भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७८९

श्रीकृष्णका राधाके साथ विभिन्न स्थलोंमें विहार करके पुनः गोकुलमें जाना, वहाँ उनका स्वागत-सत्कार, यशोदाका राधसहित श्रीकृष्णको महलमें ले जाना और मङ्गल-महोत्सव करना

तदनन्तर राधिकाने कहा—महाभाग! अब पुण्यमय वृन्दावनमें स्थित रासमण्डलको चलिये; वहाँ मैं आपके साथ जलमें तथा स्थलपर क्रीड़ा करूँगी। पुनः मलयपर्वत और सुन्दर मणिमन्दिरको चलूँगी। इनके अतिरिक्त जो दूसरे रहस्यमय स्थान हैं, जिन्हें मैंने जन्मसे लेकर आजतक सुना ही नहीं है; उन-उन स्थानोंमें भी आपके साथ चलूँगी—ऐसी मेरी उत्कृष्ट लालसा है।

यों परस्पर वार्तालाप करते ही वह मङ्गलमयी रात्रि व्यतीत हो गयी। अरुणोदय बेला आ पहुँची तथापि सती राधाने माधवको छोड़ना नहीं चाहा। तब श्रीकृष्णने युक्तिपूर्वक प्रेमभरे वचनोंसे राधाको समझाया। तदनन्तर शरत्कालीन कमलके-से विशाल नेत्रोंवाले श्रीहरि प्रातःकृत्य समाप्त करके राधा तथा गोपियोंके साथ एक ऐसे रथपर सवार हुए, जो गोलोकसे आया था। वह मनोहर तथा मनके समान वेगशाली रथ एक योजन लंबा-चौड़ा था, उसमें सहस्रों पहिये लगे थे, बहुमूल्य मणियोंके बने हुए तीन सौ करोड़ चमकीले गृहोंसे वह सुशोभित था, तीन करोड़ मणिस्तम्भों और रत्नोंकी झालरोंसे उसकी विशेष शोभा हो रही थी; मुक्ता, माणिक्य और उत्तम हीरेके हारोंसे वह परम सुहावना लग रहा था; वह नाना प्रकारकी विचित्र चित्रकारियों, श्वेत चँवर और दर्पणों, अग्निशुद्ध चमकीले वस्त्रों और मालासमूहोंसे विभूषित था; उसमें रत्नोंकी बनी हुई पुष्पचन्दनचर्चित अनेकों शय्याएँ शोभा दे रही थीं, समान रूप और वेशवाली लाखों गोपियोंसे वह समावृत था और उसे एक हजार घोड़े खींच रहे थे। उस रथसे भगवान् पुनः वृन्दावनमें गये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने रात्रिके समय जलस्थलपर विहार किया और राधिकाको वहाँके सभी पदार्थोंका इस रूपमें दिखलाया, मानो सभी नवीन प्रकट हुए हों।

पुनः सुन्दर शृङ्गार करके वनों और उपवनोंमें, विस्यन्दक, सुरसन, माहेन्द्र और नन्दनवनमें, सुमेरुकी चोटी तथा रमणीय गन्धमादन पर्वतपर, सुन्दर-सुन्दर पर्वत, कन्दरा और वनमें, अत्यन्त गुप्त पुष्पोद्यानोंमें, प्रत्येक नदियों और नदोंके जलमें, समुद्रके तटपर, पारिजात-वृक्षोंके मनोहर वनमें सुभद्र, पुष्पभद्र और नारायण सरोवरपर, पवनके आवासस्थान तथा देवताओंकी निवासभूमि मलय पर्वतपर, त्रिकूट, भद्रकूट, पञ्चकूट और सुकूटपर, देवोंकी स्वर्णमयी कमनीय भूमिपर, प्रत्येक समुद्रपर तथा मनोहर द्वीपमें, श्रेष्ठ स्वर्गलोकमें, पुण्यमय रुचिर चन्द्रसरोवरपर और मुनियोंके आश्रमोंके आस-पास उन्होंने राधाके साथ विहार किया। पुनः शीघ्र ही पुण्यप्रद जम्बूद्वीपमें आकर द्वारका तथा रैवतक पर्वतको दिखलाया। फिर गोप और गो-समूहसे व्याप्त गोकुलमें आये। वहाँ भाण्डीरवटको देखकर वे पुण्यमय वृन्दावनमें गये।

श्रीकृष्णका आगमन सुनकर नन्द, यशोदा और बूढ़े गोप तथा गोपियोंकी आकुलता जाती रही और उनके नेत्रोंमें हर्षके आँसू छलक आये। फिर तो उन्होंने गजराज, नटी, नट, नर्तक, पति-पुत्रवती साध्वी ब्राह्मणी और ब्राह्मणोंको आगे करके उनका उसी प्रकार स्वागत किया, जैसे देवगण अग्निका करते हैं। तब माधव नन्द तथा माता यशोदाको देखकर राधाके साथ बालकृष्ण-रूपमें उनके निकट आये। फिर मधुसूदन हँसकर माताकी गोदमें जा बैठे। तब यशोदासहित नन्द उनका मुख-कमल चूमने लगे और स्नेहवश छातीसे लगाकर नेत्रोंके अश्रुजलसे उन्हें सींचने