ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 791, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ७८१
पूजा लोगोंको शिक्षा देनेके लिये है। शुभे! तुम तो स्वयं ब्रह्मस्वरूपा और श्रीकृष्णके वक्षः-स्थलपर वास करनेवाली हो। ब्रह्मा, शिव और शेष आदि देवगण, सनकादि मुनिवर, जीवन्मुक्त भक्त और कपिल आदि सिद्धशिरोमणि, जिनके अनुपम एवं परम दुर्लभ चरणकमलका निरन्तर ध्यान करते हैं, उन श्रीकृष्णके प्राणोंकी तुम अधिदेवी तथा उनके लिये प्राणोंसे भी बढ़कर परम प्रियतमा हो। श्रीकृष्णके दक्षिणाङ्गसे माधव हैं और वामाङ्गसे राधा प्रादुर्भूत हुई हैं। जगज्जननी महालक्ष्मी तुम्हारे वामाङ्गसे प्रकट हुई हैं। तुम सबके निवासभूत वसुको जन्म देनेवाली, परमेश्वरी, वेदों और लोकोंकी ईश्वरी मूलप्रकृति हो। मातः! इस सृष्टिमें जितनी प्राकृतिक नारियाँ हैं; वे सभी तुम्हारी विभूतियाँ हैं। सारे विश्व कार्यरूप हैं और तुम उनकी कारणरूपा हो। प्रलयकालमें जब ब्रह्माका तिरोभाव हो जाता है; वह श्रीहरिका एक निमेष कहलाता है। उस समय जो बुद्धिमान् योगी पहले राधा, फिर परात्पर कृष्ण अर्थात् राधा-कृष्णका सम्यक् उच्चारण करता है; वह अनायास ही गोलोकमें चला जाता है। इससे व्यतिक्रम करनेपर वह महापापी निश्चय ही ब्रह्महत्याके पापका भागी होता है। तुम लोकोंकी माता और परमात्मा श्रीहरि पिता हैं; परंतु माता पितासे भी बढ़कर श्रेष्ठ, पूज्य, वन्दनीय और परात्पर होती है। इस पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें यदि कोई मन्दमति पुरुष सबके कारणस्वरूप श्रीकृष्ण अथवा किसी अन्य देवताका भजन करता है और राधिकाकी निन्दा करता है तो वह इस लोकमें दुःख-शोकका भागी होता है और उसका वंशच्छेद हो जाता है तथा परलोकमें सूर्य और चन्द्रमाकी स्थितिपर्यन्त वह घोर नरकमें पचता रहता है। ज्ञानका उद्गीरण करने अर्थात् उगलनेके कारण गुरु कहा जाता है; वह ज्ञान मन्त्र-तन्त्रसे प्राप्त होता है; वह मन्त्र और वह तन्त्र तुम दोनोंकी भक्ति है। जब जीव प्रत्येक जन्ममें देवोंके मन्त्रका सेवन करता है तो उसे दुर्गाके परम दुर्लभ चरणकमलमें भक्ति प्राप्त हो जाती है। जब वह लोकोंके कारणस्वरूप शम्भुके मन्त्रका आश्रय ग्रहण करता है, तब तुम दोनों (राधा-कृष्ण)-के अत्यन्त दुर्लभ चरणकमलको प्राप्त कर लेता है। जिस पुण्यवान् पुरुषको तुम दोनोंके दुष्प्राप्य चरणकमलकी प्राप्ति हो जाती है, वह दैववश क्षणार्थ अथवा उसके षोडशांश कालके लिये भी उसका त्याग नहीं करता। जो मानव इस पुण्यक्षेत्र भारतमें किसी वैष्णवसे तुम दोनोंके मन्त्र, स्तोत्र अथवा कर्ममूलका उच्छेद करनेवाले कवचको ग्रहण करके परमभक्तिके साथ उसका जप करता है; वह अपने साथ-साथ अपनी सहस्रों पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। जो मनुष्य विधिपूर्वक वस्त्र, अलंकार और चन्दनद्वारा गुरुका भलीभाँति पूजन करके तुम्हारे कवचको धारण करता है, वह निश्चय ही विष्णु-तुल्य हो जाता है। मात्रः! तुमने जो कुछ वस्तु मुझे समर्पित की है, उस सबको सार्थक कर डालो अर्थात् अब मेरी प्रसन्नताके लिये उसे ब्राह्मणको दे दो। तब मैं उसका भोग लगाऊँगा; क्योंकि देवताको देने योग्य जो दान अथवा दक्षिणा होती है, वह सब यदि ब्राह्मणको दे दी जाय तो वह अनन्त हो जाती है। राधे! ब्राह्मणोंका मुख ही देवताओंका प्रधान मुख है; क्योंकि ब्राह्मण जिस पदार्थको खाते हैं, वही देवताओंको मिलता है*। मुने! तब सती राधिकाने वह सारा पदार्थ ब्राह्मणोंको खिला दिया; इससे गणेश तत्काल ही प्रसन्न हो गये।
* ब्राह्मणानां मुखं राधे देवानां मुखमुख्यकम्। विप्रभुक्तं च यद् द्रव्यं प्राप्नुवन्त्येव देवताः॥
(१२२।२३)