ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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तुम्हें प्रदान किया है। इस मन्त्रके ग्रहणमात्रसे ही मनुष्य नारायणस्वरूप हो जाता है। इसके जपके लिये शुभ-अशुभ समय-असमयका कोई विचार नहीं है। पाँच लाख जपसे ही इसका पुरश्चरण पूर्ण हो जाता है। इसका ध्यान पापनाशक तथा कर्ममूलका उच्छेदक है। शास्त्रमें उसका वर्णन किया गया है, उसी ढंगसे वैष्णवको श्रीकृष्णका ध्यान करना चाहिये। (वह ध्यान यों है—)
'नूतन जलधरके समान जिनका श्यामवर्ण है, जिनकी किशोर-अवस्था है, जो पीताम्बरसे सुशोभित हैं, सौ करोड़ चन्द्रमाओंके समान परम अनुपम सौन्दर्य धारण किये हुए हैं, अमूल्य रत्नोंके बने हुए भूषणसमूह जिनकी शोभा बढ़ा रहे हैं, जिनके सर्वाङ्गमें चन्दनका अनुलेप हुआ है, कौस्तुभमणिद्वारा जिनकी विशेष शोभा हो रही है, जिनकी मालतीकी मालाओंसे मण्डित शिखामें लगे हुए मयूरपिच्छकी निराली छवि हो रही है, जिनके प्रसन्नमुखपर मन्द मुस्कानकी छटा छायी हुई है, शिव आदि देवगण जिनकी नित्य उपासना करते रहते हैं तथा जो ध्यानद्वारा असाध्य, दुराराध्य, निर्गुण, प्रकृतिसे पर, सबके परमात्मा, भक्तानुग्रहमूर्ति, वेदोंद्वारा अनिर्वचनीय और सर्वेश्वर हैं; उन श्रेष्ठ श्रीकृष्णका मैं भजन करता हूँ।'
नारद! जो परमानन्द, सत्य, नित्य और परात्पर हैं, उन सनातन भगवान् श्रीकृष्णका इस ध्यान-विधिसे ध्यान करके भजन करो। इतना कहकर परमेश्वर शम्भु अपने स्थानको चले गये। तब नारदने उन जगन्नाथको प्रणाम करके तपस्यामें मन लगाया। तत्पश्चात् नारद श्रीहरिका स्मरण करके योगधारणाद्वारा शरीरको त्यागकर पद्माद्वारा समर्चित श्रीहरिके चरणकमलमें विलीन हो गये। (अध्याय १२९)
पुराणोंके लक्षण और उनकी श्लोक-संख्याका निरूपण, ब्रह्मवैवर्तपुराणके पठन-श्रवणके माहात्म्यका वर्णन करके सूतजीका सिद्धाश्रमको प्रयाण
तदनन्तर अग्नि तथा स्वर्णकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग सुनाकर शौनकजीके पूछनेपर सूतजीने ब्रह्मवैवर्तपुराणके समस्त विषयोंकी अनुक्रमणिका सुनायी।
फिर शौनकजीने कहा—वत्स! ब्रह्मवैवर्त-पुराणमें जिस फलका निरूपण हुआ है, वह निर्विघ्नतापूर्वक मोक्षका कारण है। उसे सुनकर आज मेरा जन्म लेना सफल हो गया और जीवन सुजीवन बन गया। तात! अभी मुझे कुछ और निवेदन करना है; यदि मुझे अभयदान दो तो मैं उसे प्रकट करूँ।
तब सूतजी बोले—महाभाग शौनकजी! भय छोड़ दीजिये और आपकी जो इच्छा हो, उसे पूछिये। मैं जो-जो भी मनोहर गोपनीय विषय होगा, सब आपसे वर्णन करूँगा।
शौनकने कहा—पुत्रक! अब मेरी पुराणोंके लक्षण, उनकी श्लोक-संख्या और उनके श्रवणका फल सुननेकी अभिलाषा है।
सूतजी कहते हैं—शौनकजी! मैं अपनी बुद्धिके अनुसार विस्तृत पुराणों, इतिहासों, संहिताओं और पाञ्चरात्रोंका वर्णन करता हूँ, सुनिये। विप्रवर! सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित—इन पाँचों लक्षणोंसे जो युक्त हो, उसे पुराण कहते हैं। विद्वान्लोग उपपुराणोंका भी यही लक्षण बतलाते हैं। अब प्रधान पुराणोंका लक्षण आपको बतलाता हूँ—सृष्टि, विसृष्टि, स्थिति, उनका पालन, कर्मोंकी वासना-वार्ता, मनुओंका क्रम, प्रलयोंका वर्णन, मोक्षका निरूपण, श्रीहरिका गुण-गान तथा देवताओंका पृथक्-पृथक् वर्णन—प्रधान पुराणोंके ये दस लक्षण और बतलाये जाते हैं। अब इन पुराणोंकी श्लोक-संख्याका वर्णन करता हूँ, सुनिये।
शौनकजी! परमोत्कृष्ट ब्रह्मपुराणकी श्लोक-संख्या दस हजार और पद्मपुराणकी पचपन हजार कही गयी है। विद्वान्लोग विष्णुपुराणको तेईस हजार श्लोकोंवाला बतलाते हैं। शिवपुराणमें चौबीस हजार श्लोक बतलाये जाते हैं। श्रीमद्भागवतपुराण अठारह हजार श्लोकोंमें ग्रथित है। नारदपुराणकी श्लोक-संख्या पचीस हजार बतलायी गयी है। पण्डितलोग