ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ७६३
हवनोंसे युक्त शुभ यज्ञ कराया, ब्राह्मणोंको जिमाया और गणेश्वरका स्तवन किया। उस समय दस प्रकारके बाजे बजवाये। साम्बने कुष्ठ-रोगके विनाशके लिये पूरे वर्षभरतक अनुपम उपहारोंद्वारा सूर्यका पूजन किया, उस समय मातासहित साम्बको हविष्यान्नका भोजन कराया गया। तब स्वयं सूर्यदेवने प्रकट होकर साम्बको वरदान दिया और अपना स्तोत्र प्रदान किया। (अध्याय ११३)
अनिरुद्ध और उषाका पृथक्-पृथक् स्वप्नमें दर्शन, चित्रलेखाद्वारा अनिरुद्धका अपहरण, अन्तःपुरमें अनिरुद्ध और उषाका गान्धर्व-विवाह
श्रीनारायण कहते हैं—नारद! प्रद्युम्न श्रीकृष्णके पुत्र थे, जो महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न थे। उनके पुत्र अनिरुद्ध थे, जो विधाताके अंशसे उत्पन्न हुए थे। अनिरुद्ध एक दिन निर्जन स्थानमें पुष्प और चन्दनचर्चित पलंगपर सोये हुए थे। उन्होंने स्वप्नमें खिले हुए पुष्पोंके उद्यानमें सुगन्धिकुसुम-शय्यापर सोयी हुई एक अनन्य सुन्दरी नवयुवती रमणीको मधुर-मधुर मुस्कराते देखा। तब अनिरुद्धने 'मैं त्रिलोकीनाथ श्रीकृष्णका पौत्र तथा कन्दर्पका पुत्र हूँ'—यो अपना परिचय देते हुए उस तरुणीसे पतिरूपमें स्वीकार करनेका अनुरोध किया। इसपर उस तरुणीने यथाविधि विवाहित यज्ञपत्नी अर्थात् अग्निकी साक्षीमें जिससे विधिवत् विवाह किया जाता है और कामवृत्तिको चरितार्थ करनेके लिये स्वीकृत नैमित्तिक पत्नीका शुभाशुभ भेद बतलाते हुए कहा—
'मैं बाणासुरकी कन्या हूँ, मेरा नाम उषा है। त्रैलोक्यविजयी बाण शंकरजीके किंकर हैं और शंकर लोकोंके स्वामी हैं। नारी तीनों कालोंमें पराधीन रहती है, वह कभी स्वतन्त्र नहीं होती। जो नारी स्वतन्त्र होती है, वह नीच कुलमें उत्पन्न हुई पुंश्चली होती है। पिता ही कन्याको योग्य वरके हाथ सौंपता है। कन्या वरकी याचना नहीं करती—यही सनातन धर्म है। प्रभो! तुम मेरे योग्य हो और मैं तुम्हारे योग्य हूँ; अतः यदि तुम मुझे पाना चाहते हो तो बाणासुर, शम्भु अथवा सती पार्वतीसे मेरे लिये प्रार्थना करो।' यों कहकर वह सती-साध्वी सुन्दरी अन्तर्धान हो गयी। मुने! तब कामके वशीभूत हुए कामात्मज अनिरुद्धकी नींद सहसा टूट गयी। जागनेपर उन्हें स्वप्नका ज्ञान हुआ। उस समय उनका अन्तःकरण कामसे व्यथित था और वे अपनी उस प्राणवल्लभाको न देखकर व्याकुल और अशान्त हो रहे थे। इस प्रकार पुत्रको उद्विग्न तथा विकल देखकर सती देवकी, रुक्मिणी तथा अन्यान्य सभी महिलाओंने भगवान् श्रीकृष्णको सूचित किया। मधुसूदन श्रीकृष्ण तो परिपूर्णतम तथा सम्पूर्ण तत्त्वोंके ज्ञाता ही ठहरे, वे उनकी बात सुनकर ठठाकर हँस पड़े और बोले।
श्रीभगवान्ने कहा—महिलाओ! भगवती दुर्गाने बाणासुरकी कन्याका शीघ्र विवाह हो, इसके लिये अनिरुद्धको स्वप्नमें उसे दिखाया है। अब मैं बाणकन्या उषाको स्वप्नमें अनिरुद्धके दर्शन कराता हूँ। तुमलोग अनिरुद्धके लिये कोई चिन्ता न करो। तदनन्तर श्रीकृष्णके स्वप्नमें उषाको सर्वाङ्गसुन्दर कोटि-कोटि-कन्दर्प-दर्पहारी अनिरुद्धके दर्शन कराये। स्वप्न टूटते ही उषा अत्यन्त व्याकुल हो गयी। उसकी अन्यमनस्कता और विषण्णता देखकर सखी चित्रलेखाने कहा—
'कल्याणि! चेत करो। तुम्हारा यह नगर दुर्लङ्घ्य है। इसमें साक्षात् शम्भु और शिवा वास करती हैं; तब भला, तुम्हें यह भयंकर भय कहाँसे उत्पन्न हो गया? सखी! शिव ही मङ्गलोंके वासस्थान हैं; अतः उनका स्मरणमात्र कर लेनेसे सभी अरिष्ट दूर भाग जाते हैं और सर्वत्र मङ्गल ही होता है। दुर्गतिनाशिनी दुर्गाका ध्यान करनेसे