भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 776
७६६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

जो कुछ कहती हूँ, उसे श्रवण करो। दुष्ट पुत्रसे भी माता-पिताको पद-पदपर दुःख ही होता है। दूसरेके द्वारा ग्रहण की गयी वह कन्या उषा अब दूसरेको देनेके योग्य नहीं ही है; अतः जो श्रीकृष्णके पौत्र और प्रद्युम्नके पुत्र हैं; उन महान् बलशाली अनिरुद्धको स्वेच्छानुसार अपनी कन्या दान कर दो। इससे तुम भारतवर्षमें अपनी सात पीढ़ियोंके साथ पावन हो जाओगे। फिर भूतलपर महान् यशकी प्राप्तिके लिये अपना सर्वस्व दहेजमें समर्पित कर दो। अन्यथा माधव युद्धस्थलमें सुदर्शन-चक्रद्वारा तुम्हारा वध कर डालेंगे। उस समय कौन तुम्हारी रक्षा कर सकेगा?'

मुने! कोटरीकी बात सुनकर अभिमानी दैत्यश्रेष्ठ बाण कुपित हो उठा। वह रथपर आरूढ़ हो उस स्थानके लिये प्रस्थित हुआ जहाँ श्रीहरिके पौत्र अनिरुद्ध वर्तमान थे। उस समय भक्तवत्सल शंकरकी आज्ञासे स्कन्द सेनापति होकर उसके साथ चले। स्वयं शिव और गणेशने बाणके लिये स्वस्तिवाचन किया। पार्वती तथा कोटरीने उसे शुभाशीर्वाद दिया। आठों भैरव और एकादश रुद्र—ये सभी हाथोंमें शस्त्र धारण करके युद्धके लिये तैयार हुए। इस बीच एक दूतने, जिसे पार्वतीदेवी तथा बाणपत्नीने भेजा था, तुरंत ही जाकर अनिरुद्धको भी यह समाचार सूचित कर दिया।

दूत बोला—अनिरुद्ध! उठो और पार्वतीका यह मङ्गल-वचन श्रवण करो। (उन्होंने कहा है—) 'वत्स! कवच धारण कर लो और बाहर निकलकर युद्ध करो।' यह सुनकर उषा भयभीत हो गयी; वह डरके मारे रोती हुई सती पार्वतीका ध्यान करके बोली—'महामाये! मेरे मनोनीत प्राणेश्वरकी रक्षा करो, रक्षा करो। यद्यपि ये निर्भय हैं; तथापि इस महाभयंकर संग्राममें इन्हें अभयदान दो। तुम्हीं जगत्की माता हो; अतः तुम्हारा सबपर समान स्नेह है।'

तत्पश्चात् ऐश्वर्यशाली अनिरुद्धने कवच पहनकर हाथमें शस्त्र धारण किये और उषाद्वारा दिये गये रथको पाकर वे उसपर हर्षपूर्वक आरूढ़ हुए। शिविरसे बाहर निकलकर उन्होंने बाणको देखा, जो कवच पहनकर हाथोंमें शस्त्र धारण किये हुए था। उसके नेत्र क्रोधसे लाल हो रहे थे। अनिरुद्धको देखकर बाण क्रोधसे भर गया। वह उस घोर संग्रामके मध्य प्रज्वलित होता हुआ विषोक्तियाँ उगलने लगा। उसने भाँति-भाँतिसे श्रीकृष्णके चरित्रपर दोषारोपण करके उनकी निन्दा की और अनिरुद्धने उसका विवेकपूर्ण खण्डन करके श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन किया।

(अध्याय ११५)


बाण और अनिरुद्धके संवाद-प्रसङ्गमें अनिरुद्धद्वारा द्रौपदीके पाँच पति होनेका वर्णन, बाणसेनापति सुभद्रका अनिरुद्धके साथ युद्ध और अनिरुद्धद्वारा उसका वध

बाणने कहा—अनिरुद्ध! तुम बड़े बुद्धिमान् हो। तुम्हारा कथन सत्य ही है। शम्भुने भी ऐसा ही बतलाया था। अब तुमने जो यह कहा है कि महाभागा द्रौपदी शंकरजीके वरदानसे पाँच पतियोंकी प्रिया थीं, वह वृत्तान्त विस्तारपूर्वक मुझसे वर्णन करो। साथ ही यह भी बतलाओ कि पहले शम्बरने तुम्हारी माता रतिका किस प्रकार अपहरण किया था? उसने देवताओंको पराजित कैसे किया था? और देवगणोंने किस तरह रतिको उसे प्रदान किया था?

अनिरुद्ध बोले—बाण! एक समयकी बात है। पञ्चवटीमें श्रीरघुनाथजी सीता और लक्ष्मणके साथ सरोवरमें स्नान करके उसके रमणीय तटपर बैठे हुए थे। उस समय हेमन्तका समय था;