ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७९६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
नारायणके आदेशसे नारदका विवाहके लिये उद्यत हो ब्रह्मलोकमें जाना, ब्रह्माका दल-बलके साथ राजा सृंजयके पास आना, सृंजय-कन्या और नारदका विवाह, सनत्कुमारद्वारा नारदको श्रीकृष्ण-मन्त्रोपदेश, महादेवजीका उन्हें श्रीकृष्णका ध्यान और जप-विधि बतलाना, तपके अन्तमें नारदका शरीर त्यागकर श्रीहरिके पादपद्ममें लीन होना
**नारदने कहा—**महाभाग ! मेरी जो कुछ सुननेकी लालसा थी; वह सब कुछ सुन लिया। अब कुछ भी अवशिष्ट नहीं है। कामनाकी पूर्ति करनेवाला यह ब्रह्मवैवर्तपुराण कैसा अद्भुत है ! जगद्गुरो ! मैं तप करनेके लिये हिमालयपर जाना चाहता हूँ, इसके लिये मुझे आज्ञा दीजिये अथवा अब मैं क्या करूँ, वह मुझे बतलानेकी कृपा करें।
**श्रीनारायण बोले—**नारद ! इस समय तो तुम ब्रह्माके पुत्र हो; परंतु पूर्वजन्ममें तुम उपबर्हण नामक गन्धर्व थे। तुम्हारे पचास पत्नियाँ थीं। उनमेंसे एक सती-साध्वी सुन्दरी कामिनीने तपस्याद्वारा भगवान् शंकरकी आराधना की और वररूपमें नारदको अपना मनोनीत पति प्राप्त किया। वही राजा सृंजयकी कन्या होकर पैदा हुई है। उसका नाम स्वर्णवी (स्वर्णष्ठीवी) है। वह इच्छाकी सहोदरा बहिन है। वह सुन्दरियोंमें परम सुन्दरी, कोमलाङ्गी, लक्ष्मीकी कला, पतिव्रता, महाभागा, मनोहरा, अत्यन्त प्रिय बोलनेवाली, कामुकी, कमनीया और सदा सुस्थिर यौवनवाली है। तुम उसके साथ विवाह कर लो; क्योंकि शंकरकी आज्ञा व्यर्थ कैसे हो सकती है ? ब्रह्माने जो प्राक्तन कर्म लिख दिया है; उसे कौन मिटा सकता है ? अपना किया हुआ शुभ अथवा अशुभ कर्म अवश्य ही भोगना पड़ता है; चाहे सौ करोड़ कल्प बीत जायँ तो भी बिना भोग किये कर्मका नाश नहीं होता।
**सूतजी कहते हैं—**शौनक ! नारायणका कथन सुनकर नारदका मन खिन्न हो गया। वे नारायणको प्रणाम करके शीघ्र ही राजा सृंजयकी राजधानीकी ओर चल दिये।
**शौनकने कहा—**महाभाग सूतजी ! अहो, यह कैसा परम अद्भुत, पुरातन, सरस, अपूर्व रहस्य है। इसे तो मैंने सुन लिया। अब मैं नारदका विवाह-वृत्तान्त सुनना चाहता हूँ; क्योंकि नारदमुनि तो अतीन्द्रिय और ब्रह्माके पुत्र थे।
**सूतजी कहते हैं—**शौनक ! नारदपर मोहने अपना अधिकार जमा लिया था; अतः वे विष्णु-व्रतपरायणा महाभागा तपस्विनी सृंजय-कन्याको देखकर ब्रह्माजीकी रमणीय सभामें गये। वह सभा सभी देवताओंसे खचाखच भरी थी। वहाँ उन्होंने पिता ब्रह्माको प्रणाम करके उनसे सारा रहस्य कह सुनाया। उस शुभ समाचारको सुनकर ब्रह्माका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा। फिर तो जगत्पति ब्रह्मा अपने तपस्वी पुत्र नारदसे बातचीत करके शुभ मुहूर्तमें देवताओंके साथ पुत्रको आगे करके रत्ननिर्मित विमानद्वारा सृंजयके महलको चल पड़े। उस समाचारको सुनकर राजा सृंजयने अपनी रत्ननिर्मित आभूषणोंसे विभूषित सुन्दरी कन्याको लेकर हर्षपूर्वक नारदको सौंप दिया। साथ ही अपना सारा मणिमुक्ता आदि दहेजमें दिया। फिर हाथ जोड़कर उन्होंने वह सारा कार्य सम्पन्न किया। तत्पश्चात् योगिश्रेष्ठ राजा सृंजय अपनी कन्या ब्रह्माको समर्पित करके ‘वत्से ! वत्से !’ यों कहकर फूट-फूटकर रोते हुए कहने लगे—‘कमललोचने ! तुम मेरे घरको सूना करके कहाँ जा रही हो। बेटी ! तुम्हें त्यागकर तो मैं जीते-जी मृतक-तुल्य हो गया हूँ; अतः मैं घोर वनमें चला जाऊँगा।’ तब वह कन्या रोते हुए पिता और रोती हुई माताको प्रणाम करके स्वयं भी रोती हुई ब्रह्माके रथपर सवार हुई। ब्रह्मा हर्षमग्न हो भार्यासहित पुत्रको लेकर देवेन्द्रों और मुनियोंके साथ ब्रह्मलोकको