भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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७८६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

किया। तत्पश्चात् देवगण और मुनिसमुदाय उस रातमें अपनी पत्नियोंके साथ वहाँ सुखपूर्वक रहे और प्रातःकाल होनेपर वे सभी श्रीकृष्णकी अनुमतिसे अपने-अपने स्थानको चले गये। तब सभी यदुवंशी भी रुक्मिणीकी दृष्टि पड़नेसे अमूल्य रत्नोंसे परिपूर्ण एवं श्रीकृष्णद्वारा सुरक्षित द्वारकाको प्रस्थान कर गये।

(अध्याय १२४)


राधा और श्रीकृष्णका पुनः मिलाप, राधाके पूछनेपर श्रीकृष्णद्वारा अपना तथा राधाका रहस्योद्घाटन

**श्रीनारायण कहते हैं—**नारद! इस प्रकार माधवने यादवों, देवों, मुनियों तथा अन्यान्य व्यक्तियों और देवियोंके साथ गणेश-पूजनका कार्य सम्पन्न किया। तत्पश्चात् वे अपने एक अंशसे रुक्मिणी आदि देवियोंके साथ रमणीय द्वारकापुरीको चले गये; किंतु स्वयं साक्षात्रूपसे सिद्धाश्रममें ही ठहर गये। वहाँ वे गोलोकवासी गोप-सखाओं, नन्द तथा माता यशोदा-गोपीके साथ प्रेमपूर्वक वार्तालाप करके पुनः माता, पिता, गोकुलवासी गोपों तथा बन्धुवर्गोंसे नीतियुक्त यथोचित वचन बोले।

**श्रीभगवान्ने कहा—**पिताजी! अब अपने व्रजको लौट जाओ। परम श्रेष्ठ यशस्विनी माता यशोदे! तुम भी उत्तम गोकुलको जाओ और वहाँ आयुके शेष कालपर्यन्त भोगोंका उपभोग करो। इतना कहकर भगवान् श्रीकृष्ण माता-पिताकी आज्ञा ले राधिकाके स्थानको चले गये तथा नन्दजी गोकुलको प्रस्थित हुए। वहाँ पहुँचकर श्रीकृष्णने मुस्कराती हुई सुन्दरी राधाको देखा। उनकी तरुणता नित्य स्थिर रहनेवाली थी, जिससे उनकी अवस्था द्वादश वर्षकी थी। मोतियोंका हार उनकी शोभा बढ़ा रहा था; वे रत्ननिर्मित ऊँचे आसनपर विराजमान थीं। उस समय मुस्कराती हुई असंख्य गोपियाँ हाथोंमें बेंत लिये उन्हें घेरे हुए थीं।

उधर प्राणवल्लभा राधाने भी दूरसे ही श्रीकृष्णको आते देखा। उनका परम सौन्दर्यशाली सुन्दर बालक-वेष था। वे मन्द-मन्द मुस्करा रहे थे। उनके शरीरकी कान्ति नवीन मेघके समान श्याम थी; वे रेशमी पीताम्बर धारण किये हुए थे; उनका सर्वाङ्ग चन्दनसे अनुलिप्त था; रत्नोंके आभूषण उन्हें सुशोभित कर रहे थे; उनकी शिखामें मयूर-पिच्छ शोभा दे रहा था; वे मालतीकी मालासे विभूषित थे; उनका प्रसन्नमुख मन्द हास्यकी छटा बिखेर रहा था; वे साक्षात् भक्तानुग्रहमूर्ति थे तथा मनोहर प्रफुल्ल क्रीड़ाकमल लिये हुए थे; उनके एक हाथमें मुरली और दूसरे हाथमें सुप्रशस्त दर्पण शोभा पा रहा था। उन्हें देखकर राधा तुरंत ही गोपियोंके साथ उठ खड़ी हुईं और परम भक्तिपूर्वक उन परमेश्वरको सादर प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगीं।

**राधिका बोलीं—**नाथ! तुम्हारे मुखचन्द्रको देखकर आज मेरा जन्म लेना सार्थक और जीवन धन्य हो गया तथा मेरे नेत्र और मन परम प्रसन्न हो गये। पाँचों प्राण स्नेहार्द्र और आत्मा हर्षविभोर हो गया; दुर्लभ बन्धुदर्शन दोनों (द्रष्टा और दृश्य)-के हर्षका कारण होता है। विरहाग्निसे जली हुई मैं शोकसागरमें डूब रही थी। तुमने अपनी पीयूषवर्षिणी दृष्टिसे मेरी ओर निहारकर मुझे भलीभाँति अभिषिक्त कर दिया; जिससे मेरा ताप जाता रहा। तुम्हारे साथ रहनेपर मैं शिवा, शिवप्रदा, शिवबीजा और

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