भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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७८८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

कुशल तो है न ? तदनन्तर श्रीराधाने भगवान् श्रीकृष्णसे उनके स्वरूप तथा अवतार-लीलाके सम्बन्धमें प्रश्न किया।

तब श्रीकृष्ण बोले—राधे! जिसे सुनकर मूर्ख हलवाहा भी तत्काल ही पण्डित हो जाता है, उस सर्वश्रेष्ठ आध्यात्मिक ज्ञानका मैं वर्णन करता हूँ, सुनो। राधे! मैं स्वभावसे ही सब लोकोंका स्वामी हूँ, फिर रुक्मिणी आदि महिलाओंकी तो बात ही क्या है। मैं कार्य-कारणरूपसे पृथक्-पृथक् व्यक्त होता हूँ। मैं स्वयं ज्योतिर्मय हूँ, समस्त विश्वोंका एकमात्र आत्मा हूँ और तृणसे लेकर ब्रह्मापर्यन्त सम्पूर्ण प्राणियोंमें व्यास हूँ। गोलोकमें मैं स्वयं परिपूर्णतम श्रीकृष्णरूपसे वर्तमान रहता हूँ और रमणीय क्षेत्र गोकुलके 'वृन्दावन' नामक वनमें मैं ही राधापति हूँ। उस समय मैं द्विभुज होकर गोपवेषमें शिशुरूपसे क्रीड़ा करता हूँ; ग्वाले, गोपियाँ और गौएँ ही मेरी सहायक होती हैं। वैकुण्ठमें मैं चतुर्भुजरूपसे रहता हूँ; वहाँ मैं ही लक्ष्मी और सरस्वतीका प्रियतम हूँ और सदा शान्तरूपसे वास करता हूँ। इस प्रकार मैं सनातन परमेश्वर ही दो रूपोंमें विभक्त हूँ। भूतलपर, श्वेतद्वीप और क्षीरसागरमें मानसी, सिन्धुकन्या और मर्त्यलक्ष्मीके जो पति हैं, वह भी मैं ही हूँ और वहाँ भी मैं चतुर्भुजरूपसे ही रहता हूँ। मैं स्वयं नारायण ऋषि हूँ और धर्मवक्ता, धर्मिष्ठ तथा धर्म-मार्गके प्रवर्तक सनातन धर्म नर हैं। धर्मिष्ठा तथा पतिव्रता शान्ति लक्ष्मीस्वरूपा है और इस पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें मैं उसका पति हूँ। मैं ही सिद्धेश्वर, सिद्धियोंके दाता और साक्षात् कपिल हूँ। सुन्दरि! इस प्रकार व्यक्तिभेदसे मैं नाना रूप धारण करता हूँ। चतुर्भुजरूपधारी मैं ही सदा द्वारकामें रुक्मिणीका स्वामी होता हूँ, क्षीरसागरमें शयन करनेवाला मैं ही सत्यभामाके शुभ भवनमें वास करता हूँ तथा अन्यान्य रानियोंके महलोंमें मैं ही पृथक्-पृथक् शरीर धारण करके क्रीड़ा करता हूँ। मैं नारायण ऋषि ही इस अर्जुनका सारथि हूँ। अर्जुन नर-ऋषि है, धर्मका पुत्र है, बलवान् है और मेरे अंशसे भूतलपर उत्पन्न हुआ है। उसने पुष्करक्षेत्रमें सारथि-कार्यके लिये तपस्याद्वारा मेरी आराधना की है।

राधे! जैसे तुम गोलोकमें राधिकादेवी हो, उसी तरह गोकुलमें भी हो। तुम्हीं वैकुण्ठमें महालक्ष्मी और सरस्वती हो। क्षीरोदशायीकी प्रियतमा मर्त्यलक्ष्मी तुम्हीं हो। धर्मकी पुत्रवधू लक्ष्मीस्वरूपिणी शान्तिके रूपमें तुम्हीं वर्तमान हो। भारतवर्षमें कपिलकी प्यारी पत्नी सती भारती तुम्हारा ही नाम है। तुम्हीं मिथिलामें सीता नामसे विख्यात हो। सती द्रौपदी तुम्हारी ही छाया है। द्वारकामें महालक्ष्मीके अंशसे प्रकट हुई सती रुक्मिणीके रूपमें तुम्हीं वास करती हो। पाँचों पाण्डवोंकी पत्नी द्रौपदी तुम्हारी कला है। तुम्हीं रामकी पत्नी सीता हो; रावणने तुम्हारा ही अपहरण किया था। सति! जैसे तुम अपनी छाया और कलासे नाना रूपोंमें प्रकट हो, वैसे ही मैं भी अपने अंश और कलासे अनेक रूपोंमें व्यक्त हूँ। मैं ही परिपूर्णतम परात्पर परमात्मा हूँ। सती राधे! इस प्रकार मैंने तुम्हें यह सारा आध्यात्मिक ज्ञान बता दिया। परमेश्वरि! अब तुम मेरे सारे अपराधोंको क्षमा कर दो। श्रीकृष्णका कथन सुनकर राधिका तथा सभी गोपिकाओंको महान् हर्ष हुआ। वे सभी परमेश्वर श्रीकृष्णको प्रणाम करने लगीं। (अध्याय १२५)