भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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श्रीकृष्णजन्मखण्ड

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वन्दित चरणकमलमें व्याधद्वारा छोड़ा हुआ अस्त्र चुभा हुआ था; उन लक्ष्मीकान्त परमेश्वरको कदम्बके नीचे स्थित देखकर ब्रह्मा आदि सभी देवताओंने भक्तिपूर्वक उन्हें प्रणाम किया और फिर उनकी स्तुति की। तब श्रीकृष्णने उन ब्रह्मा आदि देवोंकी ओर मुस्कराते हुए देखकर उन्हें अभयदान दिया। पृथ्वी प्रेमविह्वल हो रो रही थी; उसे पूर्णरूपसे आश्वासन दिया और व्याधको अपने उत्तम परम पदको भेज दिया। तत्पश्चात् बलदेवजीका परम अद्भुत तेज शेषनागमें, प्रद्युम्नका कामदेवमें और अनिरुद्धका ब्रह्मामें प्रविष्ट हो गया। नारद! देवी रुक्मिणी, जो अयोनिजा तथा साक्षात् महालक्ष्मी थीं; अपने उसी शरीरसे वैकुण्ठको चली गयीं। कमलालया सत्यभामा पृथ्वीमें तथा स्वयं जाम्बवतीदेवी जगज्जननी पार्वतीमें प्रवेश कर गयीं। इस प्रकार भूतलपर जो-जो देवियाँ जिन-जिनके अंशसे प्रकट हुई थीं; वे सभी पृथक्-पृथक् अपने अंशीमें विलीन हो गयीं। साम्बका अत्यन्त निराला तेज स्कन्दमें, वसुदेव कश्यपमें और देवकी अदितिमें समा गयीं। विकसित मुख और नेत्रोंवाले समुद्रने रुक्मिणीके महलको छोड़कर शेष सारी द्वारकापुरीको अपने अंदर समेट लिया। इसके बाद क्षीरसागरने आकर पुरुषोत्तम श्रीकृष्णका स्तवन किया। उस समय उनके वियोगके कारण उसके नेत्र अश्रुपूर्ण हो गये और वह व्याकुल होकर रोने लगा। मुने! तत्पश्चात् गङ्गा, सरस्वती, पद्मावती, यमुना, गोदावरी, स्वर्णरेखा, कावेरी, नर्मदा, शरावती, बाहुदा और पुण्यदायिनी कृतमाला—ये सभी सरिताएँ भी वहाँ आ पहुँचीं और सभीने परमेश्वर श्रीकृष्णको नमस्कार किया। उनमें जह्नुतनया गङ्गादेवी विरह-वेदनासे कातर तथा अत्यन्त दीन हो रही थीं। उनके नेत्रोंमें आँसू उमड़ आये थे। वे रोती हुई परमेश्वर श्रीकृष्णसे बोलीं।

**भागीरथीने कहा—**नाथ! रमणश्रेष्ठ! आप तो उत्तम गोलोकको पधार रहे हैं; किंतु इस कलियुगमें हमलोगोंकी क्या गति होगी?

**तब श्रीभगवान् बोले—**जाह्नवि! पापीलोग तुम्हारे जलमें स्नान करनेसे तुम्हें जिन पापोंको देंगे; वे सभी मेरे मन्त्रकी उपासना करनेवाले वैष्णवके स्पर्श, दर्शन और स्नानसे तत्काल ही भस्म हो जायँगे। जहाँ हरि-नाम-संकीर्तन और पुराणोंकी कथा होगी; वहाँ तुम इन सरिताओंके साथ जाकर सावधानतया श्रवण करोगी। उस पुराण-श्रवण तथा हरि-नाम-संकीर्तनसे ब्रह्महत्या आदि महापातक जलकर राख हो जाते हैं। वे ही पाप वैष्णवके आलिङ्गनसे भी दग्ध हो जाते हैं। जैसे अग्नि सूखी लकड़ी और घास-फूसको जला डालती है; उसी प्रकार जगत्में वैष्णवलोग पापियोंके पापोंको भी नष्ट कर देते हैं। गङ्गे! भूतलपर जितने पुण्यमय तीर्थ हैं; वे सभी मेरे भक्तोंके पावन शरीरोंमें सदा निवास करते हैं। मेरे भक्तोंकी चरण-रजसे वसुन्धरा तत्काल पावन हो जाती है, तीर्थ पवित्र हो जाते हैं तथा जगत् शुद्ध हो जाता है। जो ब्राह्मण मेरे मन्त्रके उपासक हैं, मुझे अर्पित करनेके बाद मेरा प्रसाद भोजन करते हैं और नित्य मेरे ही ध्यानमें तल्लीन रहते हैं; वे मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं। उनके स्पर्शमात्रसे वायु और अग्नि पवित्र हो जाते हैं। मेरे भक्तोंके चले जानेपर सभी वर्ण एक हो जायँगे और मेरे भक्तोंसे शून्य हुई पृथ्वीपर कलियुगका पूरा साम्राज्य हो जायगा।

इसी अवसरपर वहाँ श्रीकृष्णके शरीरसे एक चार-भुजाधारी पुरुष प्रकट हुआ। उसकी प्रभा सैकड़ों चन्द्रमाओंको लज्जित कर रही थी। वह श्रीवत्स-चिह्नसे विभूषित था और उसके हाथोंमें शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म शोभा पा रहे थे। वह एक सुन्दर रथपर सवार होकर क्षीरसागरको चला गया। तब स्वयं मूर्तिमती सिन्धुकन्या भी उनके पीछे चली गयीं। जगत्के पालनकर्ता

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