ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 792, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ें७८२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
इसी समय ब्रह्मा, शिव और शेषनाग आदि देवता देवश्रेष्ठ गणेशका पूजन करनेके लिये उस वट-वृक्षके नीचे आये। तब एक शिवदूत वहाँ जाकर उन देवताओं तथा देवियोंसे यों कहने लगा।
रक्षक (शिवदूत)-ने कहा— देवगण! वृषभानुसुता राधाने मुझे हटाकर शुभ मुहूर्तमें स्वस्तिवाचन करके सर्वप्रथम गणेशकी पूजा की है। पूजनमें ऐसा कहा जाता है कि जो सर्वप्रथम पूजन करता है, वह अनन्त फलका भागी होता है और मध्यमें पूजा करनेवालेको मध्यम तथा अन्तमें पूजनेवालेको स्वल्प पुण्य प्राप्त होता है। ऐसा दशामें बहुत-से देवशिरोमणियों, मुनिवरों और देवाङ्गनाओंके रहते हुए उस राधाने गोपियोंके साथ देवश्रेष्ठ गणेशकी पूजा की है।
दूतकी बात सुनकर सभी देवताओं, मुनियों मनुओं और राजाओंका समुदाय तथा देवाङ्गनाएँ हँसने लगीं। वहाँ जो रुक्मिणी आदि महिलाएँ तथा देवियाँ थीं, उन्हें महान् विस्मय हुआ। तत्पश्चात् सावित्री, सरस्वती, परमेश्वरी पार्वती, रोहिणी, सती-संज्ञक स्वाहा आदि देवाङ्गनाएँ तथा सभी पतिव्रता मुनिपत्नियां वहाँ आयीं। फिर सभी देवताओं, मुनियों, मनुओं तथा मनुष्योंका दल, गणसहित श्रीकृष्ण तथा अन्याय जो वहाँ उपस्थित थे, उन सभी लोगोंने हर्षपूर्वक पदार्पण किया। तत्पश्चात् उन सबने शुभ मुहूर्तमें बलवान् और दुर्बलके क्रमसे पृथक्-पृथक् विविध द्रव्योंद्वारा गणेशकी पूजा की। इस प्रकार पूजन करके वे सभी सुखासनपर विराजमान हुए। इसी समय पार्वती परम हर्षके साथ राधाके स्थानपर गयीं। पार्वतीको आयी हुई देखकर राधा उतावलीके साथ अपने आसनसे उठ खड़ी हुईं और हर्षमग्न हो उनसे सादर यथायोग्य कुशल-समाचार पूछने लगीं। तत्पश्चात् परस्पर आलिङ्गन और स्नेह-प्रदर्शन किया गया। तब दुर्गा राधाको अपनी छातीसे लगाकर मधुर वचन बोलीं।
पार्वतीने कहा— राधे! मैं तुमसे क्या कुशल-प्रश्न करूँ; क्योंकि तुम तो स्वयं ही मङ्गलोंकी आश्रय-स्थान हो। श्रीदामाके शापसे मुक्त हो जानेपर अब तुम्हारी विरहज्वाला भी शान्त ही हो गयी। जैसे मेरे मन-प्राण तुममें वास करते हैं; वैसे ही तुम्हारे मुझमें लगे रहते हैं। इस प्रकार शक्ति और पुरुषकी भाँति हम दोनोंमें कोई भेद नहीं है। जो मेरे भक्त होकर तुम्हारी और तुम्हारे भक्त होकर मेरी निन्दा करते हैं; वे चन्द्रमा और सूर्यके स्थितिकालपर्यन्त कुम्भीपाकमें पचते रहते हैं। जो नराधम राधा और माधवमें भेद-भाव करते हैं, उनका वंश नष्ट हो जाता है और वे चिरकालतक नरकमें यातना भोगते हैं*। इसके बाद साठ हजार वर्षोंतक वे विष्ठाके कीड़े होते हैं, फिर अपनी सौ पीढ़ियोंसहित सूकरकी योनिमें उत्पन्न होते हैं। सर्वपूज्य पुत्र गणेश्वरकी तुमने ही सर्वप्रथम पूजा की है; मैं वैसा नहीं कर पायी हूँ। यह गणेश जैसे तुम्हारा है, वैसे ही मेरा भी है। देवि! दुग्ध और उसकी धवलताके समान राधा और माधवमें जीवनपर्यन्त कभी विच्छेद नहीं होगा। पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें स्थित इस महातीर्थ सिद्धाश्रममें विघ्नविनाशक गणेशकी भलीभाँति पूजा करके तुम बिना किसी विघ्न-बाधाके गोविन्दको प्राप्त करो। तुम रसिका-रासेश्वरी हो और श्रीकृष्ण रसिकशिरोमणि हैं; अतः तुम नायिकाका रसिक नायकके साथ समागम गुणकारी होगा। सती राधे! सौ वर्षके बाद तुम श्रीदामाके शापसे मुक्त
* ये त्वां निन्दन्ति मद्भक्तास्त्वद्भक्ताश्चापि मामपि। कुम्भीपाके च पच्यन्ते यावच्चन्द्रदिवाकरौ॥
राधामधवयोर्भेदं ये कुर्वन्ति नराधमाः। वंशहानिर्भवेत्तेषां पच्यन्ते नरके चिरम्॥
(१२२। ४४-४५)