भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 795, कुल 810 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 795

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७८५

वसुदेवजीका शंकरजीसे भव-तरणका उपाय पूछना, शंकरजीका उन्हें ज्ञानोपदेश देकर राजसूय-यज्ञ करनेका आदेश देना, वसुदेवजीद्वारा राजसूय-यज्ञका अनुष्ठान और यज्ञान्तमें सर्वस्व दक्षिणामें देकर उनका द्वारकाको लौटना

नारदजीने पूछा—विभो! गणेशपूजन और राधास्तोत्रसे बढ़कर वहाँ कौन-सी रहस्यमयी घटना घटित हुई; उसका मुझसे विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये।

श्रीभगवान् बोले—नारद! गणेशपूजन-तीर्थमें जितने देवता, मुनि और योगीन्द्र पधारे हुए थे; वे सभी वटवृक्षके नीचे समासीन थे। उनमेंसे शम्भु, ब्रह्मा, शेषनाग और श्रेष्ठ मुनियोंसे वसुदेव और देवकीने परमादरपूर्वक यों प्रश्न किया—'हे महाभाग! आपलोग दीनोंके बन्धु हैं; अतः शीघ्र ही बताइये कि हम दीनोंके लिये इस भवसागरसे पार करनेवाला कौन-सा उत्तम साधन है? आपलोग भवसागरसे पार करनेवाली नौकाके नाविक हैं; क्योंकि न तो तीर्थ ही केवल जलमय हैं और न देवगण ही केवल मिट्टी और पत्थरकी मूर्तिमात्र होते हैं। जितने यज्ञ, पुण्य, व्रत-उपवास, तप, अनेकविध दान, विप्रों और देवताओंकी अर्चनाएँ हैं; ये सभी चिरकालमें कर्ताको पावन बनाती हैं; परंतु वैष्णवजन दर्शनसे ही पवित्र कर देते हैं। विष्णुभक्त संतोंके पावन चरणकमलोंकी रजके स्पर्शमात्रसे वसुन्धरा तत्काल ही पावन हो जाती है और तीर्थ, समुद्र तथा पर्वत भी पवित्र हो जाते हैं। देवगण भी उन वैष्णवोंके पातकरूपी ईंधनका विनाश कर देनेवाले दर्शनकी अभिलाषा करते हैं। जैसे दूध, दही और रस परम स्वादिष्ट होते हैं; उसी प्रकार ज्ञान परमानन्ददायक होता है। उस ज्ञानको जो ज्ञानीके साहचर्यसे नहीं समझ पाता, वह अज्ञानी है। ज्ञानियोंके गुरुके भी गुरु भगवन्! जैसे मैं श्रीकृष्णका पिता और चिरकालका सङ्गी हूँ; उसी तरह देवकी भी उनकी माता है। वसुदेवजीकी बात सुनकर स्वयं भगवान् शंकर, जो चारों वेदोंके भी जनक एवं गुरु हैं, हँस पड़े और इस प्रकार बोले।'

श्रीमहादेवजीने कहा—अहो! ज्ञानियोंके संनिकट रहना भी उनके अनादरका ही कारण होता है; जैसे गङ्गाके जलसे पवित्र हुए लोग भी (गङ्गाका अनादर करके) सिद्धिके लिये अन्य तीर्थोंमें जाते हैं। वासुदेवके पिता ये वसुदेव स्वयं पण्डित हैं और अपने पिता वसुस्वरूप ज्ञानी कश्यपके अंशसे उत्पन्न हुए हैं। इनकी श्रीकृष्णमें पुत्र-बुद्धि है; इसीलिये ये श्रीकृष्णके अङ्गभूत हमलोगोंसे ज्ञान पूछ रहे हैं।

तदनन्तर श्रीमहादेवजीने सर्वकारणकारण भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन करके कहा—'यदुवंशी वसुदेव! सर्वेश्वर श्रीकृष्ण ही सबके मूलरूप हैं; अतः राजसूय-यज्ञका अनुष्ठान करके उसमें अपने पुत्र श्रीकृष्णकी, जो यज्ञके कारण एवं यज्ञेश हैं, समर्चन करो; फिर विधिपूर्वक दक्षिणा देकर भवसागरसे पार हो जाओ।'

मुने! शिवजीका कथन सुनकर जितेन्द्रिय वसुदेवजीने सामग्री जुटाकर शुभ मुहूर्तमें राजसूय-यज्ञका अनुष्ठान किया। उस यज्ञमें साक्षात् यज्ञेश और दक्षिणासहित ये यज्ञ वर्तमान थे; अतः देवताओंने साक्षात् प्रकट होकर वसुदेवजीके हव्यको ग्रहण किया। तदनन्तर जब वसुदेवजी पूर्णाहूति दे चुके; तब श्रीकृष्णकी आज्ञासे भगवान् सनत्कुमारने उनसे सर्वस्व दक्षिणामें देनेके लिये कहा। तब जिनके नेत्र और मुख प्रफुल्लित थे; उन वसुदेवजीने श्रीसनत्कुमारजीके आदेशानुसार ब्राह्मणोंको सर्वस्व दक्षिणारूपमें प्रदान कर दिया और ब्राह्मणोंके शुभ मुखोंद्वारा देवताओंको तृप्त