ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ७९५
कलासे प्रकट हुई वेदमाता सावित्री मेरा ही नाम है। पहले सत्ययुगमें आपकी आज्ञासे मैंने समस्त देवताओंके तेजोंमें अपना वासस्थान बनाया और उससे प्रकट होकर देवीका शरीर धारण किया। उसी शरीरसे मेरे द्वारा लीलापूर्वक शुम्भ आदि दैत्य मारे गये। मैं ही दुर्गासुरका वध करके 'दुर्गा', त्रिपुरका संहार करनेपर 'त्रिपुरा' और रक्तबीजको मारकर 'रक्तबीजविनाशिनी' कहलाती हूँ। आपकी आज्ञासे मैं सत्यस्वरूपिणी दक्षकन्या 'सती' हुई। वहाँ योगधारणद्वारा शरीरका त्याग करके आपके ही आदेशसे पुनः गिरिराजनन्दिनी 'पार्वती' हुई; जिसे आपने गोलोकस्थित रासमण्डलमें शंकरको दे दिया था। मैं सदा विष्णुभक्तिमें रत रहती हूँ; इसी कारण मुझे वैष्णवी और विष्णुमाया कहा जाता है। नारायणकी माया होनेके कारण मुझे लोग नारायणी कहते हैं। मैं श्रीकृष्णकी प्राणप्रिया, उनके प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी और वासुस्वरूप महाविष्णुकी जननी स्वयं राधिका हूँ। आपके आदेशसे मैंने अपनेको पाँच रूपोंमें विभक्त कर दिया; जिससे पाँचों प्रकृति मेरा ही रूप हैं। मैं ही घर-घरमें कला और कलांशसे प्रकट हुई वेदपत्नियोंके रूपमें वर्तमान हूँ। महाभाग! वहाँ गोलोकमें मैं विरहसे आतुर हो गोपियोंके साथ सदा अपने आवासस्थानमें चारों ओर चक्कर काटती रहती हूँ; अतः आप शीघ्र ही वहाँ पधारिये।
नारद! पार्वतीके वचन सुनकर रसिकेश्वर श्रीकृष्ण हँसे और रत्ननिर्मित विमानपर सवार हो उत्तम गोलोकको चले गये। तब सनातनी विष्णुमाया स्वयं पार्वतीने मायारूपिणी वंशीके नादसे आच्छन्न हुए देवगणको जगाया। वे सभी हरिनामोच्चारण करके विस्मयाविष्ट हो अपने-अपने स्थानको चले गये। श्रीदुर्गा भी हर्षमग्न हो शिवके साथ अपने नगरको चली गयीं।
तदनन्तर सर्वज्ञा राधा हर्षविभोर हो आते हुए प्राणवल्लभ श्रीकृष्णके स्वागतार्थ गोपियोंके साथ आगे आयीं। श्रीकृष्णको समीप आते देखकर सती राधिका रथसे उतर पड़ीं और सखियोंके साथ आगे बढ़कर उन्होंने उन जगदीश्वरके चरणोंमें सिर झुकाकर प्रणाम किया। ग्वालों और गोपियोंके मनमें सदा श्रीकृष्णके आगमनकी लालसा बनी रहती थी; अतः उन्हें आया देखकर वे आनन्दमग्न हो गये। उनके नेत्र और मुख हर्षसे खिल उठे। फिर तो वे दुन्दुभियाँ बजाने लगे।
उधर विरजा नदीको पार करके जगत्पति श्रीकृष्णकी दृष्टि ज्यों ही राधापर पड़ी, त्यों ही वे रथसे उतर पड़े और राधिकाके हाथको अपने हाथमें लेकर शतशृङ्ग पर्वतपर घूमने चले गये। वहाँ सुरम्य रासमण्डल, अक्षयवट और पुण्यमय वृन्दावनको देखते हुए तुलसी-काननमें जा पहुँचे। वहाँसे मालतीवनको चले गये। फिर श्रीकृष्णने कुन्दवन तथा माधवी-काननको बायें करके मनोरम चम्पकारण्यको दाहिने छोड़ा। पुनः सुरुचिर चन्दनकाननको पीछे करके आगे बढ़े तो सामने राधिकाका परम रमणीय भवन दीख पड़ा। वहाँ जाकर वे राधाके साथ श्रेष्ठ रत्नसिंहासनपर विराजमान हुए। फिर उन्होंने सुवासित जल पिया तथा कपूरयुक्त पानका बीड़ा ग्रहण किया। तत्पश्चात् वे सुगन्धित चन्दनसे चर्चित पुष्पशय्यापर सोये और रस-सागरमें निमग्न हो सुन्दरी राधाके साथ बिहार करने लगे।
नारद! इस प्रकार मैंने रमणीय गोलोकारोहणके विषयमें अपने पिता धर्मके मुखसे जो कुछ सुना था, वह सब तुम्हें बता दिया। अब पुनः और क्या सुनना चाहते हो?
(अध्याय १२८)