भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 772

७६२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

कार्य और कारण तथा स्वयं जन्म लेनेवाले और जनक हो*। यन्त्रके गुण-दोष यन्त्रीपर ही आरोपित होते हैं—ऐसा श्रुतिमें सुना गया है; अतः ये सभी प्राणी यन्त्र हैं और तुम यन्त्री हो। सब कुछ तुममें ही प्रतिष्ठित है। जगद्गुरो! मैं तुम्हारा दुर्बुद्धि एवं मूढ़ द्वारपाल हूँ; अतः मेरा अपराध क्षमा करो और ब्रह्मशापसे मेरी रक्षा करो, रक्षा करो।

यों कहकर जय और विजय (शिशुपाल और दन्तवक्र) चल पड़े और शीघ्र ही आनन्दपूर्वक वे दोनों वैकुण्ठके अभीष्ट द्वारपर जा पहुँचे। शिशुपालके इस स्तवनसे वहाँ उपस्थित सभी लोग आश्चर्यचकित हो गये। उन लोगोंने श्रीकृष्णको परिपूर्णतम परमेश्वर माना। तत्पश्चात् राजसूययज्ञ पूर्ण कराकर ब्राह्मणोंको भोजनसे तृप्त किया। कौरवों और पाण्डवोंमें भेद उत्पन्न करके युद्ध कराया। इस प्रकार कृपालु भगवान्‌ने पृथ्वीका भार हल्का किया। पुनः द्वारकामें जाकर चिरकालतक निवास किया और राजा उग्रसेनकी आज्ञासे मृतवत्सा ब्राह्मणीके पुत्रोंको जीवन-दान दिया। उन्होंने उन पुत्रोंको मृतक-स्थानसे लाकर उनकी माताको समर्पित कर दिया। यह देखकर देवकीको परम संतोष हुआ; उन्होंने भी अपने मरे हुए पुत्रोंको लानेकी याचना की। तब श्रीकृष्णने अपने सहोदर भाइयोंको मृतक-स्थानसे लाकर माताको सौंप दिया।

तदनन्तर जो अपने घरसे शरणार्थी होकर द्वारकामें आये थे; उन सुदामा ब्राह्मणकी दरिद्रताको तत्काल ही दूर कर दिया। भक्तवत्सल भगवान्‌ने भक्तके चिउड़ोंकी कनीका स्वयं भोग लगाकर उन्हें सात पीढ़ीतक स्थिर रहनेवाली राजलक्ष्मी प्रदान की। जैसे इन्द्र अमरावतीमें राज्य करते हैं, उसी प्रकार उनका भूतलपर राज्य हो गया। वे ऐसे धनाढ्य हो गये, मानो धनके स्वामी कुबेर ही हों। तत्पश्चात् उन्होंने सुदामाको निश्चल हरिभक्ति, अपनी परम दुर्लभ दासता और अविनाशी गोलोकमें यथेष्ट उत्तम पद प्रदान किया।

मुने! फिर पारिजात-हरणके साथ-साथ उन्होंने इन्द्रके गर्वको दूर किया, सत्यभामासे मनोवाञ्छित पुण्यक-व्रतका अनुष्ठान कराया और सर्वत्र नित्य-नैमित्तिक कर्मोंकी उन्नति की। उस व्रतमें अपने-आपको महर्षि सनत्कुमारके प्रति दक्षिणारूपमें समर्पित कर दिया। ब्राह्मणोंको भोजनसे तृप्त करके उन्हें हर्षपूर्वक रत्नोंकी दक्षिणा दी। इस प्रकार सत्यभामाके उत्कृष्ट मानका सब ओर विस्तार किया। मुने! रुक्मिणी तथा अन्यान्य रानियोंके नये-नये सौभाग्यको, वैष्णवों, देवताओं और ब्राह्मणोंके पूजनको तथा नित्य-नैमित्तिक कर्मोंको सर्वत्र बढ़ाया। उन प्रभुने उद्धवको परम आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान किया। रणके अवसरपर अर्जुनको गीता सुनायी। कृपालु प्रभुने कृपापरवश हो पृथ्वीको निष्कण्टक करके युधिष्ठिरको राजलक्ष्मी प्रदान की। दुर्गाको वैष्णवी ग्रामदेवताके स्थानपर नियुक्त किया। रमणीय रैवतक पर्वतपर अमूल्य रत्ननिर्मित मन्दिरमें पार्वतीकी प्रसन्नताके लिये नाना प्रकारके नैवेद्यों और मनोहर धूप-दीपोंद्वारा करोड़ों हवनोंसे संयुक्त शुभ यज्ञ कराया। उसमें बहुत-से ब्राह्मणोंको भोजन कराया गया। परमेश्वर गणेशका पूजन किया; उस समय उन्हें नैवेद्यरूपमें अत्यन्त स्वादिष्ट, परम तुष्टिकारक तिलोंके पाँच लाख लड्डू, स्वस्तिकाकार अमृतोपम सात लाख मोदक, शक्करकी सैकड़ों राशियाँ, पके हुए केलेके फल, दस लाख पूये, मिष्टान्न, मनोहर स्वादिष्ट खीर, पूरी-कचौड़ी, घी, माखन, दही और अमृत-तुल्य दूध निवेदित किया। फिर धूप, दीप, पारिजात-पुष्पोंकी माला, सुगन्धित चन्दन, गन्ध और अग्निशुद्ध वस्त्र प्रदान किया। करोड़ों


* स्वयं पुमान् स्वयं स्त्री च स्वयमेव नपुंसकः। कारणं च स्वयं कार्यं जन्यश्च जनकः स्वयम् ॥
(११३।३१)