भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 774

७६४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

सभी क्लेश नष्ट हो जाते हैं। वे सर्वमङ्गलमङ्गला हैं; अतः ध्यानकर्ताको मङ्गल प्रदान करती हैं।' चित्रलेखाका कथन सुनकर सती उषा फूट-फूटकर रोने लगी और बाण शंकरके निकट ही विषाद करते हुए मूर्च्छित हो गये। यह देखकर शंकर, दुर्गा, कार्तिकेय और गणेश हँसने लगे।

तब गणेश्वर बोले— स्वयं देवी पार्वतीने जाकर स्वप्नमें कामदेव-नन्दन अनिरुद्धको काममत्त बनाया है और इस समय ये शम्भुके वामपार्श्वमें मूक बनी बैठी हैं। भगवान् श्रीहरि तो सर्वज्ञ ही हैं; उन ईश्वरने सारा रहस्य जानकर बाणकन्या उषाको स्वप्नमें सुन्दर-वेषधारी पुरुषका दर्शन कराया है। अतः अब सुयोगिनी चित्रलेखा खेल-ही-खेलमें प्रमत्त अनिरुद्धको लानेके लिये शीघ्र ही द्वारकापुरीको प्रस्थान करे।

ऐसा सुनकर गणेशसे महादेवजीने कहा— बेटा! जिस प्रकार यह शुभ कार्य बाणके श्रवणगोचर न हो, वैसा ही प्रयत्न तुम्हें करना चाहिये।' इधर चित्रलेखा तुरंत ही द्वारकाको चल पड़ी। श्रीहरिका वह भवन यद्यपि सबके लिये दुर्लङ्घ्य था, तथापि वह अनायास ही उसमें प्रवेश कर गयी। वहाँ अनिरुद्ध नींदमें सो रहे थे। उसने योगबलसे हर्षपूर्वक उस नींदमें मते हुए बालकको उठाकर रथपर बैठा लिया। मुने! भद्रा चित्रलेखा मनके समान वेगशालिनी थी। वह उस बालकको लेकर शङ्खध्वनि करके दो ही घड़ीमें शोणितपुर जा पहुँची। तदनन्तर अनिरुद्धको न देखकर श्रीकृष्णके महलोंमें उदासी छा गयी। तब सर्वतत्त्ववेत्ता सर्वज्ञ श्रीकृष्णने सबको आश्वासन देकर शोणितपुरको सेनासहित प्रयाण किया।

इधर महर्षि दुर्वासाकी शिष्या योगिनी चित्रलेखाने—जो नारियोंमें धन्या, पुण्या, मान्या, शान्ता तथा योगसिद्ध होनेके कारण सिद्धिदायिनी थी, माताका स्मरण करके रोते हुए उस बालकको समझाया। फिर स्नान कराकर उसे पुष्पमाला और चन्दनसे विभूषित किया। इस प्रकार उस बालकका सुन्दर वेष बनाकर वह कन्याके अन्तःपुरमें—जो रक्षकोंद्वारा सुरक्षित था—योगबलसे प्रविष्ट हुई। वहाँ आहारका परित्याग कर देनेसे जिसका उदर सट गया था और जिसे सखियाँ चारों ओरसे घेरे हुए थीं; उस उषाको सुरक्षित देखकर शीघ्र ही उसे जगाया। उस समय उषाको भलीभाँति स्नान कराया गया और वस्त्र, माला, चन्दन तथा माङ्गलिक सिन्दूर-पत्रकोंद्वारा उसका श्रृङ्गार किया गया। फिर माहेन्द्र नामक शुभ मुहूर्त आनेपर उसने सखियोंकी गोष्ठीमें उन दोनोंका परस्पर वार्तालाप कराया। पतिको देखकर पतिव्रता उषाका कष्ट दूर हो गया और वह उनके साथ विहार करने लगी। तब प्रद्युम्ननन्दन अनिरुद्धने गान्धर्व-विवाहकी विधिसे उसका पाणिग्रहण कर लिया। विप्रवर! इस प्रकार जब बहुत दिन बीत गये; तब रक्षकद्वारा राजा बाणासुरको यह समाचार सुननेको मिला।

(अध्याय ११४)