ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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शोभा बढ़ा रहे हैं, दोनों मनोहर कुण्डलोंसे जिनके कर्ण और कपोल उद्भासित हो रहे हैं और जिनकी सुन्दर नासिकामें गजमुक्ता लटक रही है, जो गरुड़की चोंचका उपहास करनेवाली है; जिनका शरीर कुंकुम-कस्तूरीमिश्रित सुस्निग्ध चन्दनसे चर्चित है, जिनके कपोल सुन्दर और अङ्ग कोमल हैं; जो कामुकी, गजराजकी-सी चालवाली, कमनीया एवं सुन्दरी नायिका, कामदेवके अस्त्रकी विजयस्वरूपा, कामकी कामनाका लय करनेवाली तथा श्रेष्ठ हैं; जिनके हाथमें प्रफुल्ल क्रीड़ा-कमल, पारिजातका पुष्प और अमूल्य रत्नजटित स्वच्छ दर्पण शोभा पाते हैं; जो नाना प्रकारके रत्नोंकी विचित्रतासे युक्त रत्नसिंहासनपर विराजमान होती हैं, जो परमात्मा श्रीकृष्णके पद्माद्वारा समर्चित मङ्गलस्वरूप चरणकमलका अपने हृदयकमलमें ध्यान करती रहती हैं तथा मन-वचन-कर्मसे स्वप्न अथवा जाग्रत् कालमें श्रीकृष्णकी प्रीति और प्रेम-सौभाग्यका नित्य नूतन रूपमें स्मरण करती रहती हैं; जो प्रगाढ़भावानुरक्त, शुद्धभक्त, पतिव्रता, धन्या, मान्या, गौरवार्णा, निरन्तर श्रीकृष्णके वक्षःस्थलपर वास करनेवाली, प्रियाओं तथा प्रिय भक्तोंमें परम प्रिय, प्रियवादिनी, श्रीकृष्णके वामाङ्गसे आविर्भूत, गुण और रूपमें अभिन्न, गोलोकमें वास करनेवाली, देवाधिदेवी, सबके ऊपर विराजमान, गोपीश्वरी, गुप्तिरूपा, सिद्धिदा, सिद्धिरूपिणी, ध्यानद्वारा असाध्य, दुराराध्य, सद्भक्तोंद्वारा वन्दित और पुण्यक्षेत्र भारतमें वृषभानु-नन्दिनीके रूपमें प्रकट हुई हैं; उन राधाकी मैं वन्दना करता हूँ। जो ध्यानपरायण मानव समाधि-अवस्थामें ध्याननिष्ठ हो राधाका ध्यान करते हैं; वे इस लोकमें तो जीवन्मुक्त हैं ही, परलोकमें श्रीकृष्णके पार्षद होते हैं। तदनन्तर लोकोंके विधाता स्वयं ब्रह्माने ब्रह्माओंकी जननी परमेश्वरी राधाको देखकर सर्वप्रथम स्तुति करना आरम्भ किया।
ब्रह्मा बोले—परमेश्वरि! मेरा चित्त तुम्हारे पादपद्मके मधुर मधुमें लुब्ध हो गया था; अतः उस मधुव्रतके लोभसे प्रेरित होकर मैंने पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें स्थित पुष्करतीर्थमें जाकर साठ हजार दिव्य वर्षोंतक तपस्या की; तथापि तुम्हारा अभीष्ट चरणकमल मुझे प्राप्त नहीं हुआ। यहाँतक कि मुझे स्वप्नमें भी उसका दर्शन नहीं हुआ। तब उस समय यों आकाशवाणी हुई—'ब्रह्मन्! वाराहकल्पमें भारतवर्षमें वृन्दावन नामक पुण्यवनमें स्थित 'सिद्धाश्रम' में तुम्हें गणेशके चरणकमलका दर्शन होगा। तुम तो विषयी हो, अतः तुम्हें राधा-माधवकी दासता कहाँसे प्राप्त होगी? इसलिये महाभाग! तुम उससे निवृत्त हो जाओ; क्योंकि वह परम दुर्लभ है।' यों सुनकर मेरा मन टूट गया और मैं उस तपस्यासे विरत हो गया। पर उस तपस्याके फलस्वरूप मेरा वह मनोरथ आज परिपूर्ण हो गया।
श्रीमहादेवजीने कहा—देवि! ब्रह्मा आदि देवता, मुनिगण, मनु, सिद्ध, संत और योगीलोग ध्याननिष्ठ हो जिनके चरणकमलका, जो पद्माद्वारा कमल-पुष्पोंसे समर्चित एवं अत्यन्त दुर्लभ है, निरन्तर ध्यान करते रहते हैं; परंतु स्वप्नमें भी उसका दर्शन नहीं कर पाते, तुम उन्हींके वक्षः-स्थलपर वास करनेवाली हो।
अनन्त बोले—सुव्रते! वेद, वेदमाता, पुराण, मैं (शेषनाग), सरस्वती और संतगण तुम्हारी स्तुति करनेमें समर्थ नहीं हैं।
नारद! इस प्रकार वहाँ जितने देव, देवी तथा अन्यान्य मुनि,मनु आदि आये थे, उन सबने विनम्रभावसे राधाका स्तवन किया। यह देखकर रुक्मिणी आदि महिलाओंका मुख लज्जासे झुक गया। उन्होंने अपने शोकोच्छ्वाससे रत्नदर्पणको मलिन कर दिया। निराहारा कृशोदरी सत्यभामा तो मृतक-तुल्य हो गयी, उसके मनका सारा गर्व गल गया।
(अध्याय १२३)