भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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श्रीकृष्णजन्मखण्ड

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हुई हो; अतः आज मेरे वरदानसे तुम श्रीकृष्णके साथ मिलो! सुन्दरि! मेरी दुर्लभ आज्ञा मानकर तुम अपना उत्तम शृङ्गार करो।

तब पार्वतीकी आज्ञासे प्यारी सखियाँ राधाका शृङ्गार करनेमें जुट गयीं। उन्होंने ईश्वरी राधाको रमणीय रत्नसिंहासनपर बैठाया। फिर तो सखी रत्नमालाने सामनेसे आकर राधाके गलेमें रत्नोंकी माला पहना दी और उनके दाहिने हाथमें मनोहर क्रीड़ा-कमल रख दिया। पद्ममुखीने उनके दोनों चरणकमलोंको महावरसे सुशोभित किया। सुन्दरी गोपीने चन्दनयुक्त सिन्दूरकी परम रुचिर बेंदीसे सीमन्तके अधोभाग—ललाटको सुशोभित किया। सती मालतीने मालतीकी मालाओंसे विभूषित करके ऐसी मनभावनी रमणीय कबरी गूँथकर तैयार की जो मुनियोंके भी मनको मोहे लेती थी। फिर कपोलोंपर कस्तूरी और कुंकुममिश्रित चन्दनसे सुन्दर पत्रभङ्गीकी रचना की। मालावतीने राधाको सुन्दर चम्पाके पुष्पोंकी मनोहर गन्धवाली माला और खिली हुई नवमल्लिका प्रदान की। रति-कार्योंमें रसका ज्ञान रखनेवाली गोपीने परम श्रेष्ठ नायिका राधाको रत्नाभरणोंसे विभूषित करके रति-रसके लिये उत्सुक बनाया। सती ललिताने उनके शरत्कालीन कमल-दलके समान विशाल नेत्रोंको काजलसे आँजकर सुहावनी साड़ी पहननेको दी और महेन्द्रद्वारा दिये गये पारिजातके सुगन्धित पुष्पको उनके हाथमें दिया। सती गोपिका सुशीलाने पतिके पास जाकर किस प्रकार सुशील एवं मधुर यथोचित वचन कहना चाहिये—ऐसी नीतियुक्त शिक्षा दी। राधाकी माता कलावतीने विपत्तिकालमें विस्मृत हुई स्त्रियोंकी षोडश कलाओंका स्मरण कराया। बहिन सुधामूखीने शृङ्गार-विषयसम्बन्धी अमृतोपम वचनकी ओर ध्यान आकर्षित किया। कमलाने शीघ्र ही कमल और चम्पाके चन्दनचर्चित पत्तेपर कोमल रति-शय्या सजायी। स्वयं सती चम्पावतीने चम्पाके सुन्दर पुष्पको चन्दनसे अनुलिप्त करके श्रीकृष्णके लिये दोनेमें सजाकर रखा। फिर उसने श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये केलि-कदम्बोंका पुष्प, मनोहर स्तवक (गुलदस्ता) और कदम्ब-पुष्पोंकी माला तैयार की। कृष्णप्रियाने श्रीकृष्णके लिये कपूर आदिसे सुवासित श्रेष्ठ एवं रुचिर पान तथा सुगन्धित जल उपस्थित किया। इसी समय देवताओं तथा मुनियोंने देखा कि जल-स्थलसहित सारा आश्रम गोरोचनके समान उद्भासित हो रहा है। उस समय तीनों लोकोंमें वास करनेवाले सभी लोगोंने राधिकाके दर्शन किये।

जिनके शरीरकी कान्ति श्वेत चम्पकके समान परम मनोहर एवं अनुपम है; जो ऊर्ध्वरेता मुनियोंके भी मनोंको मोहमें डाल देती हैं; जो सुन्दर केशोंवाली, सुन्दरी, षोडशवर्षीया और वटवृक्षके नीचे मण्डलमें वास करनेवाली हैं; जिनका मुख करोड़ों चन्द्रमाओंकी छबिको छीने लेता है; जो सदा मुस्कराती रहती हैं, जिनके दाँत बड़े सुन्दर हैं; जिनके शरत्कालीन कमलके समान विशाल नेत्र कज्जलसे सुशोभित रहते हैं; जो महालक्ष्मी, बीजरूपा, परमाद्या, सनातनी और परमात्मस्वरूप श्रीकृष्णके प्राणोंकी अधिष्ठातृदेवता हैं; परमात्माकी प्राप्तिके लिये जिनकी स्तुति-पूजा की जाती है; जो परा, ब्रह्मस्वरूपा निर्लिप्ता, नित्यरूपा, निर्गुणा, विश्वके अनुरोधसे प्रकृति, भक्तानुग्रहमूर्ति, सत्यस्वरूपा, शुद्ध, पवित्र, पतित-पावनी, उत्तम तीर्थोंको पावन करनेवाली, सत्कीर्तिसम्पन्ना, ब्रह्माकी भी विधाती, महाप्रिया, महती, महाविष्णुकी माता, रासेश्वरकी स्वामिनी, सुन्दरी नायिका, रसिकेश्वरी, अग्निशुद्ध वस्त्र धारण करनेवाली, स्वेच्छारूपा और मङ्गलकी आलय हैं; सात गोपियाँ श्वेत चँवर डुलाकर जिनकी निरन्तर सेवा करती रहती हैं, चार प्यारी सखियाँ जिनके चरणकमलकी सेवामें तत्पर रहती हैं, अमूल्य रत्नोंके बने हुए आभूषण जिनकी

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