अग्निकी शिखाके समान प्रकाशमान, लोकमें दारुण तथा अमोघ है; वह पाशुपतास्त्र पशुपति शिवके हाथमें लौट गया। बाणके शरीर-रक्तसे वहाँ भयंकर नदी बह चली और बाण चेष्टारहित होकर भूमिपर गिर पड़ा। उस समय व्यथाके कारण उसकी चेतना नष्ट हो गयी थी। तब जगद्गुरु भगवान् महादेव वहाँ आये और बाणको उठाकर उन्होंने अपनी छातीसे लगा लिया। फिर बाणको लेकर वे वहाँ चले, जहाँ भगवान् जनार्दन विराजमान थे। वहाँ पहुँचकर
उन्होंने पद्माद्वारा समर्चित श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें बाणको समर्पित कर दिया। तत्पश्चात् बलिने जिस वेदोक्त स्तोत्रद्वारा उनकी स्तुति की थी, उसी स्तोत्रद्वारा चन्द्रशेखरने शक्तियोंके स्वामी जगदीश्वर श्रीकृष्णका स्तवन किया। तब श्रीहरिने बुद्धिमान् बाणको 'मृत्युञ्जय' नामक ज्ञान प्रदान किया और उसके शरीरपर अपना कर-कमल फिराकर उसे अजर-अमर बना दिया।
तदनन्तर बाणने बलिकृत स्तोत्रद्वारा भक्तिपूर्वक श्रीहरिका स्तवन किया और उसी देवसमाजमें रत्ननिर्मित आभूषणोंसे विभूषित अपनी श्रेष्ठ कन्या उषाको लाकर भक्तिसहित श्रीकृष्णको प्रदान कर दिया। फिर उसने भक्तिपूर्वक कंधे झुकाकर पाँच लाख गजराज, बीस लाख घोड़े, रत्नाभरणोंसे विभूषित एक हजार दासियाँ, सब कुछ प्रदान करनेवाली बछड़ोंसहित एक सहस्र गौएँ, करोड़ों-करोड़ों मनोहर माणिक्य, मोती, रत्न, श्रेष्ठ मणियाँ और हीरे तथा हजारों सुवर्णनिर्मित जलपात्र एवं भोजनपात्र श्रीकृष्णको दहेजमें दिये। नारद! फिर बाणने शंकरजीकी आज्ञासे सभी तरहके अग्निशुद्ध श्रेष्ठ महीन वस्त्र तथा ताम्बूल और उसकी सामग्रियोंके विविध प्रकारके हजारों श्रेष्ठ पूर्णपात्र भक्तिपूर्ण हृदयसे दहेजमें दिये। तत्पश्चात् कन्याको भी श्रीहरिके चरणकमलोंमें समर्पित करके वह ढाह मारकर रो पड़ा। इस प्रकार उसने वह कार्य सम्पन्न किया। तब श्रीकृष्ण बाणको वेदोक्त मधुर वचनोंद्वारा वरदान देकर शंकरजीकी अनुमतिसे द्वारकापुरीको प्रस्थित हुए। वहाँ पहुँचकर स्वयं श्रीहरिने महात्मा बाणकी उस कन्याको नवोढ़ा (नवविवाहिता वधू) समझकर शीघ्र ही देवकी और रुक्मिणीके हाथों सौंप दिया; फिर यत्नपूर्वक मङ्गल-महोत्सव कराया, ब्राह्मणोंको भोजन कराया और उन्हें बहुत-सा धन-दान किया।
(अध्याय १२०)