ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७९४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण विष्णुके श्वेतद्वीप चले जानेपर श्रीकृष्णके मनसे उत्पन्न हुई मनोहरा मर्त्यलक्ष्मीने भी उनका अनुगमन किया। इस प्रकार उस शुद्ध सत्त्वस्वरूपके दो रूप हो गये। उनमें दक्षिणाङ्ग हो भुजाधारी गोप-बालकके रूपमें प्रकट हुआ। वह नूतन जलधरके समान श्याम और पीताम्बरसे शोभित था; उसके मुखसे सुन्दर वंशी लगी हुई थी; नेत्र कमलके समान विशाल थे; वह शोभासम्पन्न तथा मन्द मुस्कानसे युक्त था। वह सौ करोड़ चन्द्रमाओंके समान सौन्दर्यशाली, सौ करोड़ कामदेवोंकी-सी प्रभावाला, परमानन्दस्वरूप, परिपूर्णतम, प्रभु, परमधाम, परब्रह्मस्वरूप, निर्गुण, सबका परमात्मा, भक्तानुग्रहमूर्ति, अविनाशी शरीरवाला, प्रकृतिसे पर और ऐश्वर्यशाली ईश्वर था। योगीलोग जिसे सनातन ज्योतिरूप जानते हैं और उस ज्योतिके भीतर जिसके नित्य रूपको भक्तिके सहारे समझ पाते हैं। विचक्षण वेद जिसे सत्य, नित्य और आद्य बतलाते हैं, सभी देवता जिसे स्वेच्छामय परम प्रभु कहते हैं, सारे सिद्धशिरोमणि तथा मुनिवर जिसे सर्वरूप कहकर पुकारते हैं, योगिराज शंकर जिसका नाम अनिर्वचनीय रखते हैं, स्वयं ब्रह्मा जिसे कारणके कारणरूपसे प्रख्यात करते हैं और शेषनाग जिस नौ प्रकारके रूप धारण करनेवाले ईश्वरको अनन्त कहते हैं; छः प्रकारके धर्म ही उनके छः रूप हैं, फिर एक रूप वैष्णवोंका, एक रूप वेदोंका और एक रूप पुराणोंका है; इसीलिये वे नौ प्रकारके कहे जाते हैं। जो मत शंकरका है, उसी मतका आश्रय ले न्यायशास्त्र जिसे अनिर्वचनीय रूपसे निरूपण करता है, दीर्घदर्शी वैशेषिक जिसे नित्य बतलाते हैं; सांख्य उन देवको सनातन ज्योतिरूप, मेरा अंशभूत वेदान्त सर्वरूप और सर्वकारण, पतञ्जलिमनानुयायी अनन्त, वेदगण सत्यस्वरूप, पुराण स्वेच्छामय और भक्तगण नित्यविग्रह कहते हैं; वे ही ये गोलोकनाथ श्रीकृष्ण गोकुलमें वृन्दावन नामक पुण्यवनमें गोपवेश धारण करके नन्दके पुत्ररूपसे अवतीर्ण हुए हैं। ये राधाके प्राणपति हैं। ये ही वैकुण्ठमें चार-भुजाधारी महालक्ष्मीपति स्वयं भगवान् नारायण हैं; जिनका नाम मुक्ति-प्राप्तिका कारण है। नारद ! जो मनुष्य एक बार भी 'नारायण' नामका उच्चारण कर लेता है; वह तीन सौ कल्पोंतक गङ्गा आदि सभी तीर्थोंमें स्नान करनेका फल पा लेता है। तदनन्तर जो शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण करते हैं; जिनके वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न शोभा देता है; मणिश्रेष्ठ कौस्तुभ और वनमालासे जो सुशोभित होते हैं; वेद जिनकी स्तुति करते हैं; वे भगवान् नारायण सुनन्द, नन्द और कुमुद आदि पार्षदोंके साथ विमानद्वारा अपने स्थान वैकुण्ठको चले गये। उन वैकुण्ठनाथके चले जानेपर राधाके स्वामी स्वयं श्रीकृष्णने अपनी वंशी बजायी, जिसका सुरीला शब्द त्रिलोकीको मोहमें डालनेवाला था। नारद! उस शब्दको सुनते ही पार्वतीके अतिरिक्त सभी देवतागण और मुनिगण मूर्च्छित हो गये और उनकी चेतना लुप्त हो गयी। तब जो भगवती विष्णुमाया, सर्वरूपा, सनातनी, परब्रह्मस्वरूपा, परमात्मस्वरूपिणी सगुणा, निर्गुणा, परा और स्वेच्छामयी हैं; वे सती-साध्वी देवी पार्वती सनातन भगवन् श्रीकृष्णसे बोलीं। पार्वतीने कहा - प्रभो ! गोलोकस्थित रासमण्डलमें मैं ही अपने एक राधिकारूपसे रहती हूँ। इस समय गोलोक रासशून्य हो गया है; अतः आप मुक्ता और माणिक्यसे विभूषित रथपर आरूढ़ हो वहाँ जाइये और उसे परिपूर्ण कीजिये। आपके वक्षःस्थलपर वास करनेवाली परिपूर्णतमा देवी मैं ही हूँ। आपकी आज्ञासे वैकुण्ठमें वास करनेवाली महालक्ष्मी मैं ही हूँ। वहीं श्रीहरिके वामभागमें स्थित रहनेवाली सरस्वती भी मैं ही हूँ। मैं आपकी आज्ञासे आपके मनसे उत्पन्न हुई सिन्धुकन्या हूँ। ब्रह्माके संनिकट रहनेवाली अपनी