ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ७६५
कन्याकी दुःशीलताका समाचार पाकर बाणका युद्धके लिये उद्यत होना; शिव, पार्वती, गणेश, स्कन्द और कोटरीका उसे रोकना; परंतु बाणका स्कन्दको सेनापति बनाकर युद्धके लिये नगरके बाहर निकलना, उषाप्रदत्त रथपर सवार होकर अनिरुद्धका भी युद्धोद्योग करना, बाण और अनिरुद्धका परस्पर वार्तालाप
श्रीनारायण कहते हैं— नारद! तदनन्तर अन्तःपुरके रक्षकोंने भयभीत हो स्कन्द, गणेश और पार्वतीको दण्डकी भाँति भूमिपर लेटकर प्रणाम किया और अपने स्वामी बाणसे सारा वृत्तान्त कह सुनाया। उसे सुनकर बाणको बड़ी लज्जा हुई और वह क्रुद्ध हो उठा। उस समय शम्भु, गणेश, स्कन्द, पार्वती, भैरवी, भद्रकाली, योगिनियाँ, आठों भैरव, एकादश रुद्र, भूत, प्रेत, कूष्माण्ड, बेताल, ब्रह्मराक्षस, योगीन्द्र, सिद्धेन्द्र, रुद्र, चण्ड आदि तथा माताकी भाँति हितैषिणी करोड़ों ग्रामदेवियाँ—ये सभी उसके हितके लिये बराबर मना कर रहे थे; फिर भी उसने युद्ध करनेका ही विचार निश्चित किया। तब शंकरजी अपनेको पण्डित माननेवाले मूर्ख बाणसे हितकारक, सत्य, नीतिशास्त्रसम्मत और परिणाममें सुखदायक वचन बोले।
श्रीमहादेवजीने कहा— बाण! मैं इस पुरातनी कथाका वर्णन करता हूँ, सुनो। स्वयं परमेश्वर पृथ्वीका भार उतारनेके लिये भारतवर्षमें सभी नरेशोंका संहार करके द्वारकामें विराजमान हैं। जिनके रोमोंमें सारे विश्व वर्तमान हैं, उन वासुके भी वे ईश्वर हैं; इसीलिये विद्वान्लोग उन्हें 'वासुदेव' ऐसा कहते हैं। स्वयं भगवान् चक्रपाणि भूतलपर ब्रह्माके भी विधाता हैं। वे ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदिके स्वामी हैं; प्रकृतिसे परे, निर्गुण, इच्छारहित, भक्तानुग्रहमूर्ति, परब्रह्म, परम धाम और देहधारियोंके परमात्मा हैं। जिनके शरीरसे निकल जानेपर जीव शवतुल्य हो जाता है; उनके साथ तुम्हारा संग्राम कैसे सम्भव हो सकता है? अनिरुद्ध उन्हींके पुत्र (पौत्र) हैं। वे महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न हैं और क्षणभरमें अकेले ही तीनों लोकोंका संहार करनेमें समर्थ हैं। जितने महारथी बलवान् देवता और दैत्य हैं, वे सभी अनिरुद्धकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हैं। जिन दो व्यक्तियोंमें समान धन हो और जिनमें बलकी भी समानता हो; उन्हीं दोनोंमें विवाह और मैत्री शोभा देती है। बलवान् और निर्बलका सम्बन्ध उचित नहीं होता। तुम्हारे पिता महारथी बलि दैत्योंके सारभूत और श्रीहरिकी कला थे। उन्हें भी जिसने क्षणभरमें ही सुतल-लोकको भेज दिया; उन्हीं वृन्दावनेश्वर परम पुरुष परिपूर्णतम परमात्मा श्रीकृष्णके सभी जीव अंश-कलाएँ हैं।
पार्वतीजी बोलीं— बाण! ब्रह्मा, महेश, शेष और ध्याननिष्ठ भक्त रात-दिन अपने हृदयकमलमें उन सनातन भगवान्का ध्यान करते रहते हैं। सूर्य, गणेश और योगीन्द्रोंके गुरु-के-गुरु शिव उन ऐश्वर्यशाली सनातन परमात्माके ध्यानमें तल्लीन रहते हैं। सनत्कुमार, कपि, नर तथा नारायण अपने हृदय-कमलमें उन सनातन भगवान्का ध्यान लगाते हैं। मनु, मुनीन्द्र, सिद्धेन्द्र और योगीन्द्र ध्यानद्वारा अप्राप्य उन सनातन भगवान्के ध्यानमें निमग्न रहते हैं। जो सबके आदि, सबके कारण, सर्वेश्वर और परात्पर हैं; उन सनातन भगवान्का सभी ज्ञानी ध्यान करते हैं।
तदनन्तर गणेश और स्कन्दने भी बाणको श्रीकृष्णकी महिमा भलीभाँति समझाकर युद्ध न करके अनिरुद्धके साथ उषाका विवाह कर देनेके लिये अनुरोध किया। अन्तमें कोटरी बोली— 'वत्स! धर्मानुसार मैं भी तुम्हारी माता हूँ; अतः