ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड
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शिवस्वरूपा हूँ; किंतु तुमसे वियुक्त हो जानेपर मैं अदृष्ट हो जाती हूँ और मेरी सारी चेष्टाएँ नष्ट हो जाती हैं। तुम्हारे समीप स्थित रहनेपर देह शोभासम्पन्न, पवित्र और सर्वशक्तिस्वरूप दीखता है; परंतु तुम्हारे चले जानेपर वह शवरूप हो जाता है। नाथ! स्त्री-पुरुषका सामान्य वियोग भी अत्यन्त दारुण होता है। यहाँ तो परमात्माके वियोगसे पाँचों प्राण शक्तियोंके सहित ही निकल जाते हैं।
यों कहकर देवी राधिकाने परमात्मा श्रीकृष्णको अपने आसनपर बैठाया और हर्षपूर्वक उनके चरणोंकी पूजा की। तत्पश्चात् शोभाशाली श्रीकृष्ण राधाके साथ रत्नसिंहासनपर विराजमान हुए। उस समय गोपियाँ निरन्तर श्वेत चँवर डुलाकर उनकी सेवा कर रही थीं। चन्दनाने श्रीहरिके शरीरमें सुगन्धित चन्दनका अनुलेप किया। मुस्कराती हुई रत्नमालाने श्रीहरिके गलेमें रत्नमाला पहनायी। सती पद्मावतीने पद्माद्वारा कमल-पुष्पोंसे समर्चित चरणकमलमें जल, दूब, पुष्प और चन्दनयुक्त अर्घ्य प्रदान किया। मालतीने श्रीहरिकी चूड़ाको मालतीकी मालासे सुशोभित किया। सती पार्वतीने चम्पाके पुष्पका पुटक समर्पित किया। पारिजाताने हर्षमग्न हो श्रीहरिको पारिजात-पुष्प, कपूरयुक्त ताम्बूल और सुवासित शीतल जल निवेदित किया। कदम्बमालाने कदम्ब-पुष्पोंकी शुभ माला, प्रफुल्लित क्रीड़ा-कमल और अमूल्य रत्नदर्पण समर्पित किया। सुकोमला कमलाने पूर्वकालमें वरुणद्वारा दिये हुए दोनों सुन्दर वस्त्रोंको श्रीहरिके हाथमें ही रख दिया। सुन्दरी वधूने साक्षात् श्रीहरिको गोरोचनकी-सी आभावाले एवं मधुर मधुसे परिपूर्ण मधुपत्र दिया। सुधामुखीने भक्तिपूर्वक अमृतसे लबालब भरा हुआ अमृतपात्र प्रदान किया। किसी दूसरी गोपीने प्रफुल्लित मालती-पुष्पोंके मालाजालसे विभूषित एवं चन्दनचर्चित पुष्पशय्या तैयार की। वह शय्या एक ऐसे परम मनोहर भवनमें सजायी गयी थी, जिसका निर्माण बहुमूल्य रत्नोंके सारभागसे हुआ था; श्रेष्ठ मणि, मोती, माणिक्य और हीरोंके हार जिसकी विशेष शोभा बढ़ा रहे थे; कस्तूरी और कुंकुमयुक्त वायु जिसे सुगन्धित बना रही थी; जलते हुए सैकड़ों रत्नदीपोंसे जो उद्दीप्त हो रहा था और नाना प्रकारकी वस्तुओंसे समन्वित धूपोंद्वारा जो निरन्तर धूपित रहता था। वहाँ रतिकरी शय्याका निर्माण करके गोपियाँ हँसती हुई चली गयीं। तब एकान्तमें मनको आकर्षित करनेवाली उस परम रमणीय शय्याको देखकर राधा-माधव उसपर विराजमान हुए। उस समय सती राधाने माधवके गलेमें माला पहनायी, मुखमें सुवासित ताम्बूलका बीड़ा दिया; फिर श्यामसुन्दरके वक्षःस्थलपर कस्तूरी-कुंकुमयुक्त चन्दनका अनुलेप किया, उनकी शिखामें चम्पाका सुन्दर पुष्प लगाया, हाथमें सहस्रदलयुक्त क्रीड़ा-कमल दिया और उनके हाथसे मुरली छीनकर उसमें रत्नदर्पण पकड़ा दिया तथा उनके आगे पारिजातका खिला हुआ रुचिर पुष्प रख दिया। तत्पश्चात् जो शान्तिमूर्ति, कमनीय और नायिकाके मनको हर लेनेवाले हैं तथा मन्द-मन्द मुस्करा रहे थे; उन प्रियतम श्रीकृष्णसे राधा एकान्तमें मुस्कराती हुई मधुर वचन बोलीं।
**श्रीराधिकाने कहा—**नाथ! जो स्वयं मङ्गलोंका भण्डार, सम्पूर्ण मङ्गलोंका कारण, मङ्गलरूप तथा मङ्गलोंका प्रदाता है, उसके विषयमें कुशल-मङ्गलका प्रश्न करना तो निष्फल ही है; तथापि इस समय कुशल पूछना समयानुसार उचित है; क्योंकि लौकिक व्यवहार वेदोंसे भी बली माना जाता है। इसलिये रुक्मिणीकान्त! सत्यभामाके प्राणपति! इस समय