भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 802, कुल 810 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 802

७९२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

परमब्रह्म और प्रकृतिसे परे हैं, आपको मेरा नमस्कार प्राप्त हो। परमात्मन् ! आप परम निर्लिप्त, निराकार, ध्यानके लिये साकार, स्वेच्छामय और परमधाम हैं; आपको प्रणाम है। सर्वेश ! आप सम्पूर्ण कार्यस्वरूपोंके स्वामी, कारणोंके कारण और ब्रह्मा, शिव, शेष आदि देवोंके अधिपति हैं, आपको बारंबार अभिवादन है। परात्पर! आप सरस्वती, पद्मा, पार्वती, सावित्री और राधाके स्वामी हैं; रासेश्वर ! आपको मेरा प्रणाम स्वीकार हो। सृष्टिरूप ! आप सबके आदिभूत, सर्वरूप, सर्वेश्वर, सबके पालक और संहारक हैं; आपको नमस्कार प्राप्त हो। हे नाथ ! आपके चरणकमलकी रजसे वसुन्धरा पावन तथा धन्य हुई हैं; आपके परमपद चले जानेपर यह शून्य हो जायगी। इसपर क्रीड़ा करते आपके एक सौ पचीस वर्ष बीत गये। अब आप इस विरहातुरा रोती हुई पृथ्वीको छोड़कर अपने धामको पधार रहे हैं।

**श्रीमहादेवजीने कहा—**विभो ! आप ब्रह्माकी प्रार्थनासे भूतलपर अवतीर्ण हो पृथ्वीका भार हरण करके अपने पदको जा रहे हैं। आपके चरणोंसे अङ्कित हुई भूमि तुरंत ही पावन और तीनों लोकोंमें धन्य हो गयी। आपके चरणकमलका साक्षात् दर्शन करके हमलोग और मुनिगण धन्य हो गये। जो ऊर्ध्वरेता मुनियोंके लिये ध्यानद्वारा असाध्य, दुराराध्य और निष्पाप हैं; वे ही परमेश्वर इस समय भूतलपर हमलोगोंके दृष्टिगोचर हुए हैं। जिनके रोमकूपोंमें विश्वोंका निवास है, उन सर्वनिवास प्रभुको वासु कहते हैं, उन वासु-स्वरूप महाविष्णुके जो देव हैं, वे भूतलपर 'वासुदेव' नामसे विख्यात हैं। जिनके अनुपम एवं परम दुर्लभ पादपद्म सिद्धेन्द्रोंके चिरकालतक तपस्या करनेपर उपलब्ध होते हैं; वे ही आज सब लोगोंके नेत्रोंके विषय हुए हैं।

**अनन्त बोले—**नाथ ! ऐश्वर्यशाली अनन्त तो आप ही हैं, मैं नहीं हूँ। मैं तो आपका कलांश हूँ। विश्वके एकमात्र आधार उस क्षुद्र कूर्मकी पीठपर मैं उसी तरह दिखायी देता हूँ, जैसे हाथीके ऊपर मच्छर। ब्रह्मा, विष्णु और शिवात्मक असंख्यौं शेष और कूर्म हैं तथा विश्व भी असंख्य हैं। उन सबके स्वामी स्वयं आप हैं। नाथ! हमलोगोंका ऐसा सुदिन कहाँ होगा कि स्वप्नमें भी जिनका दर्शन दुर्लभ है, वे ही ईश्वर समस्त जीवोंके दृष्टिगोचर हो रहे हैं। नाथ! आपने ही वसुन्धराको पावन बनाया है। अब शोकसागरमें डूबती एवं रोती हुई उस पृथ्वीको अनाथ करके आप गोलोक पधार रहे हैं।

**देवताओंने कहा—**भगवन् ! देवगण तथा ब्रह्मा और ईशान आदि देवता जिनकी स्तुति करनेमें समर्थ नहीं हैं; उनका स्तवन भला, हमलोग क्या कर सकते हैं; अतः आपको नमस्कार है।

मुने ! इतना कहकर वे सभी देवता हर्षमग्न हो द्वारकावासी भगवान्‌का दर्शन करनेके लिये शीघ्र ही द्वारकापुरीको प्रयाण कर गये। उनमें जितने ग्वाले थे, वे सभी उत्तम गोलोकको चले गये। पृथ्वी भयभीत हो काँपने लगी। सातों समुद्र मर्यादारहित हो गये। ब्रह्मशापसे द्वारकाकी शोभा नष्ट हो गयी। तब राधिकापति श्रीकृष्ण उसे त्यागकर कदम्बमूलस्थित मूर्तिमें समा गये। उन सभी यदुवंशियोंका एरकायुद्धमें विनाश हो गया तथा उनकी पत्नियाँ चितामें जलकर अपने-अपने पतियोंकी अनुगामिनी बन गयीं। अर्जुनने हस्तिनापुर जाकर यह समाचार युधिष्ठिरसे कह सुनाया। तब राजा युधिष्ठिर भी पत्नी तथा भाइयोंके साथ स्वर्गको चले गये।

तदनन्तर जो परम आत्मबलसे सम्पन्न, देवाधिदेव, नारायण, प्रभु, श्यामसुन्दर, किशोर अवस्थावाले और रत्ननिर्मित आभूषणोंसे सुशोभित थे; अग्निशुद्ध वस्त्र जिनका परिधान था; वनमाला जिनकी शोभा बढ़ा रही थी; जो अत्यन्त सुन्दर, शान्त और मनोहर थे; जिनके पद्मा आदिद्वारा