ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ७९१ करोड़ मनोहर मन्दिरोंसे व्याप्त था; उसमें दो हजार पहिये लगे थे और दो हजार घोड़े उसका भार वहन कर रहे थे तथा उसपर सूक्ष्म वस्त्रका आवरण पड़ा हुआ था एवं वह करोड़ों गोपियोंसे समावृत था। नारद ! राधा और धन्यवादकी पात्र कलावती देवीका जन्म किसीके गर्भसे नहीं हुआ था। यहाँतक कि गोलोकसे जितनी गोपियाँ आयी थीं; वे सभी अयोनिजा थीं। उसके रूपमें श्रुतिपत्नियां ही अपने शरीरसे प्रकट हुई थीं। वे सभी श्रीकृष्णकी आज्ञासे अपने नश्वर शरीरका त्याग करके उस रथपर सवार हो उत्तम गोलोकको चली गयीं। साथ ही राधा भी गोकुलवासियोंके साथ गोलोकको प्रस्थित हुईं। ब्रह्मन् ! मार्गमें उन्हें विरजा नदीका मनोहर तट दीख पड़ा, जो नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित था। उसे पार करके वे शतशृङ्ग पर्वतपर गयीं। वहाँ उन्होंने अनेक प्रकारके मणिसमूहोंसे व्याप्त सुसज्जित रासमण्डलको देखा। उससे कुछ दूर आगे जानेपर पुण्यमय वृन्दावन मिला। आगे बढ़नेपर अक्षयवट दिखायी दिया, उसकी करोड़ों शाखाएँ चारों ओर फैली हुई थीं। वह सौ योजन विस्तारवाला और तीन सौ योजन ऊँचा था और लाल रंगके बड़े-बड़े फलसमूह उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। उसके नीचे मनोहर वृन्दा हजारों-करोड़ों गोपियोंके साथ विराजमान थीं। उसे देखकर राधा तुरंत ही रथसे उतरकर आदरसहित मुस्कराती हुई उसके निकट गयीं। वृन्दाने राधाको नमस्कार किया। तत्पश्चात् रासेश्वरी राधासे वार्तालाप करके वह उन्हें अपने महलके भीतर लिवा ले गयी। वहाँ वृन्दाने राधाको हीरेके हारोंसे समन्वित एक रमणीय रत्नसिंहासनपर बैठाया और स्वयं उनकी चरणसेवामें जुट गयी। सात सखियाँ श्वेत चँवर डुलाकर उनकी सेवा करने लगीं। इतनेमें परमेश्वरी राधाको देखनेके लिये सभी गोपियाँ वहाँ आ पहुँचीं। तब राधाने नन्द आदिके लिये पृथक्-पृथक् आवासस्थानकी व्यवस्था की। तदनन्तर परमानन्दरूपा गोपिका राधा परमानन्दपूर्वक सबके साथ अपने परम रुचिर भवनको प्रस्थित हुईं। (अध्याय १२७) श्रीकृष्णके गोलोक-गमनका वर्णन श्रीनारायण कहते हैं - नारद ! परिपूर्णतम प्रभु भगवान् श्रीकृष्ण वहाँ तत्काल ही गोकुलवासियोंके सालोक्य मोक्षको देखकर भाण्डीरवनमें वटवृक्षके नीचे पाँच गोपोंके साथ ठहर गये। वहाँ उन्होंने देखा कि सारा गोकुल तथा गो-समुदाय व्याकुल है। रक्षकोंके न रहनेसे वृन्दावन शून्य तथा अस्त- व्यस्त हो गया है। तब उन कृपासागरको दया आ गयी। फिर तो, उन्होंने योगधारणाद्वारा अमृतकी वर्षा करके वृन्दावनको मनोहर, सुरम्य और गोपों तथा गोपियोंसे परिपूर्ण कर दिया। साथ ही गोकुलवासी गोपोंको ढाढस भी बँधाया। तत्पश्चात् वे हितकर नीतियुक्त दुर्लभ मधुर वचन बोले। श्रीभगवान्ने कहा- हे गोपगण ! हे बन्धो ! तुमलोग सुखका उपभोग करते हुए शान्तिपूर्वक यहाँ वास करो; क्योंकि प्रियाके साथ विहार, सुरम्य रासमण्डल और वृन्दावन नामक पुण्यवनमें श्रीकृष्णका निरन्तर निवास तबतक रहेगा, जबतक सूर्य और चन्द्रमाकी स्थिति रहेगी। तत्पश्चात् लोकोंके विधाता ब्रह्मा भी भाण्डीरवनमें आये। उनके पीछे स्वयं शेष, धर्म, भवानीके साथ स्वयं शंकर, सूर्य, महेन्द्र, चन्द्र, अग्नि, कुबेर, वरुण, पवन, यम, ईशान आदि देव, आठों वसु, सभी ग्रह, रुद्र, मुनि तथा मनु- ये सभी शीघ्रतापूर्वक वहाँ आ पहुँचे, जहाँ सामर्थ्यशाली भगवान् श्रीकृष्ण विराजमान थे। तब स्वयं ब्रह्माने दण्डकी भाँति भूमिपर लेटकर उन्हें प्रणाम किया और यों कहा। ब्रह्मा बोले- भगवन्! आप परिपूर्णतम ब्रह्मस्वरूप, नित्य विग्रहधारी, ज्योतिःस्वरूप,