भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 777

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७६७

अतः उन्होंने सीतासे कहा—'प्रिये! इस समय अत्यन्त स्वादिष्ट निर्मल जल, अन्न, मनोहर व्यञ्जन तथा सारी वस्तुएँ अत्यन्त शीतल हैं।' यों कहकर उन्होंने फल-संग्रह किया और हर्षपूर्वक उन्हें सीताको प्रदान किया। तत्पश्चात् लक्ष्मणको देकर पीछे स्वयं प्रभुने भोग लगाया। लक्ष्मणने वह फल और जल ले तो लिया, परंतु खाया नहीं; क्योंकि वे सीताका उद्धार करनेके लिये मेघनादका वध करना चाहते थे। (उनको यह पता था कि) जो चौदह वर्षतक न तो नींद लेगा और न भोजन करेगा; वही योगी पुरुष उस रावणकुमार मेघनादको मार सकेगा। इसी बीच कमललोचन रामका दर्शन करनेके लिये कृपानिधि अग्नि ब्राह्मणका वेष धारण करके वहाँ आये और कर्णकटु भविष्य-वचन कहने लगे।

अग्निदेव बोले—महाभाग राम! मेरी बात सुनो और सीताकी भलीभाँति रक्षा करो; क्योंकि प्राक्तन कर्मवश दुर्निवार्य एवं दुष्ट राक्षस रावण सात दिनके भीतर ही जानकीको हर ले जायगा। भला, विधाताने जिस प्राक्तन कर्मको लिख दिया है; उसे कौन मिटा सकता है? चारों देवताओंने भी यही कहा है कि दैवसे बढ़कर श्रेष्ठ दूसरा कोई नहीं है।

तब श्रीरामजीने कहा—अग्निदेव! तब तो सीताको आप अपने साथ लेते जाइये और उसकी छाया यहीं रहेगी; क्योंकि पत्नीके बिना किया हुआ कर्म सभीके लिये निन्दित होता है। तब अग्निदेव रोती हुई सीताको साथ लेकर चले गये और सीताके सदृश जो छाया थी; वह रामके संनिकट रहने लगी। पूर्वकालमें रावणने खेल-ही-खेलमें उसी छायाका हरण किया था और श्रीरामने भाई-बन्धुओंसहित उस रावणका वध करके उस छायाका ही उद्धार किया था। अग्नि-परीक्षाके अवसरपर जो छाया अग्निमें प्रविष्ट हुई थी; उस छायाको अपने संरक्षणमें रखकर अग्निने रामको असली जानकी लौटा दी। तब श्रीराम जानकीको लेकर हर्षपूर्वक अपने आश्रमको चले गये और छाया दुःखित हृदयसे अग्निके पास रहने लगी। वही छाया नारायण-सरोवरमें जाकर तप करने लगी। उसने सौ दिव्य वर्षोंतक शंकरजीके लिये घोर तपस्या की; तब शंकरजी प्रकट होकर उससे बोले—'भद्रे! वर माँगो।' वह पतिके दुःखसे दुःखी थी; अतः व्यग्रतापूर्वक शिवजीसे बोली। उसने उस व्यग्रतामें ही त्रिनेत्रधारी शिवजीसे 'पतिं देहि'—पति दीजिये यों पाँच बार वर माँगा। तब सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके प्रदाता शिव प्रसन्न होकर उसे वर देते हुए बोले।

श्रीमहादेवजीने कहा—साध्वि! तुमने व्याकुल होकर 'पतिं देहि'—पति दीजिये यों पाँच बार कहा है; अतः श्रीहरिके अंशभूत पाँच इन्द्र तुम्हारे पति होंगे। वे ही सभी पाँचों इन्द्र इस समय पाँच पाण्डव हुए हैं और वह छाया द्रौपदीरूपमें यज्ञकुण्डसे उत्पन्न हुई है। यही छाया कृतयुगमें वेदवती, त्रेतामें जनकनन्दिनी और द्वापरमें द्रौपदी हुई है; इसी कारण यह त्रिहायणी कृष्णा कहलाती है। यह वैष्णवी तथा श्रीकृष्णकी भक्त है; इसलिये भी कृष्णा कही जाती है। वही पीछे चलकर महेन्द्रोंकी स्वर्गलक्ष्मी होगी। राजा द्रुपदने कन्याके स्वयंवरमें उसे अर्जुनको दिया। वीरवर अर्जुनने मातासे पूछा—'माँ! इस समय मुझे एक वस्तु मिली है।' तब माताने अर्जुनसे कहा—'उसे सभी भाइयोंके साथ बाँटकर ग्रहण करो।' इस प्रकार पहले शम्भुका वरदान था ही, पीछे माता कुन्तीकी भी आज्ञा हो गयी—इसी कारण पाँचों पाण्डव द्रौपदीके पति हुए। ये पाँचों पाण्डव चौदह इन्द्रोंमेंसे पाँच इन्द्र हैं।

माताद्वारा भर्त्सना किये जानेपर शंकरजीने मेरी माता रतिको शाप देते हुए कहा—'रति! तुम्हारा पति शंकरकी क्रोधाग्निसे जलकर भस्म हो जायगा। इस समय तुम शापित होकर दैत्यके

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