ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 807, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड
७९७
प्रस्थित हुए। वहाँ पहुँचकर उन्होंने दुन्दुभिका घोष कराया और ब्राह्मणों, देवताओं तथा सिद्धोंको भोजनसे तृप्त किया। मुनिश्रेष्ठ नारद तो अपने पूर्वकर्मसे बाधित थे; क्योंकि विप्रवर ! जिसका जो प्राक्तन कर्म होता है; उसका उल्लङ्घन करना दुष्कर है। उसे भला कौन हटा सकता है?
इस प्रकार विवाह करके उससे विरत हो मुनिश्रेष्ठ नारद ब्रह्मलोकमें मनोहर वटवृक्षके नीचे बैठे हुए थे। उसी समय वहाँ साक्षात् भगवान् सनत्कुमार आ पहुँचे। बालककी तरह उनका नग्न-वेष था। वे ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित हो रहे थे। सृष्टिके पूर्वमें उनकी जो आयु थी, वही पाँच वर्षकी अवस्था अब भी थी। उनका चूडाकर्म और उपनयन-संस्कार नहीं हुआ था तथा वे वेदाध्ययन और संध्यासे रहित थे। उनके नारायण गुरु हैं। वे अनन्त कल्पोंसे तीनों भाइयोंके साथ कृष्ण-मन्त्रका जप कर रहे थे। वे वैष्णवोंके अग्रणी, ईश्वर और ज्ञानियोंके गुरु थे। सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ अपने भाई सनत्कुमारको सहसा निकट आया देखकर नारद दण्डकी भाँति भूमिपर लेट गये और चरणोंमें सिर रखकर उन्हें प्रणाम किया। तब बालकरूप सनत्कुमारजी हँसकर नारदसे पारमार्थिक वचन बोले।
**सनत्कुमारजीने कहा—**अरे भाई! क्या कर रहे हो ? युवतीपते ! कुशल तो है न? स्त्री-पुरुषका प्रेम सदा बढ़ता रहता है और वह नित्य नूतन ही होता है। वह ज्ञानमार्गकी साँकल, भक्तिद्वारका किवाड़, मोक्षमार्गका व्यवधान और चिरकालिक बन्धनका कारण है; फिर भी पापी नराधम अमृत-बुद्धिसे उस विषको पीते हैं। जिसका मन परम पुरुष नारायणको छोड़कर विषयमें रचा-पचा रहता है, उसे मानो मायाने ठग लिया है; जिससे वह अमृतका त्याग करके विषका सेवन करता है। अतः भाई! इस मायामयी प्रियतमा पत्नीको छोड़ो और तपके लिये निकल जाओ। परम पुण्यमय भारतवर्षमें जाकर तपस्याद्वारा माधवका भजन करो। अपना पद प्रदान करनेवाले अपने स्वामी परम पुरुष नारायणके स्थित रहते जो विषयी पुरुष विषयोंमें मत्त रहता है; उसे निश्चय ही मायाने ठग लिया है। अब तुम मेरे ‘कृष्ण’ इस दो अक्षरवाले मन्त्रको ग्रहण करो। यह मन्त्र सभी मन्त्रोंका सार तथा परात्पर है। सभी पुराणों, चारों वेदों, धर्मशास्त्रों और तन्त्रोंमें इससे उत्तम दूसरा मन्त्र नहीं है। इसे नारायणने मुझे सूर्यग्रहणके अवसरपर पुष्करक्षेत्रमें प्रदान किया था। असंख्यों कल्पोंसे इसका जप करके मैं सर्वपूजित हो भ्रमण करता रहता हूँ। यों कहकर उन्होंने नारदको स्नान कराया और फिर उन्हें उस परमोत्कृष्ट मन्त्रका उपदेश दिया, जिसे वे मणियोंकी पावन मालापर रात-दिन जपते रहते हैं।
इस प्रकार वैष्णवोंके अग्रणी सनत्कुमारजी नारदको वह मन्त्र और शुभाशीर्वाद देकर सनातन भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये गोलोकको चले गये। इधर जब नारदको वह सर्वसिद्धिप्रद श्रीकृष्णमें निश्चल भक्ति प्रदान करनेवाला तथा कर्मोंका उच्छेदक श्रेष्ठ मन्त्र प्राप्त हो गया; तब वे अपनी मायामयी भार्याका त्याग करके तपस्या करनेके लिये भारतवर्षमें आये। यहाँ उन्हें कृतमाला नदीके तटपर भगवान् शंकरके दर्शन हुए। सहसा उन्हें देखकर नारदमुनिने शिवजीके चरणोंमें सिर झुकाकर प्रणाम किया। तब भक्तवत्सल जगदीश्वर शिव अपने भक्त नारदसे बोले।
**श्रीमहादेवजीने कहा—**अहो नारद ! अपने तेजसे उद्भासित होते हुए तुम्हें देखकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है; क्योंकि जिस दिन भक्तोंका दर्शन प्राप्त हो जाय, वह शरीरधारियोंके लिये उत्तम दिन माना जाता है। भक्तोंके साथ समागम होना प्राणियोंके लिये परम लाभ है। जिसे वैष्णवका दर्शन प्राप्त हो गया, उसने मानो समस्त तीर्थोंमें स्नान कर लिया। जो समस्त तन्त्रोंमें परम दुर्लभ है, वह ‘कृष्ण’ रूप महामन्त्र क्या तुम्हें प्राप्त हो गया? इस मन्त्रको मैंने अपने पुत्र गणेश और स्कन्दको दिया था। श्रीकृष्णने इसे गोलोकस्थित रासमण्डलमें मुझे, ब्रह्मा और धर्मको बतलाया था। धर्मने नारायणको तथा ब्रह्माने सनत्कुमारको इसका उपदेश दिया था। वही मन्त्र सनत्कुमारने