ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७९० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण लगे। उधर स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण यशोदाका स्तनपान करनेमें जुट गये। उस समय सभी लोगोंने श्रीकृष्णको उसी रूपमें देखा, जिस रूपमें वे मथुरा गये थे। उनके हाथमें मुरली शोभा पा रही थी, वे रत्नोंके आभूषणोंसे विभूषित थे, उनकी ग्यारह वर्षकी किशोर अवस्था थी, पीताम्बर उनकी शोभा बढ़ा रहा था, शिखामें मयूरपिच्छकी निराली छटा थी और वे मालतीकी मालाओंसे सुसज्जित थे। तत्पश्चात् यशोदा राधासहित माधवको महलके भीतर लिवा ले गयीं। वहाँ उन्होंने माङ्गलिक कार्य सम्पन्न करके ब्राह्मणोंको भोजन कराया और गोपियोंका उसी प्रकार पूजन किया जैसे लोग मुनियोंका करते हैं। फिर आनन्दमग्न हो ब्राह्मणोंको मणि, रत्न, मूँगा, उत्तम सुवर्ण, मोती, माणिक्य, हीरा, गजरत्न, गोरत्न, मनोहर अश्वरत्न, धान्य, फसल लगी हुई खेती और वस्त्र दान किये। राधाके साथ माधवको अपूर्व वस्तुका दर्शन कराया। नारद ! फिर गोपियोंको भी आदरपूर्वक मिष्टान्नका भोजन कराया, दुन्दुभियाँ बजवायीं, मङ्गल कराया और देवगणोंको आनन्दपूर्वक मनोहर पदार्थोंका भोग समर्पित किया। (अध्याय १२६) श्रीकृष्णद्वारा नन्दको ज्ञानोपदेश और राधा-कलावती आदि गोपियोंका गोलोक-गमन श्रीनारायण कहते हैं— नारद! जहाँ पहले ब्राह्मणपत्नियोंने श्रीकृष्णको अन्न दिया था; उस भाण्डीर-वटकी छायामें श्रीकृष्ण स्वयं विराजमान हुए और वहीं समस्त गोपोंको बुलवा भेजा। श्रीहरिके वामभागमें राधिकादेवी, दक्षिणभागमें यशोदासहित नन्द, नन्दके दाहिने वृषभानु और वृषभानुके बायें कलावती तथा अन्यान्य गोप, गोपी, भाई-बन्धु तथा मित्रोंने आसन ग्रहण किया। तब गोविन्दने उन सबसे समयोचित यथार्थ वचन कहा। श्रीभगवान् बोले- नन्द ! इस समय जो समयोचित, सत्य, परमार्थ और परलोकमें सुखदायक है; उसका वर्णन करता हूँ, सुनो। ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त सभी पदार्थ बिजलीकी चमक, जलके ऊपर की हुई रेखा और पानीके बुलबुलेके समान भ्रमरूप ही हैं- ऐसा जानो। मैंने मथुरामें तुम्हें सब कुछ बतला दिया था, कुछ भी उठा नहीं रखा था। उसी प्रकार कदलीवनमें राधिकाने यशोदाको समझाया था। वही परम सत्य भ्रमरूपी अन्धकारका विनाश करनेके लिये दीपक है; इसलिये तुम मिथ्या मायाको छोड़कर उसी परम पदका स्मरण करो। वह पद जन्म-मृत्यु-जरा- व्याधिका विनाशक, महान् हर्षदायक, शोक- संतापका निवारक और कर्ममूलका उच्छेदक है। मुझ परम ब्रह्म सनातन भगवान्का बारंबार ध्यान करके तुम उस परम पदको प्राप्त करो। अब कर्मकी जड़ काट देनेवाले कलियुगका आगमन संनिकट है; अतः तुम शीघ्र ही गोकुलवासियोंके साथ गोलोकको चले जाओ। तदनन्तर भगवान्ने कलियुगके धर्म तथा लक्षणोंका वर्णन किया। विप्रवर ! इसी बीच वहाँ व्रजमें लोगोंने सहसा गोलोकसे आये हुए एक मनोहर रथको देखा। वह रथ चार योजन विस्तृत और पाँच योजन ऊँचा था; बहुमूल्य रत्नोंके सारभागसे उसका निर्माण हुआ था। वह शुद्ध स्फटिकके समान उद्भासित हो रहा था; विकसित पारिजात- पुष्पोंकी मालाओंसे उसकी विशेष शोभा हो रही थी; वह कौस्तुभमणयोंके आभूषणोंसे विभूषित था; उसके ऊपर अमूल्य रत्नकलश चमक रहा था; उसमें हीरेके हार लटक रहे थे; वह सहस्रों